[पुस्तक समीक्षा] गाँधी: एक असम्भव सम्भावना

गाँधी गहरे आशावादी व्यक्ति थे। बड़े-से-बड़े संकट में भी आशा की कोई किरण ढूंढ लेते थे। कुछ न दिखे तो ईश्वर का सहारा ले लेते थे लेकिन अपने अंतिम दिनों में वे मृत्यु की कामना करने लगे। आख़िर ऐसे क्या कारण थे कि 125 साल तक जीने की इच्छा रखने वाले गाँधी देश के बँटवारे के समय मरने की कामना करने लगे?

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पुस्तक का नाम – गाँधी: एक असम्भव सम्भावना

लेखक – सुधीर चंद्र

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2016

भाषा – हिन्दी

पृष्ठ – 184

मूल्य – 180/-

महात्मा गाँधी दुनिया के ऐसे नायकों में से एक माने जाते हैं जिनमें विकल्प दे पाने की संभावना है। विकल्प कई चीज़ों का – रोज़ की मारकाट से लेकर सभ्यता और विकास की अवधारणा तक का, अन्याय के प्रतिरोध के तरीक़े से लेकर एक आधुनिक सामाजिक ढांचा खड़ा करने तक का, और यही कारण है कि महात्मा गाँधी इतिहास की चीज़ नहीं बने हैं। उन्हें लेकर आए दिन नए अध्ययन हो रहे हैं, जो उनके जीवन, संघर्षों और विचारों के नए-नए पहलुओं पर रोशनी डालते हैं। राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चन्द्र द्वारा मूल रूप से हिन्दी में लिखी गई पुस्तक ‘गाँधी : एक असम्भव सम्भावना’, महात्मा गाँधी के अन्तिम कुछ वर्षों के जीवन का बारीकी से किया गया अध्ययन है। यह अध्ययन है गाँधी जी की उन दिनों की मानसिकता का जब वे मृत्यु की कामना करने लगे थे। यह अध्ययन है उस दौरान गाँधी जी को महसूस होने वाली असहायता का जब उन्हें अहिंसा का विचार ध्वस्त होता दिखाई दे रहा था। लेकिन लेखक सुधीर चन्द्र का मानना है कि विचार कभी ध्वस्त नहीं होते। वे कहते हैं कि दरअसल गाँधी के अहिंसा पथ पर भारत कभी चला ही नहीं! गाँधी निष्क्रिय प्रतिरोध या कमज़ोरों की अहिंसा के नहीं बल्कि बलवानों की अहिंसा के कायल थे।

अमूमन भूमिकाओं में जो लिखा जाता है, वह इस पुस्तक के पहले अध्याय में कहा गया है। लेखक इस पुस्तक में गाँधी के साथ-साथ स्वयं को भी देखना चाहता है। उनका कहना है कि इस पुस्तक के बहाने सभी को स्वयं के भीतर झाँकने का प्रयास करना चाहिए कि आज के भारत में वे गाँधी को कहां देखते हैं। यह किताब गाँधी के ‘अन्त’ को समझने की कोशिश करती है – पार्थिव अन्त नहीं बल्कि वो अन्त जब उन्हें अपने तीस वर्षों के किए-कराए पर पानी फिरता नज़र आने लगा। एक ऐसा त्रासद अन्त जब 125 साल तक जीने की इच्छा रखने वाले गाँधी अपनी मृत्यु की कामना करने लगे और सरेआम प्रार्थना सभाओं में अपनी पीड़ा व दुःख की गाथा सुनाने लगे। गाँधी जब चौंसठ वर्ष के थे तब उन्होंने ‘हरिजन’ में लिखा था, “उम्र से बूढ़ा होने पर भी मुझे नहीं लगता कि मेरा आन्तरिक विकास रूक गया है या काया के विसर्जन के बाद रूक जाएगा।” लेकिन 27 नवंबर 1947 के प्रार्थना सभा के अन्त में उन्होंने अपनी गहराती व्यथा को निचोड़ते हुए कहा, “जो इन्सान समझदार है, वह इस तरह के वातावरण में साबुत नहीं रह सकता। यह मेरे दुःख की कथा है या यूं कहें कि सारे हिन्दुस्तान के दुःख की कथा है, जो मैंने आपके सामने रखी है।”

पुस्तक का दूसरा अध्याय गाँधी के स्वराज पर आधारित है जिसकी भूमिका उन्होंने ‘हिन्द स्वराज’ व अपने अन्य लेखों व भाषणों में प्रस्तुत की थी। वे भारत को एक आदर्श मुल्क के रूप में विश्व के सामने प्रस्तुत करना चाहते थे। भारत की रचना का स्वरूप व उसके बुनियादी सिद्धांतों के विषय में उनके विचार स्पष्ट थे। वर्षों से वे इस विषय पर सोचते रहे थे। स्वराज की उनकी एक विशिष्ट परिकल्पना थी। उनके अनुसार विदेशी शासन से स्वतंत्रता मात्र ही स्वराज नहीं था। जब उन्हें लगने लगा कि भारत स्वतंत्र हो जाएगा तो वे स्वराज सम्बन्धी सुझाव काँग्रेस और नेहरू के सामने रखने लगे परन्तु हर ओर से उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया, उन्हें निराशा ही हाथ लगी। यह किताब गाँधी की उस असहाय परिस्थिति को, उस रूदन को और उस कष्ट को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करती है जो उन्हें दरकिनार करके पूरे देश द्वारा दिया जा रहा था। यह पहली बार नहीं था जब काँग्रेस उनकी नहीं सुन रही थी। काँग्रेस के साथ उनका रिश्ता आवाजाही का ही था। वह जितना काँग्रेस के भीतर रहे थे, उतने ही बाहर भी रहे थे। लेकिन अंतिम दिनों में जब पूरे स्वतंत्रता संग्राम के परिणामस्वरूप भारत का एक राजनीतिक, सामाजिक व संवैधानिक ढांचा तैयार करने की बात आई तो काँग्रेस के साथ-साथ अन्य लोगों ने भी गाँधी को नकार दिया। यह पुस्तक गाँधी के उस नकारे जाने का गहराई से अध्ययन करती है और पाठकों के सामने गाँधी की व्यथाएँ ज्यों की त्यों प्रस्तुत करती है ताकि सभी पाठक उनकी, उस दौर की, मानसिक स्थिति का अध्ययन करें जब वे असहाय महसूस करने लगे थे।

