फेसबुक, डिजिटल मानवाधिकार और नार्सिसिज़्म!

फेसबुक टाइमलाइन में आप मानवीय जीवन के अनंतरूपों को देख सकते हैं। यहां पर विभिन्न किस्म की घटनाओं जैसे निजी अनुभव, निजी राय, जन्मदिन, मृत्यु दिवस, शादी-ब्याह, तलाक, दलीय नीतियां आदि को देख सकते है। फेसबुक में अर्थवान और अर्थहीन दोनों ही किस्म की चीजें देखते हैं। फेसबुक एक तरह से तयशुदा संभावित समय और स्थान है जहां पर कम्युनिकेट कर सकते हैं...

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मैकलुहान के शब्दों में कहें तो “मनुष्य तो मशीनजगत का सेक्स ऑर्गन है.”

डिजिटल मानवाधिकार इससे आगे जाता है और गहराई में ले जाकर मानवीय शिरकत को बढ़ावा देता है. जो साहित्यकार फेसबुक पर सक्रिय हैं वे सोचें कि सैंकड़ों की तादाद में जो लाइक आ रहे हैं वे कम्युनिकेशन को गहरा बना रहे हैं या उथला?

कम्युनिकेशन गहरा बने इसके लिए जरूरी है डिजिटल रूढ़िवाद से बचें. डिजिटल रूढ़िवाद मशीन प्रेम पैदा करता है, तकनीक की खपत बढ़ाता है, लेकिन कम्युनिकेशन में गहराई पैदा नहीं करता. डिजिटल रूढ़िवाद की मुश्किल है कि उसके कान नहीं हैं. वह इकतरफा बोलता है, वह सिर्फ अपनी कही बातें ही सुनता है अन्य की नहीं सुनता. मसलन्, मैंने यह कहा, मैंने यह किया, मैं ऐसा हूँ, मैं यहां हूँ, मैं यह कर रहा हूँ, वह कर रहा हूँ आदि.

फेसबुक रूढ़िवादी जब फोटो के जरिए अभिव्यक्ति का जश्न मनाते हैं तो वे भूल जाते हैं कि वे वैचारिक तौर पर क्या कर रहे हैं. फेसबुक या किसी भी डिजिटल मीडियम का गहरा संबंध मानवीय क्रियाकलापों और संचार से है. फेसबुक पर लाइक या फोटो लगाने के बहाने, हम अपने भाव- भंगिमाओं और गतिविधियों का- बतर्ज मैकलहान- मशीनीकरण करते हैं, इस क्रम में पेश की गयी हर चीज अपना विलोम बनाती है.

हमें मैकलुहान की यह बात याद रखनी चाहिए.

हिन्दी के बौद्धिकों में एक बड़ा वर्ग है जो अभी मानवाधिकार चेतना को महत्वहीन मानता है. उनमें संयोग से उन लेखकों की संख्या भी अच्छी खासी है जो साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हैं. नया दौर डिजिटल ह्यूमनिज्म का है. वे लोग जो मानवाधिकारों को अब तक न समझ पाए वे डिजिटल मानवाधिकार को समझेंगे, इसमें संदेह है. मेरा इशारा उन लेखकों की ओर है जो हिन्दी में है और फेसबुक पर आए दिन फोटोबाजी करते रहते हैं, लेकिन मानवाधिकारों के प्रति कभी नहीं बोलते.

डिजिटल मानवाधिकार विलासिता के लिए नहीं है. फेसबुक पर सिर्फ फोटो लगाना, आत्मगान करना विलासिता है, हिन्दी में इसे फेसबुक रूढ़िवाद कहते हैं. असल में हम ऐसे युग में हैं जहां व्यापार ही हमारी संस्कृति है, और जहां संस्कृति ही हमारा व्यापार भी है.

फेकबुक कम्युनिकेशन के दौर में, “सामाजिक- सांस्कृतिक त्रासदियां” सबसे ज्यादा घट रही हैं लेकिन हिन्दी फेसबुक में यह सब नदारत है.

अति-कनेक्टविटी वालों का यथार्थ जीवन से अलगाव है। दूरसंचार कम्युनिकेशन पर बढ़ती निर्भरता ने सामाजिक जीवन के अर्थपूर्ण संपर्क को तोड़ दिया है. इसके कारण टाइम और स्पेस का शासन भी खत्म हो गया है। अब हम बिना जाने तत्क्षण राय देने लगे हैं, लाइक करने लगे हैं। अनजान लोगों की लाइक लाइन पगलाती रहती है। अनजान का लाइक अब पैमाना है लोकप्रियता का। अब लाइक करने वाला भी लेखक बन गया है ,उसे लेखक के बराबर दर्जा मिल गया है। फलत: लेखक और लाइककर्ता दोनों मित्र हो गए हैं। अब हम लेखक के आन्तरिक और निजी विवरणों में ज्यादा रूचि लेने लगे हैं.

