बुल्ली बाई: मुस्लिम महिलाओं के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त इस्लामोफ़ोबिया और दुश्मनी

यह देश में बेरोज़गारी का एक और दुष्परिणाम है जहां युवा इस तरह के घटिया ऐप्स विकसित करके ख़ुद को व्यस्त रखते हैं क्योंकि हमारे देश में शिक्षा की स्थिति भी किसी से छुपी नहीं है। वे इस बात से ख़ुश हैं कि वे इस तरह के काम करके मुसलमानों को परेशान कर रहे हैं, लेकिन वे ख़ुद इस तथ्य से अपरिचित हैं कि सरकार के पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है, चाहे वह बुनियादी सुविधाएं हों, स्वास्थ्य सेवाएं हों या शिक्षा और रोज़गार हो, इसलिए उन्हें नफ़रत परोसी जा रही है और नफ़रत के साथ जीना सिखाया जा रहा है।

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नव वर्ष की पूर्व संध्या थोड़ी भावुक थी और हममें से अधिकांश के लिए निराशाजनक भी, जिन्होंने आउटलुक इंडिया में उमर ख़ालिद की जेल डायरी पढ़ी, लेकिन उस समय तक हमें नहीं पता था कि पहली जनवरी को क्या घृणित वास्तविकता सामने आने वाली थी।

भारत में मुसलमान हर आने वाले दिन के साथ एक नई वास्तविकता का सामना करने के लिए मजबूर हैं जो पिछली से बदतर ही होती है।

आज के भारत में हम नहीं जानते कि हमारे आसपास की जनता कब, कहां और किस बेहूदा बात के लिए भीड़ का रूप धारण कर लेगी और धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर किसी को भी लिंच कर देगी। हमारे पास ऐसे कई उदाहरण हैं जहां मुसलमानों को एक आसान लक्ष्य के रूप में देखा गया और राष्ट्र निर्माण और उसकी धर्मनिरपेक्ष पहचान के नाम पर उन्हें पीट-पीटकर मार दिया गया या झूठे आरोपों के तहत सलाखों के पीछे डाल दिया गया। इस पर पहले से ही लिखा जाता रहा है और लिखा जा रहा है, इसीलिए मैं यह चर्चा नहीं करना चाहती कि ‘सुल्ली डील्स’ और ‘बुल्ली बाई’ जैसी वेबसाइट्स या ऐप्स और इसके उपयोगकर्ता अचानक कहां और कैसे दिखाई देते हैं। बल्कि मैं मुसलमानों के ख़िलाफ़ इस तरह के घृणित एजेंडे के ज़मीनी कारणों पर चर्चा करना चाहती हूं कि इस तरह के अनैतिक कृत्य पर बहुसंख्यक चुप क्यों हैं?

अगर हम यह सोच रहे हैं कि हमारे देश में सब कुछ ठीक चल रहा है तो हम या तो अज्ञानी हैं या ट्विटर का उपयोग नहीं करते हैं जहां हर आने वाले दिन मुसलमानों के ख़िलाफ़ ट्रेंड्स चलते हैं। हाल ही में धर्म संसद का मुद्दा, उससे पहले गुरुग्राम में नमाज़ पर विवाद, और उससे पहले सुल्ली डील्स; ये सभी ज्वलंत मुद्दे अपना काम यानि नफ़रत का एजेंडा पूरा कर गए और मुख्यधारा की ख़बरों या प्राइम टाइम की बहसों में उन्हें स्थान नहीं मिला।

हाल‌ ही में 1 जनवरी 2022 को, जब लोग नए साल के आगमन का उत्सव मना रहे थे, ठीक उसी दिन कुछ मुस्लिम महिलाओं के लिए एकदम भिन्न स्थिति पैदा कर दी गई। उन्हें ऑनलाइन नीलाम किया गया, और आप सोच सकते हैं कि जब उन्हें इसकी जानकारी मिली होगी तो उनकी पहली प्रतिक्रिया क्या रही होगी – हो सकता है कि वे एक सेकंड के लिए ठिठक गयीं हों कि यह उनके लिए किस तरह का साल होगा जो इस तरह के बेहूदा घटना से शुरू हो रहा है।

‘बुल्ली बाई’, ‘सुल्ली डील्स’ का एक अपडेटेड वर्जन है जिसने पहले से ही मुस्लिम महिलाओं एवं उनके परिवारों को मानसिक रूप से प्रभावित किया है। एक समुदाय के लिए इस तरह की नफ़रत का कारण इस विचार से प्रेरित है कि भारत यहां रहने वाले मुसलमानों के लिए नहीं बल्कि हिंदुओं के लिए उनका घर है। हमने देखा है कि गंभीर से गंभीर मामलों में भी यदि अभियुक्त हिंदू है तो उसे सज़ा मिलने की संभावना कम है और जेलों में छोटे या लगभग मनगढ़ंत अपराधों में बहुत-से मुसलमान सालों से सज़ा काट रहे हैं।

