क्या तानाशाही का मार्ग प्रशस्त करेगी मोदी की गारंटी?

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बादल सरोज

लोकसभा चुनाव 2024 के मतदान की शुरुआत होने में जब महज़ पांच दिन बचे थे तब कहीं जाकर मौजूदा सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने अपना चुनावी घोषणा-पत्र जारी किया। उपभोक्ताओं को लुभाने वाली मार्केटिंग शैली में लिखे चुस्त खोखले संवादों, अनुपलब्धियों और विफलताओं को शब्दजाल में गोल-गोल घुमाकर बनाई गयी भूलभुलैया में छुपाने की भरसक कोशिशों और जनता की मुश्किलों की पूरी तरह अनदेखी कर उन्हें थाली भर पानी में चांद उतारने के भुलावे से बहलाने के आज़माए शिगूफ़ों से भरा यह पुलिंदा बाक़ी जो है सो तो है ही, सबसे मुखर रूप में ख़ुद को ब्रह्माण्ड की सबसे बड़ी पार्टी बताने वाली इस पार्टी के अस्तित्वहीन और विलुप्त सा हो जाने की दस्तावेज़ी और सार्वजनिक स्वीकारोक्ति है।

एक तरह से कॉर्पोरेट के बैक्टीरिया के हिंदुत्व के साथ मिलकर वायरस में रूपांतरित होने का चक्र पूरा हो गया है और जनसंघ से भाजपा होते हुए ख़ुद को एक राजनीतिक दल बताने का स्वांग त्याग कर अब इसने भी मान ही लिया है कि वह अपने माता-पिता संगठन आरएसएस की तरह एकानुचालकवर्ती स्थिति को प्राप्त हो चुकी है। न कोई नेतृत्व है, न कोई समिति। मोदी के आगे भी मोदी हैं, मोदी के पीछे भी मोदी हैं। बीचों-बीच तो मोदी हैईयें। सार में तो ऐसा पहले ही हो चुका था। अब इसे चुनाव के पहले जारी किये जाने वाले ऐलानों के दस्तावेज़ों के बदलते रूप में भी बाक़ायदा दर्ज कर लिया गया है।

वर्ष 2014 के चुनाव के ऐलान भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र के नाम और “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की पञ्च लाइन के साथ जारी हुए थे, 2019 के लोकसभा चुनाव में ये “संकल्पित भारत, सशक्त भारत” के जुमले वाले संकल्प पत्र हो गए और 2024 के चुनावों के आते-आते भारत मुखपृष्ठ से ग़ायब ही हो गया, भाजपा नीचे कहीं अपठनीय से छोटे अक्षरों में सिमटकर रह गयी और ये “मोदी की गारंटी” हो गए।

यह डिजिटल युग है – पठनीयता के अलावा अब दर्शनीयता भी बोलने और बताने का एक तरीक़ा है। अनेक की राय में यह कहीं ज़्यादा प्रभावी तरीक़ा है, और सही में है भी। इस लिहाज़ से पिछले 10 वर्षों के तीनों घोषणा-पत्र का अध्ययन रोचक फ़र्क दिखाता है। वर्ष 2014 के 64 पेज के घोषणा-पत्र के मुखपृष्ठ पर मोदी की तस्वीर थी और सिर्फ़ वहीं थी। वह भी मध्य में थी। उनके अगल-बगल सुषमा स्वराज और अरुण जेटली और उस वक़्त के 4 भाजपा शासित राज्यों – गोवा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। इन सबके ऊपर अटल, आडवानी, जोशी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह थे। वर्ष 2019 के 50 पन्नों के संकल्प पत्र में मोदी की 6 तस्वीरें थीं। मगर 2024 में तस्वीर पूरी तरह बदली हुई है। 69 पेज की “मोदी की गारंटी” में लाली देखूं लाल की, जित देखूं तित लाल की तर्ज़ पर 52 अलग-अलग मुद्राओं में मोदी ही मोदी हैं। हर तस्वीर में नई भंगिमा और नए परिधानों के साथ। यह सिर्फ़ फ़ोटो का खेल नहीं है। यह एक वक्तव्य है जो बताता है कि किस तरह मात्र 10 वर्ष के भीतर भाजपा हाशिये के भी हाशिये पर आ गयी है और भारत के स्थान पर मोदी प्रतिष्ठित हो गए हैं।

