“संघर्ष केवल अपने अधिकारों के लिए नहीं बल्कि न्याय पर आधारित समाज के निर्माण के लिए करना चाहिए” : नहास माला

इस समय सक्रीय कई संगठनो का संघर्ष केवल अधिकारों और इन्साफ की मांग तक सिमित है. असल काम ये है कि हम केवल इंसाफ मांगने की सतह से ऊपर उठ कर न्याय की स्थापना की पोजीशन में आएं.

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  • केरल से सम्बन्ध रखने वाले नहास माला 2017 व 2018, दो वर्षों तक देश के प्रतिष्ठित छात्र संगठन ‘स्टूडेंट्स इस्लामिक आर्गेनाईजेशन’ के अखिल भारतीय अध्यक्ष रहे. और देश भर में होने वाले कई छात्र आन्दोलनों की अगुवाई की और उनका हिस्सा भी रहे. इनका अध्यक्ष के रूप में कार्यकाल वर्ष 2018 के साथ समाप्त हुआ. इनसे एक साक्षात्कार को प्रस्तुत करते हुए हमें प्रसन्नता है. मुख्य साक्षात्कारकर्ता हैं अज़हर अन्सार
प्रश्न : 2017 में जब आपका कार्यकाल शुरू हुआ तो आपकी प्राथमिकताएं क्या थी?
उस सम्बन्ध में आपने क्या पॉलिसी अपनाई?

उत्तर : शुरुआत से हमारी सोच यही थी कि समाज की समस्याओं को हम कैंपसेज़ के अन्दर बहस और चर्चा का विषय बनाएंगे और इसी प्रकार कैम्पसेज़ के मुद्दों को भी समाज के सामने लाएंगे. इन दो महत्पूर्ण टास्कस् के साथ हमने काम की शुरुआत की. उस समय देश में जिस प्रकार की परिस्थितियां थी जैसे कि केंद्र सरकार शिक्षा संस्थानों पर कब्ज़ा जमाने का प्रोपगंडा कर रही थी उसे रोकने की कोशिश की. HCU में रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या और JNU में नजीब की गुमशुदगी के मामले सामने आएं . विशेषत: नजीब के मामले से ये स्पष्ट हुआ कि किस प्रकार ये कोशिश की जा रही है कि मुस्लिम छात्र डर जाएँ और विश्वविद्यालयों में प्रवेश की सोचें भी न. उच्च शिक्षण संस्थानों में मुस्लिम छात्रों का प्रतिशत पहले से ही कम है. लेकिन कुछ लोग इसे भी बर्दाशत नही कर रहे, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों को साइड करने के प्रयास हो रहे हैं. इसलिए हम ऐसे इश्यूज पर काम करने के लिए आगे बढ़ें. केंद्र सरकार की शिक्षा निति भी स्पष्ट रूप से पक्षपाती थी. अंतत: हमने उस पर भी प्रभाव बनाने के प्रयास किए.

प्रश्न : देश की वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक परिस्तिथिओं में सुधार के लिए SIO किस हद तक
अपने युवा और छात्रों को तैयार कर रही है?

उत्तर : मैं सिर्फ इस देश के नहीं बल्कि सभी युवाओं की परिवर्तन की शक्ति में विश्वास रखता हूं. क्यूंकि युवा और नई पीढ़ी ही किसी भी देश, समाज और आन्दोलन का बेशकिमती हिस्सा सामन होते हैं. तत्कालिक विषम परिस्तिथिओं के निरपेक्ष मेरा विचार है कि देश की जनता का रुझान सच्चाई और भलाई की ओर है नाकि झूठ और बुराई की तरफ. इतिहास के हर काल की भांति हक़ और नाहक़ के बीच की कशमकश अब भी जारी है. लेकिन अंततः हक़ ही विजयी होने वाला है. कुरान हमें बताता है, हक़ और नाहक़ के बीच के अंतर को इंसानियत खुद महसूस कर लेती है. मैंने संगठन के अध्यक्ष के रूप में देश के कई हिस्सों को यात्राएं की. विशेषत: मैं अपने आखिरी दौरे का ज़िक्र करना चाहूँगा. मैं झारखंड गया था, जिस दिन हमारा कार्यक्रम वहां था उसके अगले दिन ही राज्य के मुख्यमंत्री की सभा भी थी. मुख्यमंत्री के इस कार्यक्रम में राज्य के सबसे बेहतरीन ग्राम पंचायत अध्यक्ष की हेसियत से एक SIO के पूर्व मेम्बर को सम्मानित किया गया. इसका अर्थ ये है कि एक राज्य जहाँ लिंचिंग की घटनाएं हुई वही हमारे युवा सकारात्मक मूल्यों के साथ समाज और राष्ट्र के हित में काम कर रहें हैं, और पुरुस्कार एवं सम्मान भी प्राप्त कर रहे हैं.