यहां सवाल उठता है कि वे मुस्लिम महिलाओं को क्यों निशाना बनाते हैं? वे इतना घिनौना एजेंडा क्यों लेकर आते हैं? इसका उत्तर यह है कि मुस्लिम महिलाएं अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति तुलनात्मक रूप से अधिक मुखर हैं। यह एक कड़वा सच है कि एक छोटा वर्ग (या कहा जाए कि अल्पसंख्यकों में भी अल्पसंख्यक वर्ग) उच्च शिक्षा के साथ-साथ ऐसे ज़िम्मेदार पदों तक पहुंचा है जिसके कारण आसानी से वह नफ़रत या ईर्ष्या का शिकार हो सकता है। लेकिन क्या नैतिकता का स्तर इतना गिर सकता है कि उनकी ऑनलाइन बोली लगाई जाए? या ऐसा इसलिए होता है क्योंकि किसी भी समुदाय में महिलाएं ही आसान लक्ष्य होती हैं? लेकिन फिर ऐसा करने से उन्हें किस तरह की प्रसन्नता मिलती है? मुझे पूरा यक़ीन है कि वे लोग उन बहादुर महिलाओं को एक वाक्य भी आमने-सामने नहीं बोल सकते।

यह देश में बेरोज़गारी का एक और दुष्परिणाम है जहां युवा इस तरह के घटिया ऐप्स विकसित करके ख़ुद को व्यस्त रखते हैं क्योंकि हमारे देश में शिक्षा की स्थिति भी किसी से छुपी नहीं है। वे इस बात से ख़ुश हैं कि वे इस तरह के काम करके मुसलमानों को परेशान कर रहे हैं, लेकिन वे ख़ुद इस तथ्य से अपरिचित हैं कि सरकार के पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है, चाहे वह बुनियादी सुविधाएं हों, स्वास्थ्य सेवाएं हों या शिक्षा और रोज़गार हो, इसलिए उन्हें नफ़रत परोसी जा रही है और नफ़रत के साथ जीना सिखाया जा रहा है।

‘बुल्ली बाई’ जैसे ऐप्स और वेबसाइट्स मुस्लिम महिलाओं के बीच अपने ही देश में अलगाव की भावना और उनमें ऑनलाइन नीलाम होने का भय और असुरक्षा पैदा कर रहे हैं। यह उभरते हुई आवाज़ों को एक ग़लत संदेश देता है कि वे संभवतः ‘बुल्ली बाई’ पर अगला लक्ष्य हो सकते हैं।

भारत में मुसलमानों को ज़्यादातर पिछड़े लोगों के रूप में गिना जाता है लेकिन सवाल यह है कि हम एक ऐसे समुदाय से प्रगतिशील विचारों की उम्मीद कैसे कर सकते हैं जो आर्थिक, भौगोलिक और नैतिक रूप से मुख्यधारा के विकासशील क्षेत्रों से अलग है? फिर भी, वे मुख्यधारा में आने का प्रयास करते हैं, और फिर इस तरह के ऐप्स द्वारा उस समुदाय की महिलाओं को मानसिक रूप से परेशान किया जाता है। मुस्लिम परिवारों में बेटियों का क्या संदेश मिलेगा? इसका उनके माता-पिता पर क्या प्रभाव पड़ेगा? या तो वे उनकी शिक्षा और सक्रियता को बंद कर देंगे या उन्हें सुरक्षा देने की तलाश में जल्द ही उनकी शादी कर देंगे। ऐसे मामलों में सज़ा न दिए जाने के उदाहरण माता-पिता को ग़लत संदेश देते हैं। उन्हें चुप करा देना ग़लत है क्योंकि इस तरह के घृणित एजेंडे के बाद कई महिलाएं आवाज़ उठाना बंद कर देंगी।

एक देश अपने लोगों से बनता है, सभी धर्मों, जातियों और वर्गों के लोगों से। इस मामले ने कुछ लोगों को तोड़ दिया कि उनके धर्मनिरपेक्ष मित्र इस पर चुप हैं। नैतिकता का तक़ाज़ा यह है कि बहुसंख्यक समुदाय के लोगों को मुसलमानों और विशेष रूप से मुस्लिम महिलाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना चाहिए और ऐसी परिस्थितियों में यह और भी आवश्यक हो जाता है जहां उनकी चुप्पी उन्हें संदेह के घेरे में ला सकती है। मैं आशा करती हूं और दिल से चाहती हूं कि हमारे समुदायों और अन्य समूहों के लोग भी इस्लामोफ़ोबिक प्रचार के ख़िलाफ़ बोलने में भाग लें क्योंकि उनकी ख़ामोशी हमें उस दौर में ले जा सकती है जब हमारी मुस्लिम पहचान पर क़ायम रहना ही हमारी बहादुरी होगी।

नमराह रिज़्वी

अनुवाद: ज़िकरा अनम

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