संसदीय लोकतंत्र में चुनाव राजनीतिक दल लड़ते हैं, वचनबद्धता उनकी होती है किसी व्यक्ति की नहीं! सिर्फ़ इसलिए नहीं कि संगठन की आयु व्यक्ति की आयु से कहीं अधिक होती है, बल्कि इसलिए कि संसदीय लोकतंत्र में व्यक्ति का नहीं दल का चुनाव किया जाता है, जिसे बाद में अपना नेता चुनना होता है। संसदीय लोकतंत्र की जिस प्रणाली को भारत में अपनाया गया है उसमें वह नेता भी एकमात्र या सबसे ऊपर नहीं होता, कैबिनेट और संसदीय दल के ज़रिए ज़िम्मेदारी सामूहिक होती है। मगर भाजपा – मोदी की भाजपा – पार्टी की साख पर नहीं मोदी की गारंटी के नाम पर चुनाव लड़ने जा रही है। चुनाव भाजपा लड़ रही है, गारंटी मोदी दे रहे हैं। किस विवशता के चलते ऐसा किया जा रहा है, इस पर बाद में बात करेंगे, पहले यह कि ये जो किया जा रहा है वह कितना ख़तरनाक है और कितनी गंभीर आशंकाओं से भरा हुआ है।

संसदीय या किसी भी तरह की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की मज़बूती बाक़ी लोकतांत्रिक संस्थाओं और परम्पराओं की जीवंतता, कारगरता और उनके सम्मान के साथ-साथ उसमें काम करने वाली राजनीतिक पार्टियों के भीतर लोकतंत्र की स्थिति की समानुपाती होती है। उन दलों और ख़ासकर यदि कहीं वह सत्ता में बैठा दल हो तो उसमे लोकतंत्र की समाप्ति देश के लोकतंत्र के लिए अशुभ और अनिष्टकारी ही नहीं होती, उसके क्षरण और अंततः तानाशाही की आमद का सूचक भी होती है। ठीक यही वजह है कि भाजपा नाम की पार्टी का एक व्यक्ति पर आधारित पार्टी के रूप में सिकुड़कर रह जाना, सिर्फ़ उस पार्टी या उसके समर्थकों की चिंता का विषय नहीं रह जाता, लोकतंत्र की सलामती में विश्वास करने वाले सभी के लिए विचारणीय प्रश्न हो जाता है‌।

इस संदर्भ में डॉक्टर भीमराव आंबेडकर द्वारा संविधान मंज़ूर करने वाले दिन – 25 नवम्बर 1949 – को दिए भाषण में दी गयी तीन चेतावनियों में से एक का पाठ तब की तुलना में आज ज़्यादा प्रासंगिक और सामयिक है। बाबा साहेब ने कहा था कि, “अपनी शक्तियां किसी व्यक्ति – भले वह कितना ही महान क्यों न हो – के चरणों में रख देना या उसे इतनी ताक़त दे देना कि वह संविधान को ही पलट दे ‘संविधान और लोकतंत्र’ के लिए ख़तरनाक स्थिति है। राजनीति में भक्ति या व्यक्ति पूजा संविधान के पतन और नतीजे में तानाशाही का सुनिश्चित रास्ता है।” ध्यान रहे डॉक्टर अम्बेडकर जिन व्यक्तियों की बात कर रहे थे वे आज के व्यक्तियों की तरह बौने नहीं थे, वे महाकाय व्यक्तित्व थे, ऐसे व्यक्ति जिन्होंने दसियों बरस जेलों में काटी थीं, जिहोने आजादी की लड़ाई जीती थी और एक सर्वसमावेशी भारत का नक्शा तैयार किया था।

डॉक्टर अम्बेडकर और संविधान सभा इन के व्यक्तिवाद पर अंकुश लगाना ज़रूरी मानती थी। आज उन्हीं के देश में 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए स्वयं मोदी द्वारा जारी की गयी मोदी की गारंटी वाला पुलिंदा जिन-जिन गारंटियों का दावा करता है उनमें से किन-किन की गारंटी है यह तो स्वयं मोदी भी गारंटी के साथ नहीं कह सकते, मगर, कहीं अगर इसे अमल में लाने की मोहलत दे दी गयी तो यह इस देश में तानाशाही लाने की गारंटी ज़रूर हो सकती है। विडम्बना यह है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले देश भारत में मोदी की गारंटी नाम का यह त्रासद प्रहसन ठीक उन्हीं बाबा साहब के जन्म दिन 14 अप्रैल को मंचित किया गया, जिन्होंने इस तरह की आशंका जताई थी।

यह सिर्फ़ अनुमान, आशंका, राजनीतिक आग्रह के चलते बनी नकारात्मकता या आरोप नहीं है – ख़ुद यह कथित घोषणापत्र इसकी पुष्टि करता है। पिछले पांच वर्षों की अपनी कामयाबियों के नाम पर इसमें धारा 370 की समाप्ति, सीएए को लागू करने जैसी कारगुज़ारियों को गिनाते हुए आने वाले दिनों में समान नागरिक संहिता को लागू करने और एक देश एक चुनाव का क़ानून लाने का वादा इस तानाशाही के मार्ग को प्रशस्त करने का ऐलान है। यह कर्नाटक में किसी भाजपा नेता द्वारा कही गयी संविधान बदल देने की बात को दूसरी तरह से व्यवहार में उतारने का काम है।