प्रश्न : देश की वर्तमान परिस्तिथिओं में छात्र संगठन क्या भूमिका निभा सकते हैं?
आने वाले समय में SIO को क्या करना चाहिए?

उत्तर : देश के कैम्पसेज़ में हमें अपने संघर्ष को तेज़ तर करने और जारी रखने की ज़रूरत है. संघर्ष केवल अपने अधिकारों के लिए नहीं बल्कि न्याय पर आधारित एक समाज के निर्माण के लिए करना चाहिए. इस समय सक्रीय कई संगठनो का संघर्ष केवल अधिकारों और इन्साफ की मांग तक सिमित है. असल काम ये है कि हम केवल इंसाफ मांगने की सतह से ऊपर उठ कर न्याय की स्थापना की पोजीशन में आएं. इस काम में हमें कई चुनोतियों का सामना करना होगा. अपना कीमती समय, धन-दौलत और प्रतिभाएं इस राह में लगानी होगी. इस काम को अपना धर्म-कर्म समझ कर आगे बढ़ना होगा. अन्य छात्र संगठनों के साथ कॉमन इश्यूज पर साझा संघर्ष के संबंध में मेरा मानना है कि छात्र संगठनो को परस्पर एक दुसरे को समझने के रास्ते तलाशने की ज़रुरत है. और अपने परस्पर सहयोग को हमेशा एक दुसरे के लिए जारी रखना चाहिए.

प्रश्न : आलोचना है कि SIO का काम केवल कैंपस व छात्रों के मुद्दों को उठाना है.
लेकिन पिछले सालों में SIO ने कई सामाजिक-राजनैतिक मुद्दों पर भी प्रतिकिर्या दी है.
इस सम्बन्ध में आप क्या कहना चाहेंगे?

उत्तर : हमारे कार्यकाल में  जिन भी राजनैतिक मुद्दों पर हमने प्रतिक्रियाएं दी, वो सब किसी न किसी प्रकार से इस देश के छात्रों और नागरिकों से सम्बंधित मुद्दे थे. राजनैतिक या सामाजिक और छात्र मुद्दे अलग हैं दरअसल ये वर्गीकरण ही गलत है. क्यूंकि आज जो कुछ सामाजिक और राजनैतिक परिपेक्ष्य में होता है उसे कैम्पसेज़ के अन्दर मुद्दा बनाया जाता है और इसी तरह कैंपस और शिक्षा सम्बंधित मुद्दों को भी सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर समझने की ज़रूरत है. सच तो ये है कि वो लोग जो बदलते परिदृश्य में SIO की पेशकदमी और पॉलिसी शिफ्टिंग को ठीक से नहीं समझते या पचाने की ताकत नहीं रखते हैं वो ऐसी आलोचनाएँ करते हैं. मैं ये समझता हूं कि ये एक गलत व्याख्या है बल्कि हमारा दायित्व है कि हम हर प्रकार के सामाजिक, राजनैतिक, शेक्षणिक मुद्दों पर अपनी राय बनायें और प्रतिक्रिया दे. एक वैचारिक संगठन के सन्दर्भ में ये बहुत आवश्यक भी है.

प्रश्न : दिसम्बर 2018 में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों को आप किस प्रकार देखते हैं?

उत्तर : इसमें कोई शक नहीं, कि इन पांच राज्यों के जो नतीजे आएं हैं वो हमारे लिए ख़ुशी की बात है. लेकिन ये बात स्पष्ट रहे कि केवल चेहरों का बदल जाना भारत की जनता की समस्याओं का हल नहीं है. एक नागरिक के तौर पर हमें इसपर चर्चाएँ करनी चाहिए कि एक डेमोक्रेटिक फ्रेम वर्क में रहते हुवे हम वर्तमान व्यवस्था को कैसे बेहतर बना सकते हैं. इसी तरह एक वैचारिक आन्दोलन के रूप में हम क्या हल और विकल्प प्रस्तुत करते हैं? इस सवाल पर भी विचार करना आवश्यक है!

प्रश्न : मोदी सरकार के लगभग 4.5 साल बीत जाने के बाद आप छात्र राजनीती को कैसे देखते हैं ?

उत्तर : देश सबसे बड़ा मुद्दा है कि अब यहाँ लोकतान्त्रिक वातावरण ख़त्म सा होता जा रहा है, उसको फिर से बहाल करने की बहुत आवश्यकता है. इस संबंध में पिछले वर्षों में कैम्पसेज़ और छात्र राजनीति में जो हुआ वो एक ख़ुशी की बात है. जिस तरह रोहित वेमुला के मामले के बाद एक जागरूकता अम्बेडकर को लेकर और विशेषत: संवैधानिक मूल्यों को लेकर आई. जो कुछ सैद्धान्तिक बहसें बुनियादी अधिकारों को लेकर उठी उन्हें आगे बढ़ाने की कोशिश होनी चाहिए. मुख्यधारा की राजनीति और राजनैतिक दलों की भांति मझोले किस्म के नेताओं के जैसे टिप्पणीयां देने की बजाए हमें अपने विचार और विज़न के अनुसार कल्पना करते हुए नई राजनीति रचने की ज़रूरत है. जिसमें हर इन्साफ पसंद संगठन अपनी भूमिका निभा सके.

