COVID-19! कोरोना के साथ-साथ भूखमरी भी देश की सब से बड़ी चुनौती..

हर मुंह तक भोजन पहुंचाने वाली योजनाएं निचले स्तर तक नहीं पहुंच पातीं। देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खामियां और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार ने लोगों को अकाल मौत मरने पर मजबूर कर दिया है।

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-क़ैसर नियाज़ी

आबादी के लिहाज से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश भारत के लिए भुखमरी की समस्या एक कलंक है। यह बात अलग है कि प्रशासन और सरकारें इस शब्द से छूत की तरह परहेज करती रही हैं, इसलिए इसके खिलाफ कोई कारगर कदम अबतक नहीं उठाया जा सका है।

आज कोरोना जैसी महामारी ने देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था और भुखमरी जैसी समस्याओं ने देश को गंभीर चुनातियों के सामने ला खड़ा किया है। इसका असर एक तरफ दैनिक मजदूरी पर जिंदगी गुजरने वाले गरीब मजदूर और स्लम में रहने वाले लोगों पर पड़ता दिख रहा है वही दूसरी तरफ मिडिल क्लास की जिंदगी गुज़रने वाले भी इससे छूत नही दिखई दे रहा है।

सरकार की राहत और इसका असर

सरकार ने वक़्त के साथ दूसरे चरण में देश हित के लिए कोरोना जैसी माहमारी से बचाने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन किये हुए हैं और इस लॉकडौन का दूसरा चरण भी खत्म होने को है, लेकिन इस बीच देश में भुखमरी और गरीबों की समस्या पर भी उतनी ही गंभीरता दिखानी चाहिए जितनी कोरोना की मजबूत लड़ाई में दिखाई दे रहा है। सरकार ने जो राहत पैकेज का एलान किया है, क्या वो जमीनी हकीकत पर कायम है? ये सवाल भी सभी को देश के जिम्मेदारों से जरूर पुछनी चाहिए।

अगर देश में वर्तमान महामारी से लड़ने के लिए सम्पूर्ण देश को लॉकडाउन करना ही सर्वोत्तम व्यवस्था है तो क्या इसकी तैयारी सरकार ने पहले से की थी? ये सवाल भी जरूर उठानी चाहिए।

प्रश्न तो ये भी होनी चाहिए कि देश भुखमरी जैसी महामारी से जंग आज तक जीती क्यों नही? जबकि सरकार ने तो सालों पहले खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू किया है। इस कानून का मक़सद ही सरकार कभी किसी भारतीय को भूखा सोने नहीं देगी। लेकिन सरकार इन सवालों से छुपाती दिखाई दे रही है। दूसरी तरफ़ देश में भ्रष्टाचार की एक अलग महल बन चुकी है जिससे किसी का बचना नामुमकिन दिख रहा है। भ्रष्टाचार और सरकारी घोटाले की वजह से अब तक सभी गरीब मजदूर, किसान तक मदद नही पहुंच पा रहा है, जबकि लॉकडाउन के तीसरे चरण का आगाज हो चुका है। कोरोना के साथ साथ देश में भुखमरी भी उतना ही खतरनाक साबित होगा।

विफल सरकारी नीतियां

तो फिर आखिर इस भुखमरी की वजह क्या है? पहली वजह है सरकारी नीतियों को लागू करने में खामी। इसकी वजह से हर मुंह तक भोजन पहुंचाने वाली योजनाएं निचले स्तर तक नहीं पहुंच पातीं। देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खामियां और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार ने लोगों को अकाल मौत मरने पर मजबूर कर दिया है। इसके जरिए वितरित होने वाले अनाज का 52 फीसदी या तो वितरण, परिवहन और भंडारण व्यवस्था की खामियों के चलते नष्ट हो जाता है या फिर खुले बाजार में ऊंची दर पर बेच दिया जाता है। इसके अलावा पोषण से भरपूर और बेहतर क्वालिटी के अनाज  खरीदने के मामले में आम लोगों की खरीदने की क्षमता भी भुखमरी पर काबू पाने की राह में एक प्रमुख बाधा है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोग ऐसा भोजन खरीदने में सक्षम नहीं हैं। नतीजा यह है कि वे धीरे-धीरे कुपोषण के शिकार होकर भुखमरी की ओर बढ़ते जा रहे हैं।

मीडिया की पकड़ इन गरीबो पर

मीडिया जिसे लोकतांत्रिक देश का चौथा स्तंभ मन जाता है, क्या ये अपनी जिम्मेदारी देश में उत्पन्न संकट के समय में स्वतंत्र रूप से निभा पा रही है? मीडिया अपने कामो को लेकर बिल्कुल समक्ष दिखाई नही पड़ती है। अगर देखा जाए तो इस देश में भुखमरी जैसी समस्याओ की जिम्मेदार जितनी सरकार है उतनी ही मीडिया भी है। मीडिया इन सब समस्याओं पर सरकार से सवाल और आगाह करती रहती तो शायद ये हाल इस तरह नही होता, लेकिन इस समय जनसरोकार के मुद्दे पर मीडिया सरकार की कठपुतली बन गई है। जिसपर सरकार खुश हो वो दिखाती है, इसके अलावा देश के बड़े दो समुदायों के बीच जहर डालने का काम कर रही है। जिसे जनता से जुड़े मुद्दे पर सवाल सरकार से पूछनी चाहिए वो सवाल उल्टा जनता पर थोप दी जाती है। हर मुद्दे को सांप्रदायिक बनाकर उसके आड़ में सरकार की विफलता को छुपा लिया जाता है। इस तरह देश की मेन स्ट्रीम मीडिया सरकार के पॉलिटिकल नीति को सजाने में लगी है। जो इस कोरोना संकट के समय में भी देश के सामने सांप्रदायिक मीडिया से निपटना बहुत बड़ी चुनौति है।।

जितना चिंतन कोरोना महामारी पर है उतनी ही देश की जनसरोकार से मुद्दे में प्रमुख भुखमरी और बेरोजगारी पर भी होनी चाहिए। इसके अलावा समता मूलक समाज में विश घोलती जहरीली मीडिया भी हमारे लिए चिंता का विषय होना चाहिए। तभी हम कोरोना महामारी उपरांत आए भुखमरी, बेरोजगारी एवं सांप्रदायिकता से निपट सकते हैं। इस विपरीत समय में सरकार से ज्यादा देश की जनता को जागरूक होने की जरूरत है, ताकि हम एक ही समय में मजबूती के साथ एकजुट होकर कोरोना जैसी महामारी को हरा सकते हैं। इस दौरान अपने हक़ को जानने की जरूरत है और लोकतांत्रिक देश का मतलब समझने की भी जरूरत है।

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