यहां एक बार फिर बाबा साहब के उसी भाषण का एक वाक्य दोहराना प्रासंगिक है, जिसमे उन्होंने कहा था कि, “हम संविधान कितना भी अच्छा बना लें, इसे लागू करने वाले अच्छे नहीं होंगे तो यह भी बुरा साबित हो जाएगा।” आज उनकी यह आशंका भी यथार्थ में उतरती दिख रही है जब एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, संघीय गणराज्य के स्वरुप को बदलने के ऐलान खुलेआम किये जा रहे हैं। इसके पीछे इरादा क्या है, इसे घोषणा-पत्र जारी करने के इवेंट में दिए गए मोदी के एकरस एकांगी भाषण से कहीं ज़्यादा सटीक शब्दों में इस अवसर पर बोले चंद शब्दों में भाजपा के अध्यक्ष जे पी नड्डा ने बयान किया। उन्होंने कहा कि, “यह जनसंघ के ज़माने से चली आ रही हमारी वैचारिक यात्रा का अगला चरण है।” इस प्रसंग में उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद से अन्त्योदय होते हुए मोदी के सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास वाले जुमले का उल्लेख किया। हालांकि ऐसा करने में भी वे सावधान रहे कि कहीं भूले से भी उनकी ज़ुबान पर 1980 में भाजपा की स्थापना के समय दिए गए गांधीवादी समाजवाद के नारे का ज़िक्र न आ जाए। बहरहाल जनसंघ के ज़माने से आज की भाजपा तक की जिस वैचारिक यात्रा की बात भाजपा अध्यक्ष कर रहे हैं उसमे किस तरह का भारत बनाया जाना है, इसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है। मोदी की गारंटी उसी तरह का भारत बनाने का बीजक है।

आख़िर ऐसी नौबत क्यों आयी कि 10 साल से लगातार केंद्र में और कई-कई वर्षों से देश के अनेक प्रदेशों में राज कर रही पार्टी आज एक व्यक्ति की लोकप्रियता और छवि की पूंछ को चुनाव की वैतरणी पार करने का एकमात्र रास्ता मानने के लिए मजबूर हो गयी?

एक तो इसलिए कि उसके पास बताने के लिए कुछ भी नहीं है। उपलब्धियों के नाम पर गिनाने के लिए भी कुछ नहीं है। उन्हें भी पता है कि किसी भी देश और उसकी जनता के लिए सुकून और समृद्धि, शांति और ख़ुशहाली के जितने भी संकेतक होते हैं वे सब के सब धराशायी हुए पड़े हैं। हालात सुधरने की बजाय बिगड़े हैं और चौतरफ़ा बिगड़े हैं।

बेरोज़गारी भयावह है और औद्योगिक ठहराव, लगातार जारी मंदी और बेलगाम महंगाई से वास्तविक आमदनी घटने, ख़र्च बढ़ने के चलते बाज़ार लगातार सिकुड़ा है। नतीजे में नज़दीक भविष्य में रोज़गार सम्भावनाओं के सृजित होने की संभावनाएं दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही हैं।

देश की बहुमत आबादी जिन दो उत्पादक वर्गों से मिलकर बनती है, उन किसानों और मज़दूरों दोनों ही की हालत में गिरावट बजाय थमने के और तेज़ी से नीचे की तरफ़ गयी है।

पढ़ने-लिखने की उम्र वाली किशोर और युवा पीढ़ी का वर्तमान और भविष्य दोनों अंधेरे में है। वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में, अपनी विभाजनकारी नफ़रती मुहिम से इन्होंने गलियारे को और घुमावदार बना दिया है।

सभ्य और सहिष्णु समाज की दिशा में बढ़त मोदी राज में रुकी ही नहीं है बल्कि तेज़ी से पीछे की तरफ़ धकेली गयी है और लगातार धकेली जा रही है। मोदी की गारंटी अपने नए और भी ज़्यादा नुकसान देह मंसूबों से उसे और ज़्यादा विकराल बनाने के अशुभ संकेतों से भरी हुई है। यह सिर्फ़ स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों, धार्मिक, नस्लीय और भाषाई अल्पसंख्यकों के विरूद्ध ही नहीं बल्कि भारत की बुनावट और उसके कुछ हज़ार वर्ष के हासिल के भी विरुद्ध है‌। मोदी की गारंटी इन सब पर पर्दा डालने के लिए बुना गया दिखने में झीना किन्तु असल में काफ़ी मज़बूत लगने वाला जाल है।

