किसान आंदोलन को कमज़ोर करने के लिए पत्रकारिता पर हमले

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पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर हमेशा सरकारी तंत्र का दबाव रहा है लेकिन हाल के कई वर्षों के अनुभव हमें यह बताते हैं कि पत्रकारिता अपने समय के बेहद मुश्किल दौर से गुज़र रही है। जहां एक तरफ़ पिछले कई दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का पहरा बना हुआ है और सरकार की अनथक कोशिशों के बाद भी प्रशासन इस बात में सफ़ल नहीं हो पा रहा है कि आंदोलन को ख़त्म करा सके तो अब सरकार और प्रशासन ने एक नया तरीक़ा अपनाया है – आंदोलनकारियों के साथ-साथ उसे कवर कर रहे पत्रकारों को गिरफ़्तार करने का तरीक़ा। सरकार ऐसे पत्रकारों को निशाना बना रही है जो इस आंदोलन को पूरी तत्परता के साथ कवर कर रहे हैं और संसाधनों की कमी के बावजूद सही जानकारी सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंचा रहे है क्योंकि मुख्यधारा की मीडिया से अब कोई उम्मीद नहीं बची है।

हालिया मामला सिंघू बॉर्डर से गिरफ़्तार स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पुनिया का है जिन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 186, 353 और 332 सहित विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज की गई प्राथमिकी के आधार पर गिरफ़्तार करके तिहाड़ जेल भेज दिया गया था। पुनिया पर सिंघू बॉर्डर पर दिल्ली पुलिस के एसचओ से अभद्रता के आरोप लगाए गए थे। इससे पहले पुनिया के साथ दूसरे पत्रकार धर्मेंद्र सिंह को भी हिरासत में लिया गया था लेकिन पुलिस ने धर्मेंद्र को बाद में छोड़ दिया जबकि पुनिया के ख़िलाफ़ आरोप दर्ज कर लिया था।

मंदीप पुनिया की गिरफ़्तारी को लेकर कई सवाल खड़े किए गए। जहां एक तरफ़ पत्रकारों ने दिल्ली पुलिस हेडक्वार्टर के बाहर प्रदर्शन किया तो दूसरी तरफ़ विपक्षी दलों के नेताओं ने भी इस कार्यवाही की आलोचना करते हुए सरकार पर निशाना साधा। समय रहते प्रदर्शनों के चलते दिल्ली पुलिस नें मंदीप को जज के सामने पेश किया जहां उनकी ज़मानत मंज़ूर करते हुए जज ने कहा कि ‘शिकायतकर्ता, पीड़ित और गवाह सिर्फ़ पुलिसकर्मी ही हैं, इसलिए इस बात की कोई संभावना नहीं है कि आरोपी/प्रार्थी किसी पुलिस अधिकारी को प्रभावित कर सकता है।’ जज ने एफ़आईआर दर्ज करने में लगभग सात घंटे की देरी को लेकर भी टिप्पणी की। जेल से बाहर आने पर जो व्यथा मंदीप ने सुनाई वह पुलिस की मंशा और उसके काम करने के तरीक़े पर गंभीर सवाल खड़े करती है। मंदीप ने बताया कि जिस रात उन्हें पुलिस ने उठाया उस रात थाने में उनके साथ बुरी तरह मारपीट की गई। सिंघू बॉर्डर के आसपास रातभर पुलिस वैन में उन्हें घुमाया जाता रहा और मेडिकल करने के दौरान डॉक्टर पर भी फ़र्ज़ी रिपोर्ट बनाने का दबाव पुलिस द्वारा बनाया गया।

पत्रकारों के दमन का यह कोई पहला मामला नहीं है। जब भी कोई पत्रकार ईमानदारी के साथ अपना फ़र्ज़ निभाता है, सरकार से सवाल करता है या सरकार की नाकामियों को रिपोर्ट करने की कोशिश करता है तो सरकार उस पर फ़र्ज़ी और मनगढ़ंत आरोप लगाकर गिरफ़्तार कर लेती है। हाथरस गैंगरेप को कवर करने वाले केरल के पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन का मामला ले लीजिए। हाथरस मामले पर सरकार और प्रशासन की नाकामी सबके सामने है। जब सिद्दीक़ कप्पन उस नाकामी को रिपोर्ट करने पहुंचे तो उन्हें फ़र्ज़ी आरोपों के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया। कहा गया कि उनका सम्बन्ध पीएफ़आई से है और वे हाथरस में धार्मिक वैमनस्य फैलाने की कोशिश कर रहे थे। जबकि उनकी पत्नी का कहना है कि सिद्दीक़ के पास हाथरस आने के लिए किराये के पैसे भी नहीं थे। वे अपने साथियों की मदद से हाथरस रिपोर्ट करने पहुंचे थे।

फ़िलहाल सिद्दीक़ कप्पन जेल में हैं। उनकी मां ज़िन्दगी और मौत की जंग लड़ रही हैं। सिद्दीक़ उनसे मिलने के लिए अदालत से पांच दिन का समय मांग रहे हैं लेकिन व्यवस्था के मारे सिद्दीक़ को इसकी भी इजाज़त मिलने में मुश्किलें आ रही हैं।

ऐसा ही मामला पत्रकार प्रशांत कनौजिया का था। उत्तर प्रदेश सरकार ने फ़र्ज़ी मामलों में उन्हें दो बार गिरफ़्तार किया। पहली बार जब सुप्रीम कोर्ट से उन्हें ज़मानत मिली, उस समय जज ने उन्हें  तत्काल रिहा करने का आदेश देते हुए कहा था कि ‘संविधान में प्रदत्त स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार पवित्र है। इससे समझौता नहीं किया जा सकता। चूंकि इस मामले में जरूरत से ज्यादा कार्रवाई की गई है, लिहाजा उसी के मद्देनजर यह आदेश दिया जा रहा है।’

यह सिलसिला यहीं नहीं थमता। हाल ही में किसान आंदोलन के चलते अनेक पत्रकारों पर एफ़ आई आर दर्ज की गई है जिसमें राजदीप सरदेसाई, सिद्धार्थ वरदराजन, मृणाल पांडे, विनोद के. जोस, ज़फ़र आगा, परेश नाथ और अनंत नाथ जैसे पत्रकारों का नाम शामिल है।

पत्रकारों की गिरफ़्तारी और उनपर मुकदमों के महज़ ये कुछ मामले ही नहीं हैं, ऐसे सैकड़ों मामले हैं जो पत्रकारिता को कमज़ोर करने का काम कर रहे हैं। कहा जाता है कि पत्रकार समाज की सच्चाई को दुनिया के सामने लाता है और सरकार से सवाल करके सरकार की कमियों को उजागर करता है। लेकिन जिस तेज़ी से पत्रकारों पर कारवाई की जा रही है उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सरकार किस तरफ़ जा रही है! रवीश कुमार की यह टिप्पणी हमारे दौर के लिए कितनी जीवंत मालूम होती है – “सरकार की अगर यही इच्छा है तो इस बजट में प्रधानमंत्री जेल योजना लांच हो, मनरेगा से गांव-गांव में जेल बने और हर बोलने वाले को जेल में डाल दिया जाये। उन जेलों कि तरफ़ देखने वाले को भी जेल में बंद कर दिया जाये और मुनादी करा दी जाये की प्रधानमंत्री जेल योजना लांच हुई है। कृपया खामोश रहें।”

एमडी स्वालेह अंसारी

इलाहाबाद विश्वविद्यालय

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