फेसबुक टाइमलाइन यूनीफॉर्म, कंटीनुअस और कनेक्टेड है। नार्सिस्ट लोग (फेसबुक पर लिखी उनकी पोस्ट के संदर्भ में) इस तत्व की जानते हुए अनदेखी करते रहे हैं। नार्सिसिज़्म यानी आत्ममुग्धता और अहर्निश असत्य का प्रचार-लेखकों को इससे बचना चाहिए। फेसबुक पर इस बात को लिखना इसलिए जरूरी लगा कि क्योंकि फेसबुक पर यह नार्सिसिज़्म खूब चल रहा है। किसी के भी बारे में अनाप-शनाप लिखने की बाढ़ आई हुई है. इसमें एक पहलू वह भी है जिसमें व्यक्ति अपने बारे में खूब काल्पनिक बातें लिखता है. इस तरह की काल्पनिक और बे-सिपैर की बातें लिखना, नार्सिसिज़्म का वैचारिक धर्म है। मसलन् किसी के फोटो का दुरूपयोग, विकृतिकरण, कैरीकेचर, पर्सनल हमला करना, किसी को गलत उद्धृत करना, विषयान्तर करके निजी जीवन पर हमले करना, किसी के नाम से असत्य बोलना आदि फेसबुक पर नार्सिसिज़्म की सामान्य प्रवृत्तियां हैं और इसमें हमारे नामी और सुधीजन बाजी मारे हुए हैं। नार्सिसिज़्म वैचारिक एड्स है!

फेसबुक टाइमलाइन में आप मानवीय जीवन के अनंतरूपों को देख सकते हैं। यहां पर विभिन्न किस्म की घटनाओं जैसे निजी अनुभव, निजी राय, जन्मदिन, मृत्यु दिवस, शादी-ब्याह, तलाक, दलीय नीतियां आदि को देख सकते है। फेसबुक में अर्थवान और अर्थहीन दोनों ही किस्म की चीजें देखते हैं। फेसबुक एक तरह से तयशुदा संभावित समय और स्थान है जहां पर कम्युनिकेट कर सकते हैं। यहां वातावरण अदृश्य है. इसकी संरचनाएं और बुनियादी नियम पर्वेसिव हैं। सतह पर यह सहज कम्युनिकेशन का मीडियम है, लेकिन यह सीधे व्यक्ति के अन्तर्मन और धमनियों या नसों को प्रभावित करता है. अनेक फेसबुक लेखक इस बुनियादी तथ्य को नहीं समझते और अंट-शंट लिखते रहते हैं। अंटशंट लेखन, आत्मश्लाघा, आत्मप्रशंसा कम्युनिकेशन में पर्वर्जन है, नार्सिज्म है. फेसबुक संवाद का माध्यम है, संवाद के आरंभ होने का अर्थ है प्रौपेगैण्डा का अंत। फेसबुक पर किसी भी विचारधारात्मक सवाल पर विचार विमर्श कम्युनिकेशन में रूपान्तरित हो जाता है. वह प्रौपेगैण्डा नहीं रहता।

भारत का मीडिया इस अर्थ में अ-मानवीय है कि वह रीजन, रेशनेलिटी और जीवन के सारवान सवालों को बुनियादी तौर पर नहीं उठाता। वह मनुष्य और पशु में भेद नहीं जानता.वह विश्वसनीय ज्ञान और सूचना का स्रोत अभी तक नहीं बन पाया है। वहां बार-बार नियंत्रण के विभिन्न रूपों का अभ्यास किया जाता है। वहां मोटे तौर पर विज्ञापनदाता, राजनीतिज्ञ और चोंचलबाजों की गणित और नियंत्रण का ख्याल रखा जाता है। अप्रत्यक्ष तौर पर वे राज्य और कारपोरेट घरानों के भोंपू की तरह काम करते हैं।

मानवीय और गैर-मानवीय जीवनशैली के पहलुओं में अंतर करने तमीज अभी तक पैदा नहीं कर पाए हैं। भारत और यूरोप के मीडिया में एक अंतर है। यूरोप में मानवोत्तर दौर की ओर मीडिया प्रयाण कर रहा है, वहां सारवान मानवीय मसले उठाए जा रहे हैं। मानवीय त्रासदी और मानवाधिकारों के सवालों पर ध्यान दिया जा रहा है। भारत में इसके उलट अमानवीय , बोगस, मृत विषयों को व्यापक कवरेज दिया जा रहा है!

मैं पहले समाजवाद और क्रांति के सपने देखता था वह सपना साकार नहीं हुआ!

अब आम आदमी पार्टी के सत्तारूढ़ होकर सिस्टम बदल देने के सपने देख रहा हूँ! हे ईश्वर , कम से कम यह सपना तो पूरा कर दो! कहोगे तो रोज़ आपकी मूर्ति पर दूध चढ़ाऊँगा , पूजा करुँगा!