दूसरे इसलिए कि उन्हें बड़ी मेहनत और काफ़ी लागत से तैयार किये गए ब्रांड – मोदी नाम केवलमात्र – के इस बार भी बाज़ार में टिके रहने का भरोसा है। कोई ग्यारह साल पहले देश के सभी बड़े कॉर्पोरेट्स और धन्नासेठों ने अहमदाबाद में बैठ कर, तब कोई 5 हज़ार करोड़ रूपये इकट्ठा करके उसके निवेश से जिस उत्पाद को तैयार किया था और पिछले 10 वर्षों तक लगातार उस पर रंग-रोग़न करते हुए चमचमाता बनाए रखने की कोशिश की थी, मीडिया और दीगर माध्यमों से हवा भर-भर कर उसे आसमान में ताने रखा था, उसी फुलाए गए गुब्बारे की डोर पकड़कर वे इस बार भी सत्ता की सीढ़ियां चढने का ख़्वाब देख रहे हैं। इसलिए भाजपा की बजाय आज़माए हुये इस ब्रांड के काठ की हांडी को इस्तेमाल करना उन्हें ज़्यादा मुफ़ीद लग रहा है। तरह-तरह के वायरसों के बोझ से बैठ चुके सिस्टम को फिर से एक्टिव करके फ़ेस-पासवर्ड का उपयोग कर एक बार फिर से फ़ेक-एंट्री करना चाहते हैं।

मोदी की गारंटी नाम के इस कथित घोषणा-पत्र में लिखी गयी ज़्यादातर बातें इतनी दिखावटी और भुरभुरी हैं कि उनमें किसी सार को ढूंढना देसी कहावत में कहें तो रेगिस्तान में चौमासा नदी या लोमड़ी की मांद में सदाचरण की किताबें ढूंढने जैसा होगा। मोदी की गारंटी वाले इस पुलिंदे में चूना, कलई और डिस्टेंपर पोत कर जीर्ण शीर्ण ढहती दीवार को सजाते समय अपनी भक्त बाहुल्य मध्यवर्ग की कुंठाओं को सहलाने का ख़ास ध्यान रखा गया है। जिस मध्यवर्ग के घर में पढ़े-लिखे बेरोज़गारी बेटे-बेटियों के रूप में जीते जागते मानव बम रखे हुए हैं उन्हें न जाने किस-किस तरह के हब बनाने की बांसुरी सुना सम्मोहित कर पोलिंग बूथ्स तक खींचकर लाने के कौशल आज़माए जा रहे हैं। मेड इन इंडिया के बाद मेक इन इंडिया की भी सुपर विफलता के बाद मोदी इसी मध्यम वर्ग को वेड इन इंडिया – भारत में आकर शादी करो – का मंडप सजाने और अम्बानी के बेटे की प्री-वेडिंग जुगुप्सा की तरह के वैभव के अश्लील प्रदर्शनों से मुग्ध होने, बेगानी शादी में दीवाना बनकर थिरकने का अवसर देने की गारंटी लेकर आये हैं।

ऐन चुनाव के मौक़े पर जनता और उसके जीवन की समस्याओं को अंगूठा दिखाने, देश के सामने खड़े वास्तविक मुद्दों को मुंह चिढ़ाना सामान्य बात नहीं है। आख़िर इतना दर्प, अहंकार, हैकड़ी और ग़ुरूर आता कहां से है! दुनिया की हर भाषा की प्राचीन लोककथायें इसका उत्तर देती हैं। वे बताती हैं कि हर अहंकारी और पीड़क की जान दूर बैठे किसी कौये या बाज़ में होती है। यही हाल इस देश के उन हुक्मरानों का भी है जो तीसरी बार तख़्तनशीन होने का मुग़ालता पाले बैठे हैं और यह मानकर चल रहे हैं कि भले हर रोज़ किसान आत्महत्याएं कर रहे हों, बेरोज़गारी अब तक की सबसे विकराल बीमारी हो गयी हो, महंगाई महामारी में बदल रही हो, इनमें से किसी के भी बारे में कुछ भी बोले बिना भी उनकी जान भ्रष्टाचार से जुटाए दसियों हज़ार करोड़ के ख़ज़ाने, धुआंधार झूठ परोसते मीडिया और विरोधियों की बांह उमेठ उन्हें शरणागत बनाती ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स नाम के कौओं और गिद्धों में सुरक्षित बनी रहेगी। वे भूल रहे हैं कि मानव समाज का इतिहास अहंकारों के चिरायु होने की नहीं, उसे छिन्न-भिन्न और तार-तार करने की गारंटी देता है।

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