लेखक ने पुस्तक के तीसरे अध्याय को ‘गाँधी के दुःख’ नामक शीर्षक दिया है। गाँधी गहरे आशावादी व्यक्ति थे। बड़े-से-बड़े संकट में भी आशा की कोई किरण ढूंढ लेते थे। कुछ न दिखे तो ईश्वर का सहारा ले लेते थे लेकिन अपने अंतिम दिनों में वे मृत्यु की कामना करने लगे। आख़िर ऐसे क्या कारण थे कि 125 साल तक जीने की इच्छा रखने वाले गाँधी देश के बँटवारे के समय मरने की कामना करने लगे? क्या सिर्फ़ एक झटके ने ऐसी मनःस्थिति पैदा कर दी थी? कम से कम 13 जून 1947 तक गाँधी जीने की बात कर रहे थे और यह देश के बँटवारे को मुकम्मल तौर पर मान लिए जाने से दस दिन बाद की बात है। उस शाम प्रार्थना प्रवचन में उन्होंने कहा था, “अगर मैं स्थितिप्रज्ञ रह सका तो एक सौ पच्चीस वर्ष की उम्र में से एक भी वर्ष कम ज़िन्दा नहीं रहूँगा। अगर हम सभी स्थितिप्रज्ञ बनें तो हम में से एक भी व्यक्ति को 125 वर्ष से ज़रा भी कम जीने का कोई कारण नहीं है। वैसे ईश्वर चाहे तो मुझे आज ही उठा ले, पर मैं अभी तुरंत चलने वाला नहीं हूँ। मुझे अभी रहना है और काम करना है।” क्या थे गाँधी के दुःख? इसका जवाब है गाँधी के इस व्यथित सवाल में – “आज के हिन्दुस्तान में कौन-सी ऐसी चीज़ हो रही है जो मुझे खुशी दे सके?” लेखक ने लगभग 50 पृष्ठ इस अध्याय को दिए हैं जिससे अंदाज़ा होता है कि गाँधी के दुःख कितने हैं? उनके दुःखों में कितनी खीझ है, कितना असहाय होने का बोध है और सपनों के भारत को टूटते देखने की व्यथा है।

अगला अध्याय ‘अहिंसा की सम्भावना’ पर आधारित है। जो कि गाँधी के जीवन का मूलभूत सिद्धांत और विश्वव्यापी विचार है। लेकिन गाँधी की अहिंसा कैसी थी? अहिंसा से उनका वास्तविक अर्थ क्या था? और अंतिम समय में भारत विभाजन के दौरान जो मारकाट मची हुई थी, तब उनका अहिंसा के सिद्धांत पर क्या कहना था? इन सभी प्रश्नों के इर्द-गिर्द घूमती यह किताब हमें अहिंसा का वास्तविक अर्थ बताने का प्रयास करती है।

लेखक की भाषा और खोजी दृष्टि कमाल की है और उनका नजरिया ज़बरदस्त है। गाँधी पर लिखते-लिखते उनका मानसिक और नैतिक संतुलन भी उनके ऊपर आ गया लगता है। तभी उनके लेखन में पटेल, जिन्ना, नेहरू, खलनायक नहीं लगते जो विभाजन पर और गाँधी समर्थक लेखकों के लेखन में हो ही जाता है। यहाँ वे सब बेचारे और दया के पात्र लगते हैं। दूसरी ओर गाँधी हैं जो सत्ता से दूर हैं लेकिन आम लोगों से लेकर घोर सांप्रदायिक नेताओं तक के दिल में भरोसा जगाते हैं। ऐसी अद्भुत किताब और वह भी हिंदी में लिखने के कारण सुधीर चंद्र साधुवाद के पात्र हैं।

यह किताब किसे पढ़नी चाहिए? उन सभी को जो अहिंसा के सिद्धांत को आँखें बंद करके नकार चुके हैं, उनको भी जो अभी भी गाँधी के सिद्धांतों में विश्वास बनाए हुए हैं और किसी वैकल्पिक राजनीति और व्यवस्था की उम्मीद में हैं। अंत में गाँधी की दूरदर्शिता को स्पष्ट रूप से दिखाता उनका कथन प्रस्तुत है जो उन्होंने 5 नवम्बर 1947 के ‘यंग इंडिया’ में लिखा था, “मैंने एक ऐसा रास्ता दिखाने की कोशिश की है जो शान्तिपूर्ण, मानवीय और उदात्त है। इसे ठुकराया जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो विकल्प होगा एक रस्साकशी, जिसमें हर कोई दूसरे को गिराने की कोशिश करेगा।”

समीक्षक: तल्हा मन्नान

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