आजकल सिस्टम बदल देने वालों की ऐसी जमात पैदा हुई है जिसने जनता से कभी मुलाक़ात नहीं की! ज़िंदगी भर सेमीनार कीं, स्टूडियो में रहे या सुंदर घरों में मध्यवर्गीय जेहनियत में जीते रहे, कार के नीचे पैर नहीं रखा, आम आदमी के बीच में पर्यटक की तरह आए और गए, मध्यवर्गीय आकांक्षाओं को कभी तिलांजलि नहीं दी. मंत्री, विधायक, सांसद नेता से संबंध को व्यवस्था परिवर्तन कहा! यह नई नार्सिस्ट अनुभूति है। यह  मध्यवर्गीय आकांक्षा है और यह हम सब में है! वे बेहतरीन आदमी न बने लेकिन श्रेष्ठ मिडिल क्लास बन गए!

सवाल यह है: मध्यवर्ग सिस्टम बदल सकता है ? हम मध्यवर्ग के लोग अपने शहर या गाँव से कोई प्रेम नहीं करते! लिख पढ़कर अन्य शहर में जाकर रहना पसंद करते हैं! रिटायर होने के बाद भी अपने गाँव या शहर लौटना पसंद नहीं करते !कितने नक़ली लोग हैं हम!

कमाल का सीन चल रहा है नेट से लेकर टीवी तक!

मध्यवर्ग को रिझाने में मोदी-राहुल -केजरीवाल एडी चोटी एक किए हुए हैं!तीनों में से किसी ने मज़दूरों-किसानों की कोई भी बड़ी माँग अभी तक अपने प्रमुख एजेण्डे में शामिल नहीं की है!

तीनों के लिए प्रधान समस्या है भ्रष्टाचार! इनसे कोई पूछे भूखे और भूमिहीन की समस्या क्या है?

क्या इस देश से ग़रीबी उठ गयी ? ग़रीबी मुद्दा क्यों नहीं है? ग़रीबों के बारे में बात करने से हम मध्यवर्ग के लोगों की मनोदशा क्यों परेशान होने लगती है!

हम मध्यवर्ग के लोग राजनीति भी ऐसी करना चाहते हैं जिससे कम से कम मानसिक परेशानी हो!

ग़रीबों  की ज़िंदगी के सवाल राजनीति में आने से राजनीति के सबवर्सिव (खतरनाक?) हो जाने का ख़तरा है!

गरीब चीज़ों, मूल्यों और योजनाओं को अस्त-व्यस्त करता है.

नक़ली लोग नाटक अच्छा कर सकते हैं! झूठ अच्छे ढंग से बोल सकते हैं! चालाकियों और पाखंड का बेहतरीन रुप रच सकते हैं! लेकिन देशप्रेमी नहीं हो सकते!

जो व्यक्ति अपने शहर और गाँव लौटकर जी नहीं सकता, जो अपनी भाषा में बोलकर जी नहीं सकता, जिसे कभी अपने देश के कपड़ों में न देखा हो, जिसके पास भारत की गंध न हो, जो प्रतिदिन झूठ बोलता हो और हर क्षण झूठ में जीता हो , वह क्या सिस्टम बदल सकता है?

हम सब उसी आरामतलब मध्यवर्ग से आते हैं। यह वह वर्ग है जो सत्ताधारी वर्ग के साथ नाभिनालबद्ध है। आओ इसकी पूजा करें ! आरती उतारें!  राज्याभिषेक करें!

कमाल के तेवर हैं इस मध्यवर्ग के यह हेकड़ी में रहता है! दावे के साथ झूठ बोलता है! दावे के साथ कृत्रिम जीवनशैली जी रहा है! इसके अंदर सच के लिए किसी भी क़िस्म की क़ुर्बानी की जज़्बा नहीं है! हेकड़ी और श्रेष्ठत्व में हमेशा डूबा रहता है!

हम सब जिस मध्यवर्ग से आते हैं वह वर्ग कभी मज़दूरों-किसानों के बारे में सोचने पर दिन में दस मिनट भी ख़र्च नहीं करता! हमारे ज़ेहन में कभी उत्पादक शक्तियों के प्रति कोई सच्ची सहानुभूति पैदा नहीं होती ! सच तो यह है मज़दूरों-किसानों को देखकर हमें उबकाई आती है ! हम उनसे दूरी रखकर बातें करते हैं! हम मध्यवर्ग के लोग कभी उनसे जुड नहीं पाए, तो ऐसे में देश में एकता बनाए रखना क्या इन ख़ुदगर्ज़ मध्यवर्ग के लोगों के लिए संभव है?

Prof. Dr. Jagadishwar Chaturvedi

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