राज्य प्रायोजित हिंसा और ज़ेनोफ़ोबिया का केंद्र बनता असम

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पिछले दिनों हमने असम में बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं देखीं। असम निवासी, बंगाली मूल के हाशिए पर पड़े मुसलमानों के साथ क्रूर और राज्य प्रायोजित हिंसा की गई।

उन्हें छिट-पुट हिंसा का निशाना बनाते हुए, प्रणालीगत तरीक़े से हाशिए पर रखा गया है और उनकी बंगाली जातीयता के कारण उन्हें लगातार विदेशी और घुसपैठियों के रूप में देखा जाता रहा है।

स्थानीय रूप से वे ब्रह्मपुत्र नदी से सटे मैदानों में स्थित हैं जहां मौसमी रूप से बाढ़ आती है और उनके घरों और खेती को नष्ट कर देती है, जिससे इन लोगों को ख़ुद को उंचाई पर या बंजर भूमि में पलायन करने के लिए मजबूर किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें भारी नुक़सान उठाना पड़ता है।

राज्य के अधिकारियों का इस मौसमी प्राकृतिक आपदा के प्रति लापरवाही भरा रवैया रहा है और इस मुद्दे को व्यवस्थित तरीक़े से हल करने में वे विफल रहे हैं। लगातार पलायन और परिणामी समस्याएं यहां ज़ेनोफ़ोबिया का मूल कारण बनीं क्योंकि पीड़ित हमेशा बंगाली मुसलमान या ‘मियां’ समुदाय के लोग रहे हैं, जैसा कि उन्हें आमतौर पर संबोधित किया जाता है।

हाल की घटनाएं तब शुरू हुईं जब सरकार ने राज्य की राजधानी गुवाहाटी के पास, दरांग ज़िले में स्थित ब्रह्मपुत्र के मैदानों से सरकारी पुनर्वास कार्यक्रम के तहत बंगाली मुसलमानों के लगभग 800 परिवारों को बेदख़ल कर दिया।

अवैध रूप से बेदख़ल किए गए इन नागरिकों ने राज्य की कार्रवाई के ख़िलाफ़ लोकतांत्रिक तरीक़े से विरोध किया लेकिन पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर सीधे गोलियां चलाईं। पुलिस की गोलीबारी में 2 लोगों की मौत हो गई और 20 से अधिक लोग घायल हो गए। अपने परिवार को पुलिस के हमले से बचाने के लिए दौड़े मोइनुल हक़ को बर्बरता से गोली मार दी गई और एक कैमरामैन, जो पुलिस कर्मियों के साथ था, बार-बार उनके मृत शरीर पर कूदकर वार करता रहा। इस घटना का एक भयानक वीडियो फ़ुटेज वायरल हुआ जिसमें कैमरामैन द्वारा मृतक के शव के साथ अमानवीय कृत्य और पुलिस की बर्बरता को दर्शाया गया है।

इन घटनाओं के तुरंत बाद एस आई ओ ने राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन का फ़ैसला किया और मुस्लिम संगठनों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ हमने असम का दौरा किया।

शुरू में हम उप-आयुक्त के पास गए जिन्होंने इस घटना को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी कि ये एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी जो घटित नहीं होनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि वे मामले की जांच कर रहे हैं। उन्होंने हमें घटना क्षेत्र में प्रवेश न करने की चेतावनी दी क्योंकि धारा 144 लागू की जा चुकी थी। फिर हमने पुलिस अधीक्षक से बात की। उन्होंने पुलिस कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश की और इस घटना को पुलिस पर भीड़ के हमले के रूप में चित्रित किया। उन्होंने कहा कि उन्हें गोली चलाने करने के लिए मजबूर किया गया क्योंकि हिंसा को शांत करने के लिए उनके शुरुआती प्रयास व्यर्थ साबित हुए थे। लेकिन क्षेत्र के लोग उनके इस तर्क से असहमत हैं। वे कहते हैं कि जिन लोगों को बेदख़ली का नोटिस मिला उनमें से अधिकांश पहले ही वहां से चले गए थे। शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे केवल वही लोग थे जिनके पास पुनर्वास का कोई साधन नहीं था।

हमने लगभग एक घंटे तक इस मामले पर असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा के साथ भी चर्चा की। उन्होंने इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बारे में खेद व्यक्त किया और उस पत्रकार की करतूत की निंदा की जिसे उसके जुर्म के लिए गिरफ़्तार किया जा चुका था। उन्होंने आगे कहा कि मामले की छानबीन के लिए न्यायिक जांच का आदेश दिया गया है और धारा 144 लागू होने के बावजूद क्षेत्र का दौरा करने की विशेष अनुमति भी मुहैया कराई।