प्रश्न : समीक्षा की जाती है कि मुस्लिम तंजीमों की लीडरशिप अक्सर मुनासिब नहीं होती.
जो काबिल और हकदार लोग होते हैं उनके साथ न इंसाफी या राजनीति होती है और लीडरशिप बेकार हो जाती है.
आप दो वर्ष दिल्ली में रहे जहाँ सभी बड़ी मुस्लिम तंजीमों के मुख्यालय हैं.
क्या आपने ऐसा महसूस किया? और इसकी वजह क्या है?

उत्तर : लीडरशिप का मामला हर जगह अलग है, जहाँ लोकतान्त्रिक माहौल में चुनाव होते हैं वहां नेतृत्व को लेकर इस तरह की समस्या नहीं है. लेकिन जो लोग योग्य और परिपक्व हैं उन्हें नेतृत्व का अवसर मिल सके इसके लिए वो खुद अपनी प्रतिभा को सामने लाये और हम इस सम्बन्ध में सकारात्मक सोच के साथ ऐसे लोगो को मौका दे सकें इस तरह के माहौल को परवान चढ़ाना ज़रूरी है. आजकल मुस्लिम संगठनों में वो लोग लीडरशिप में हैं जो खाली बैठे होते हैं, और वो लोग जिनके पास सामर्थ्य है, कहीं किसी जॉब में हैं, या यूनिवर्सिटी आदि में प्रोफ्रेसर हैं वो तंजीमी लीडरशिप में नहीं आते हैं,  क्यूंकि आजकल मुस्लिम संगठन अपने नेतृत्व के लिए ऐसे लोगो को तलाशते हैं जो खाली है, निर्वृत हैं जिनको पास कोई काम नहीं है. इस कारण से हमारे संगठनो में एक लीडर की बजाए Administraters  जन्म लेते हैं. फिर पूरे तंजीमी ढांचे (एडमिनिस्ट्रेशन) को संचालित करते हुवे वो लीडर की जगह मेनेजर बन जाता है. ये चीज़ एक आन्दोलन या संगठन के लिए बहुत घातक है. इस पर हमें ध्यान देने की ज़रूरत है. जिन लोगो के पास धन और दिमाग की ताकत है, सामर्थ्य हैं उन लोगो की एक आन्दोलन में नेतृत्व के रूप में ज़रूरत है चाहे वो किसी भी काम में व्यस्त हो. फुल टाइमर और पार्ट टाइमर की अवधारणा को परे रखते हुवे हमें वैचारिक तौर पर परिपक्व और योग्य लोगो को चुनने की ज़रूरत है. एक कार्यकर्ता फुल टाइमर और पार्ट टाइमर हो सकता है लेकिन इन आधारों पर एक लीडर को चुनने की ज़रूरत नहीं है. वो कोई भी शिक्षक, स्कॉलर या अच्छा आदमी हो सकता है. फील्ड वर्कर की अवधारणा लीडर के सन्दर्भ में नहीं होनी चाहिए, ये मुस्लिम संगठनो में एक समस्या है. हमारे नेतृत्व व सलाहकार समितियों और तंज़िमी सेटअप में समाज के हर प्रकार के लोग होने चाहिए. जिनके पास अच्छी क्वालिफिकेशन हैं वो लोग चाहें कुछ मामलों में भिन्न राय रखते हों तब भी उन्हें जानबूझकर हमारे साथ लाने का प्रयास करने की ज़रूरत है.

प्रश्न : SIO के कार्यकर्ताओं को आप क्या सन्देश देना चाहेंगे?

उत्तर : इस घटाटोप अन्धकार के समय में SIO के युवा और छात्र मुस्लिम कौम का अनमोल सरमाया है. अलहम्दुलिल्लाह हमारा कैडर अपने ज़िम्मेदारों के निर्देशों के अनुसार काम करने वाला है. वें अपनी विभिन्न प्रतिभाओं का ज़रूरत के समय बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं. मैं उनके लिए सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि वें केवल अपने पदाधिकारियों पर निर्भर होने की बजाए, अपने ज़िम्मेदारों को नए और अनोखे आइडियाज उपलब्ध कराए.  अपनी प्रतिभाओं को इस तरह निखारें कि हमारा आन्दोलन इंसानी जीवन के हर मैदान में अपने प्रभाव को स्थापित कर सकें.

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