अब्दुल जब्बार : भोपाल गैस पीड़ितों के संघर्ष का चेहरा

2-3 दिसंबर 1984 की मध्य रात्री को भोपाल की यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से निकली जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस ने हजारों लोगों की जान ले ली थी।आज भी भोपाल की इस त्रासदी को याद करते हुए लोग सिहर उठते हैं।अब्दुल जब्बार ने इस हादसे  में अपने माता-पिता को खो दिया था। गैस का उन पर भी काफी असर हुआ था। उनके फेफड़े और आंखें इससे प्रभावित हुए थे और उन्हें कई बीमारियां भी हो गई थीं। अपने इस संघर्ष के बूते ही वे करीब पौने 6 लाख गैस पीड़ितों को मुआवजा और यूनियन काबाईड के मालिकों के खिलाफ कोर्ट में मामला दर्ज कराने में कामयाब रहे।

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आज जबकि पूरा देश भोपाल त्रासदी को पुनः याद करते हुए न सिर्फ सिहर उठता है ब्लकि उसके बाद के संघर्षों, सरकार के रवैये और पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के संघर्ष की चर्चा भी जरूर करता है।स्वाभाविक है कि यूनियन कार्बाईड फैक्ट्री की लापरवाही ने न सिर्फ हजारों की जिंदगियों को मौत के मूँह में धकेल दिया बल्कि उससे प्रभावित लोगों की आने वाली नस्लों को भी अपंगता का सौगात दे दिया जिससे उबर पाना मुश्किल हो।
विश्व की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी ‘भोपाल गैस कांड’ के पीड़ितों के हितों हेतु पिछले करीब 35 साल से संघर्षरत प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल जब्बार का गत 14नवंबर2019 को हुआ निधन,एक अपूर्णीय क्षति है।
2-3 दिसंबर 1984 की मध्य रात्री को भोपाल की यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से निकली जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस ने हजारों लोगों की जान ले ली थी।आज भी भोपाल की इस त्रासदी को याद करते हुए लोग सिहर उठते हैं।अब्दुल जब्बार ने इस हादसे  में अपने माता-पिता को खो दिया था। गैस का उन पर भी काफी असर हुआ था। उनके फेफड़े और आंखें इससे प्रभावित हुए थे और उन्हें कई बीमारियां भी हो गई थीं। वे जीवन भर इस त्रासदी से पीड़ित हुए परिवारों और लोगों के लिए काम करते रहे जिन्हें भूलाया नहीं जा सकता।अपने इस संघर्ष के बूते ही वे करीब पौने 6 लाख गैस पीड़ितों को मुआवजा और यूनियन काबाईड के मालिकों के खिलाफ कोर्ट में मामला दर्ज कराने में कामयाब रहे।
अब्दुल जब्बार भाई ने इस संघर्ष को स्वाभिमान के साथ लड़ा।उन्होंने ‘ख़ैरात नहीं रोजगार चाहिए’ का नारा दिया और संगठन का नाम रखा भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन।संघर्ष के साथ उन्होंने गैस पीड़ित महिलाओं के स्वरोजगार के लिए सेंटर की स्थापना की थी जिसे ‘स्वाभिमान केंद्र’ का नाम दिया गया।
अपने आखिरी महीनों में जब वे गंभीर रूप से बीमार थे, तब भी उनकी पहली चिंता अपनी बीमारी नहीं बल्कि भोपाल के ऐतिहासिक पार्क ‘यादगारे शाहजहांनी पार्क’ बचाने की थी, जिसके अतिक्रमण के खिलाफ उन्होंने मोर्चा खोल दिया था और इसमें सफल भी रहे।
गैस पीड़ितों की लड़ाई उन्होंने किस निस्वार्थ तरीके से लड़ी है इसका अंदाजा उनके इलाज, घर और परिवार की स्थिति को देख कर लगाया जा सकता है।एक समाज के तौर पर हम सबके लिए यह शर्मनाक है कि लाखों लोगों के हक की लड़ाई लड़ने वाला अपने आखिरी और सबसे मुश्किल समय में अकेला था।कहते हैं कि जिस शख्स ने अपनी पूरी जिंदगी अपने जैसे लाखों गैस पीड़ितों की लड़ाई लड़ते हुए बिता दी और जिसके संघर्षों के बदौलत भोपाल के गैस पीड़ितों को मुआवजा और स्वास्थ्य सुविधाएं मिली,उसके जनाजे और श्रद्धांजलि सभा में शामिल होने के लिए उम्मीद से बहुत कम लोग समय निकाल सके। इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है।ईश्वर से प्रार्थना है कि उन्हें स्वर्ग में जगह दें। बहरहाल जब्बार भाई का जाना भोपाल गैस पीड़ितों के संघर्ष को एक ऐसी क्षति है जिससे उबरना बहुत मुश्किल होगा।
जब भी भोपाल गैस पीड़ितों और उनके संघर्ष की चर्चा होगी तब तब संघर्ष के चेहरे अब्दुल जब्बार भी सदैव याद किए जाते रहेंगे।

✒️Manzar Alam (स्वतंत्र टिप्पीकार)

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