राज्य के अधिकारियों के साथ औपचारिक बैठक के बाद, हमने ने शहीद मोइनुल हक़ के घर का दौरा किया और उनके भाइयों और परिजनों से बात की। मोइनुल हक़ लंबे समय से खेतिहर मज़दूर थे और उनकी पत्नी पास की आंगनवाड़ी में सहायिका का काम करती हैं। उनका सबसे छोटा बच्चा आंगनवाड़ी जाता है और दो बड़े बच्चे प्राथमिक विद्यालय में जाते हैं। एस आई ओ ने विस्तार से पूछताछ करने के बाद मोइनुल हक़ के बच्चों को पूरी शैक्षिक सहायता देने की पेशकश की।

इसके बाद हम स्थानीय लोगों की मदद से शहीद की क़ब्र पर गए। उन्होंने हमें वह डंडा भी दिखाया जो उसने गोली मारे जाने के दौरान उठाया था।

वहां से हम शेख़ फ़रीद के घर गए। 12 साल के फ़रीद की अपने आधार कार्ड को लेकर घर लौटते समय गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। हम उसकी दुःखी मां को सांत्वना देने में असहाय थे, जिन्होंने अभी-अभी अपने सबसे छोटे बच्चे को खो दिया था। उसकी क़ब्र घर के बहुत नज़दीक खोदी गई थी। हमने पास के मदरसे का भी दौरा किया और वहां कई लोगों से बात की। हमने देखा कि बहुत से लोग जिन्हें बेदख़ल कर दिया गया था, उनके पास पुनर्वास के लिए बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। प्रतिनिधिमंडल ने आसपास के दो स्कूलों का भी दौरा किया और सुनिश्चित किया कि वहां पर्याप्त भोजन और दवाएं उपलब्ध हों।

क्षेत्र के कई लोगों से बातचीत करने के बाद हमने निष्कर्ष निकाला कि पुलिस फ़ायरिंग और राज्य प्रायोजित हिंसा के बारे में उचित जांच की जानी चाहिए। निर्दोषों के साथ हिंसा करने वाले दोषियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। असम के बंगाली मुसलमानों के ख़िलाफ़ हुईं पूर्व की सभी घटनाओं में दोषियों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया था और इन घटनाओं की पुनरावृत्ति के पीछे मुख्य कारण दोषियों के ख़िलाफ़ उचित कार्रवाई न होना ही है। दरांग ज़िले के निवासियों के सामने एक और बड़ी समस्या ब्रह्मपुत्र नदी की मौसमी बाढ़ है। राज्य प्रशासन द्वारा समस्या के निवारण के लिए उचित और व्यवस्थित उपाय किए जाने चाहिए और उनका उचित पुनर्वास सुनिश्चित करना चाहिए। अक्सर निवासी इसकी अनुपजाऊता के कारण पुनर्वास की प्रस्तावित भूमि को स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त उपाय किए जाने चाहिए कि पुनर्वासित भूमि उपजाऊ और रहने योग्य हो।

हम बंगाली मूल के निवासियों या ‘मियां’ समुदाय के मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़ेनोफ़ोबिक अभियानों के बारे में जानते हैं। पिछले 5 वर्षों में हुई घटनाओं, निष्कासन और पलायन से यह साफ़ है कि शिकार हमेशा मुस्लिम किसान रहे हैं जिनकी भाषा बंगाली थी। ये समुदाय बहुत अधिक ग़रीब और हाशिए पर जीवन व्यतीत करने वाले हैं। वे बेहद बुरी सामाजिक परिस्थितियों में रह रहे हैं। हज़ारों मुसलमानों में से वहां केवल एक वकील, कुछ सैनिक तथा पुलिस कर्मी हैं। आबादी का बड़ा हिस्सा या तो किसानों या खेतिहर मज़दूरों पर आधारित है।

जमाअत-ए-इस्लामी और अन्य समूहों के के नेतृत्व में सक्रिय राहत गतिविधियां शुरू करने का निर्णय लिया गया है। हम यह सुनिश्चित करने के लिए भी कोशिश करेंगे कि पीड़ित परिवारों को प्रशासन की तरफ़ से पर्याप्त मुआवज़ा मिले। एस आई ओ ने इस गंभीर और चिंताजनक मामले में आगे रहने का फ़ैसला किया है जब तक कि सभी पीड़ितों को न्याय नहीं मिलता और ‘मियां’ समुदाय को असम में एक सम्मानजनक और गरिमापूर्ण जीवन नहीं मिल जाता।

– सलमान अहमद

(लेखक एस आई ओ ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। यह लेखक द्वारा असम के दरांग ज़िले में अपनी यात्रा के दौरान दर्ज अनुभवों का एक संग्रह है।)

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