दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पत्रकारों की यह दुर्दशा क्यों?

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Image Source: Newslaundry

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना गया है। इसने देशों के उतार-चढ़ाव में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। हर दौर में इस पेशे को गरिमा की निगाह से देखा गया है कि पत्रकार समाज का आईना होता है, वह हर तरह की बुराई के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है और समाज को ख़बरदार और सतर्क करता है, सरकार और शासकों की ग़लत नीतियों की निशानदेही करके सुधार की संभावनाएं पैदा करता है, जनता की समस्याओं को सरकार के समक्ष पूरी निडरता के साथ रखता है, और सार्वजनिक जीवन को बेहतर बनाने के लिए हमेशा तैयार रहता है।

संक्षेप में कहें तो वह अपने लिए नहीं जीता बल्कि समाज के लिए जीता है। यही वजह है कि मौसमों और हालात की सख़्ती उसे रोक नहीं पाती, बल्कि वह हर परिस्थिति में अपना कर्तव्य निभाता है।

किसी बड़े बदलाव या क्रांति के समय में पत्रकारिता और पत्रकारों की महत्वपूर्ण भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता। हमारे देश की आज़ादी में भी पत्रकारिता ने अहम योगदान दिया है, यही वजह है कि जब पत्रकारिता पर आंच आती है और पत्रकारों को परेशान किया जाता है, ख़ास तौर पर लोकतांत्रिक देशों में, तो हैरत से ज़्यादा अफ़सोस होता है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इसीलिए कहा जाता है कि पत्रकारिता की आज़ादी में ही लोकतंत्र की स्थिरता निहित है।

अब तक भूमिका के तौर पर हमने जो कुछ कहा, वो नया नहीं है। पत्रकारिता की महत्ता और ज़रूरत से हर व्यक्ति परिचित है। लेकिन इसके बावजूद अगर हमारे देश में पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं तो यह चिंताजनक और परेशान करने वाली बात है। बीते कुछ सालों में पत्रकारों के साथ सरकार का जिस तरह का बरताव रहा है, वो बहुत ही चिंताजनक है। प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, और इंडिया जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने इन कारवाइयों की निंदा की है।

आंकड़ों से समझते हैं

Press Freedom Index में 180 देशों की सूची में भारत 142वें स्थान पर है। 2016 में भारत 133वें स्थान पर था जो 2021 आते-आते 142वें स्थान पर आ गया।

The Wire की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ हमारे देश में पिछले पांच सालों में पत्रकारों पर 200 से अधिक गंभीर हमले हुए हैं। ‘Getting Away With Murder’ के मुताबिक़ 2014 से 2019 के बीच भारत में 40 पत्रकारों की मौत हुई, जिनमें 21 पत्रकारों की हत्या की वजह उनके काम से जुड़ी थी। साल 2010 से अब तक 30 से ज़्यादा पत्रकारों की हत्या के मामलों में सिर्फ़ 3 को दोषी ठहराया गया है। अध्ययन से पता चला कि पत्रकारों के हत्यारे पुलिस की लापरवाही से बच जाते हैं। रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि इस दौरान तक़रीबन 19 महिला पत्रकारों पर भी हमले हुए।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ 2019 में देश भर में 11 से 21 दिसंबर के बीच पुलिस द्वारा 14 पत्रकारों पर हमला किया गया और उन्हें डराया-धमकाया गया। इनमें बड़ी संख्या मुस्लिम पत्रकारों की है। न्यूयॉर्क स्थित संस्था Polis Project ने मई 2019 से अगस्त 2021 के बीच 228 पत्रकारों पर हमले होने की बात कही है। Polis Project ने अलग-अलग विषयों की कवरेज के दौरान हुईं घटनाओं को जमा किया है। उसके मुताबिक़ जम्मू-कश्मीर में 51, सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शनों के दौरान 26, दिल्ली दंगों के दौरान 19 और कोविड मामलों की कवरेज के दौरान 46 घटनाएं हुईं। किसान आंदोलन के दौरान पत्रकारों के ख़िलाफ़ हिंसा की अब तक 10 घटनाएं हो चुकी हैं, जिसमें कथित तौर पर गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र के बेटे द्वारा की गई पत्रकार की हत्या भी शामिल है। बाक़ी 104 घटनाएं पूरे देश से अलग-अलग विषयों और समय से जुड़ी हैं।

सरकार भी निरंतर इन पत्रकारों को निशाना बनाती रही है। जो पत्रकार सरकार की ग़लत नीतियों को जनता के सामने पेश कर रहे हैं, उन्हें डरा-धमका कर झूठे मामलों में फंसाया जा रहा है। उन पर यूएपीए जैसे कठोर क़ानून लगा कर उनकी आवाज़ को दबाया जा रहा है। पिछले साल 5 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के हाथरस जाते समय केरल के पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन को गिरफ़्तार कर उन पर यूएपीए लगा दिया गया। वहीं किसान आंदोलन की कवरेज कर रहे स्वतंत्र पत्रकार मंदीप पुनिया को पहले पुलिस द्वारा हिरासत में लेकर पीटा गया, फिर जेल भेज दिया गया, हालांकि मंदीप लगातार बिना डरे आंदोलन को कवर करते रहे।

अभी हाल ही में त्रिपुरा मामले में सरकार ने 102 लोगों पर यूएपीए लगाया जिनमें 5 पत्रकार थे। साथ ही दो महिला पत्रकारों पर भी मुक़दमा दर्ज किया गया। वहीं रिपोर्टिंग करने गए इंडिया टुमारो के पत्रकार के साथ त्रिपुरा पुलिस ने घंटों पूछताछ की। सोचने वाली बात है कि आख़िर भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में पत्रकारों की यह हालत क्यों है? सरकार की इन पत्रकारों से क्या दुश्मनी है? क्या सरकार की ग़लत नीतियों को उजागर करना ग़लत है? क्या जनता की समस्याओं को सरकार के सामने लाना ग़लत है? क्या अपने काम को पूरी ईमानदारी के साथ करना ग़लत है? या फिर क्या ज़ुल्म को ज़ुल्म और ज़ालिम को ज़ालिम कहना ग़लत है? ये वो सवाल हैं जिनका सामना आज की सरकारों से है और समाज से भी है कि क्या नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले पत्रकारों को आज का समाज इसी हालत में छोड़ देगा या उनके साथ खड़ा होगा!

– साद शम्स

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