गणतंत्र के इस पर्व में लोकतंत्र को लेकर कुछ चिंताजनक बातें!

वर्तमान राजनीतिक दौड़ से यह महसूस होता है कि यह मात्र सत्ता का खेल है। उसी के लिए मित्र व शत्रु गढ़े जाते हैं तथा झूठे वादे किए जाते हैं।

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लोकतंत्र का अर्थ आम तौर पर अब्राहम लिंकन द्वारा प्रतिपादित परिभाषा ‘जनता की, जनता के द्वारा तथा जनता के लिए’ माना जाता है। अब अगर एक लोकतान्त्रिक सरकार को परिभाषित किया जाये तो, इसका संक्षिप्त में यह अर्थ हुआ है कि सरकार जनता द्वारा निर्वाचित तथा जनता के प्रति उत्तरदायी है। अब प्रत्येक भारतीय नागरिकों को लोकतांत्रिक सिद्धांत को नजर में रखते हुए आधुनिक भारतीय राजनीति को समझना होगा और देखना होगा कि व्यावहारिक तौर पर होने वाली राजनीति लोकतांत्रिक आदर्शों से कितनी समानता रखती है। वर्तमान में हो रही राजनीति से यह बात स्पष्ट  तो हो चुकी है कि भारतीय राजनीतिक पार्टीयो के नेता अपने भाषणों के माध्यम से लोगों को बड़े ही आसानी से आकर्षित कर लेते है । यह बात हम उस वक्त स्पष्ट रूप से महसूस करते है जब चुनावी मौसम के बादल मंडलाने लगते है तब राजनेताओं की एक लंबी भीड़ अपने चुनावी प्रचारो के दौरान किस तरह से धार्मिक विषयों को आधार बनाकर अपने भाषणों की सौन्दर्यता बढ़ाते हैं । वह लोगों को अपना कौमी नेता बनने का आभास दिलाता है। उनके भाषणों में सभ्यता, संस्कृति तथा किसी खास धर्म से जुड़े लोगों का त्याग व बलिदान तथा दूसरे धर्म के प्रति नफरत की बातें तथा भविष्य में जुड़ी विकास से संबंधित बातें जोड़कर अपने भाषणों  की सौन्दर्यता में चार चाँद लगा देता है। फिर उस सभा मे उपस्थित लोग अपने तालियो की गड़गड़ाहट से उसकी राजनीतिक रोटिया सेकने में अपना समर्थन प्रस्तुत करते हैं। यह सब बातें अभी वर्तमान में होने वाले चुनाव में आसानी से जांची जा सकती हैं । अब भारतीय नागरिकों को यह बात समझनी होगी कि यह एक तरह का राजनीतिक ट्रेन्ड है, और साथ में यह लोकतंत्र के प्रति चिंता का विषय भी। वर्तमान राजनीतिक दौड़ से यह महसूस होता है कि यह मात्र सत्ता का खेल है। उसी के लिए मित्र व शत्रु गढ़े जाते हैं तथा झूठे वादे किए जाते हैं। आज की राजनीतिक पार्टीया देश की सामाजिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक व्यवस्था से बेपरवाह होकर स्वयं को सर्वोच्च बताने की होड़ में हैं. अब यह जिम्मेदारी आम नागरिकों की है कि लोकतंत्र की परिभाषा का अर्थ यह नहीं है कि हमें चुनाव करने का अधिकार है , बल्कि उस परिभाषा में यह बात भी शामिल हैं एक लोकतांत्रिक देश में सभी नागरिकों को शारीरिक, मानसिक तथा नैतिक विकास को पूर्ण रूप से प्राप्त करने की शक्ति होती है। हमें यह बात भी समझनी चाहिए कि एक लोकतांत्रिक देश में सरकार तथा नागरिकों के मध्य पारस्परिक संबंध होते हैं। इन संबंधों का आधार नागरिक, राजनीतिक तथा सामाजिक होता है। नागरिक अधिकार वह अधिकार होते है जो व्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए आवश्यक होते हैं। इसके अतंगर्त जीवन का अधिकार एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता, भाषण देने की स्वतंत्रता तथा अपने विचारों को व्यक्त करने का अधिकार होता है । राजनीतिक अधिकार का अभिप्राय मत देने के अधिकार एवं चुनाव लड़ने के अधिकार से है। सामाजिक अधिकारों के अतंगर्त आर्थिक कल्याण, सुरक्षा तथा समाज में सम्मान का जीवन गुजारने से हैं। अगर देश का नागरिक इन सभी आदर्शों का अभाव महसूस करता हैं तो प्रत्येक नागरिकों को यह समझ लेना चाहिए कि हमने अपने आप को सिर्फ़ वोट देने तक ही सीमित कर लिया हैं जो बिल्कुल लोकतंत्र का अर्थ नहीं हो सकता। अब यह सभी भारतीयों का कर्तव्य है कि वह अपने वोट का इस्तेमाल संवैधानिक आदर्शों के आधार करे और वह इसी बुनियाद पर लोकतंत्र को अपने अधिकारों के साथ जीना सीखें.

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