नारीवाद या बाज़ारवाद?

इनका विमर्श बाज़ार समर्थक विमर्श है। बाज़ार और उसकी थोपी हुए मानसिकता पर ये लोग कभी प्रश्न नहीं उठाते, और जिस दिन उठाएंगे टीवी और मीडिया इनको इतना महत्व देना बंद कर देगा। टीवी और मीडिया उन्हीं को महत्व देते हैं जो बाज़ार आधारित ‘पापुलर संस्कृति’ के समर्थक है!

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2030

बाजारवादी कल्चर ने अब अमीर तबके से आने वाली महिलाओं का एक ऐसा वर्ग सृजित किया है जो बाज़ारवाद से संतुष्ट तथा बाज़ारवाद की राह में रोड़ा बनने वाली हर वस्तु से असंतुष्ट है. खुदको नारी विमर्श की झंडा वाहक समझने वाली ये नारियां खुद कब बाज़ारवाद की गुलाम हो गयी और इन्हें मालूम भी नहीं हुआ! इनका दिमाग पूरी तरह से बाज़ार के शिकंजे में जकड़ चुका है, और बाज़ार कब इनसे स्त्री विमर्श के नाम पर मानव विरोधी विमर्श करवाने लगा इन्हें खुद आभास भी न हुआ। इनका स्त्री विमर्श, महिलाओं के अधिकारों की पुरज़ोर वकालत तो करता है, लेकिन सिर्फ पुरुष विरोध करते हुए। स्त्रियों का वो शोषण जो पूंजीवाद की देन है उसे भी ये वर्ग पितृसत्ता की उपज बताते हुए ये तबका बड़ी ही चालाकी से बाज़ार और पूंजीवाद को बचा लेता है, और बाजार की गुलामी की राहें हमवार कर उसे और मजबूत बना देता है। ऐसा नहीं है कि पितृसत्ता जैसी बुराई मौजूद नहीं हो, लेकिन बाज़ारवाद को बचाने के लिए पितृसत्ता या किसी और बुराई पर शोषण का दोष मढ़ना उस शोषण को बढ़ावा देना है।

सामान्यतः हमारे समाज में ये देखने में आता है किसी भी त्यौहार के अवसर पर साधारण से मध्यमवर्गीय परिवारों में उन त्यौहारों को मनाने के लिए, उन्हें खास बनाने के लिए स्त्रियों द्वारा कई तरह के पकवान बनाये जाते हैं, और इस सब में कई बार महिलाओं पर दबाव बढ़ जाता है और वो त्यौहारों पर बहोत अधिक एन्जॉय नहीं कर पाती, अब इस बात का विरोध स्त्रीवाद के नाम पर पुरुष विरोध में तल्लीन महिलाओं का दल यह कहकर करता है कि मर्दवादी समाज ने महिलाओं को त्यौहार के नाम पर सिर्फ किचन में खपा दिया है।  जबकि अगर हम देखे तो इन्हीं साधारण परिवारों में त्योहार को खास बनाने के लिए उस परिवार के पुरुष पर भी उतना ही दबाव होता है। पति या पिता की भूमिका में होते हुए, इन त्यौहार के अवसरों पर वो खुद के लिए सस्ता और अपने बीवी बच्चों के लिए महंगे से महंगा और अच्छा ड्रेस खरीदते हैं। खुद को दूसरों से ऊंचा दिखाने के सामाजिक दबाव के साथ जब कोई त्यौहार मनाया जाता है तो शोषण सिर्फ महिला का नहीं पुरुष का भी होता है। ये प्रेशर बाज़ारवाद की देन है, ना कि पितृसत्ता या किसी और की।

बाज़ार हर घड़ी टीवी, अखबार, मैगज़ीन्स के माध्यम से लोगों को सिखाता है कि किस तरह से उन महंगे कपड़ों में आप खास दिखेंगे, बाज़ार आपको बताता है कि त्यौहारों पर हज़ार तरह की डिश बनाने से आपका स्टेटस कितना बढ़ जाएगा!

इस मामले में होना तो ये चाहिए था कि समाजवादी हो या नारीवादी वो बाज़ार के प्रेशर पर प्रहार करते हुए उसके खतरे बताते हुए लोगों को सचेत करते कि अगर कोई चीज़ महत्वपूर्ण है तो वो लोगों के बीच का प्यार. बहुत ज़रूरी है कि दूसरों से तुलना में आपस का प्यार खत्म न हो।

अब इन दोनों ही चीज़ों में दबाव महिला और पुरुष दोनों पर होता है, परन्तु Sophisticated नारियों का नारीवाद इसे मर्दवाद एंड ब्लॉ-ब्लॉ की देन बताते हुए, पूंजीवाद आधारित बाज़ारी संस्कृति के शोषण पर बात नहीं करते? ये स्त्री विमर्श करते हुए खुद बाज़ार के लिए एक हथियार का काम करते हैं, और साधारण लोगों को स्त्री विमर्श के नाम पर बेवकूफ बनाते हैं।

इनका विमर्श बाज़ार समर्थक विमर्श है। बाज़ार और उसकी थोपी हुए मानसिकता पर ये लोग कभी प्रश्न नहीं उठाते, और जिस दिन उठाएंगे टीवी और मीडिया इनको इतना महत्व देना बंद कर देगा। टीवी और मीडिया उन्हीं को महत्व देते हैं जो बाज़ार आधारित ‘पापुलर संस्कृति’ के समर्थक है.

 

हुमा अहमद

स्वतन्त्र लेखिका एवं एक अध्यापिका के तौर पर कार्यरत

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