भारत समेत दुनिया भर में अल्पसंख्यक विरोधी बयार

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मुहम्मद स्वालेह अंसारी

आम तौर पर किसी भी देश का अल्पसंख्यक समाज उस देश में रहने वाले नागरिकों में सबसे ज़्यादा प्रताड़ित समूह होता है। दुनिया भर के कई देशों के अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति हमारे सामने है। यह बात तब कही जा रही है जब भारत के प्रधानमंत्री राजस्थान के बांसवाड़ा में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए भारतीय अल्पसंख्यक समुदाय की सबसे बड़ी आबादी ‘मुस्लिम समाज’ के बारे में खुले मंच से गंदे और भद्दे शब्दों का प्रयोग करते हुए चुनावी माहौल को एक अलग रंग देने की कोशिश करते हैं, जो नरेंद्र मोदी सरकार की बौखलाहट और सत्ता से दूरी के संकेत के साथ ही सरकारी तंत्र का अल्पसंख्यक विरोधी चेहरा सामने ला रही है।

भारत देश के आस-पास बसने वाले पड़ोसी देशों की स्थितियों का मूल्यांकन किया जाए तो यह बात समझ में आ जाती है कि किस प्रकार किसी भी देश में अल्पसंख्यक समुदाय को बलि का बकरा बना कर विभिन्न सरकारें अपना उल्लू सीधा करती हैं और अल्पसंख्यक समाज हमेशा से ही उस देश की चक्की में पिसता रहता है। विश्व भर की मानवाधिकार संस्थाएं ऐसे मामलों पर अपनी प्रतिक्रिया देती हैं लेकिन प्रश्न यह है कि प्रतिक्रिया मात्र से क्या होगा? क्या उस समुदाय के ख़िलाफ़ होने वाले अन्याय और प्रताड़ना की घटनाएं समाप्त होंगी?

भारत का पड़ोसी देश चीन और वहां पर अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में रहने वाले ‘उइगर’ समाज के बारे में आने वाली रिपोर्ट्स यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि चीन में किसी प्रकार से आतंकवाद के आरोप में सरकारी आतंकवाद का दंश एक पूरा समुदाय झेल रहा है। अलग-अलग वक़्त पर जारी होने वाली रिपोर्टें बताती हैं कि किस प्रकार ‘उइगर’ समाज को चीन की सरकार डिटेंशन कैंपों के अंदर मीडिया और दुनिया से दूर उन पर प्रताड़ना और धार्मिक प्रतिबंध के माध्यम से लगातार उनका दमन कर रही है। जबकि चीन की सरकार हमेशा से इन आरोपों का खंडन करती रही। चीन इन रिपोर्टों को लेकर यह आरोप भी लगाता रहा है कि यह पश्चिमी देशों का फैलाया हुआ प्रोपेगंडा है जिस में कोई सच्चाई नहीं है। परंतु यह बात स्पष्ट है कि चीन में ‘उइगर’ समाज के साथ सरकारी दमनकारी नीतियां अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के माध्यम से उजागर होती रहती हैं और इसका आरोप भी सीधे तौर पर चीन की सरकार पर लगता है।

भारतीय मानचित्र के पूर्व दक्षिण में स्थित देश म्यांमार है। म्यांमार में बसने वाले रोहिंग्या मुसलमान भी म्यांमार में अल्पसंख्यक समुदाय में आते हैं। रोहिंग्या समुदाय के साथ होने वाले सरकारी और सैनिक दमन की स्थिति भी अत्यंत स्पष्ट है। शांतिदूत के नाम से प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सांग सु की का शासन रहा हो या उसके बाद हुए सैनिक विद्रोह के परिणाम स्वरूप सैनिक शासन में रोहिंग्याओं के ख़िलाफ़ दमन की नीति में कोई कमी देखने को नहीं मिलती है। भारत समेत अन्य पड़ोसी देशों में बसने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों की संख्या म्यांमार में हो रहे सरकारी और सैन्य दमनकारी नीति का स्वरूप समझा देती हैं। रोहिंग्या बस्तियों को आग लगा देना या अंधाधुंध गोलीबारी कर पूरी बस्ती को विस्थापित होने या मौत के घाट उतार देने के लिए मजबूर कर देना और हमेशा के लिए शरणार्थी का जीवन व्यतीत करने के लिए गर्त में धकेल देना भी अल्पसंख्यक समुदाय के साथ होने वाली दमनकारी नीति का एक पैटर्न है।

पश्चिमी देशों में होने वाले कई बड़े आंदोलनों में हाल के दिनों में हुए एक आंदोलन का वर्णन इस परिप्रेक्ष्य में आवश्यक हो जाता है। यह घटना 25 मई 2020 की है जब 46 वर्षीय अश्वेत अमेरिकी जार्ज फ्लॉयड की मिनियापोलिस में एक श्वेत पुलिस अधिकारी डेरेक चाउविन द्वारा हत्या कर दी जाती है। परिणामस्वरूप पूरे विश्व में यह विवाद चर्चा का विषय बनता है। यह घटना पश्चिमी देशों के तथाकथित लोकतांत्रिक रंग नस्ल भेदी सुधार व्यवस्थाओं और दावों की पोल दुनिया के सामने खोल के रख देती है। यह आंदोलन ब्लैक लाइव्स मैटर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसकी शुरुआत 2013 में तीन अश्वेत महिलाओं द्वारा उस समय हुई जब 17 वर्षीय त्रायोंन मार्टिन की हत्या हो जाती है।

भारत, लोकतंत्र की जननी और विविधता में एकता के नाम से विश्व में विख्यात है, लेकिन लोकतंत्र और विविधता के इसी देश में अल्पसंख्यक समुदाय, ख़ास तौर पर मुस्लिम समुदाय के साथ देश के प्रधानमंत्री का खुले मंच से अपशब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि न तो भारत अब लोकतंत्र की जननी की विशेषता को बनाए रखने में सफल है और न ही देश के प्रधानमंत्री इसकी विविधता में विश्वास रखते हैं। यह पहली बार नहीं है जब देश के प्रधानमंत्री ने मुस्लिम समुदाय के ख़िलाफ़ इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया है। 2002 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए धार्मिक मंचों का प्रयोग कर दिया गया भाषण, तत्पश्चात् गुजरात दंगे और एक मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी कार्यशैली पर उस समय उठने वाले सवाल किसी से छुपे नहीं रहे। ‘द कारवां’ की रिपोर्टर रही अंतर्राष्ट्रीय प्रकार राना अय्यूब की पुस्तक ‘द गुजरात फ़ाइल्स’ में गुजरात दंगों पर जो प्रश्न उठाए गए हैं आज तक सरकार उनका जवाब नहीं दे सकी। पिछले लोकसभा चुनावों (2019) में भी भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसी प्रकार का एक और विवादास्पद बयान दिया गया था जो उनके दल भाजपा की देश के मुस्लिम समुदाय को एक अलग-थलग करने की रणनीति का हिस्सा है।

मॉब लिंचिंग अर्थात् भीड़ द्वारा किसी की पीट-पीट कर हत्या कर देने के मामले में भारत का इतिहास भी अत्यंत पुराना है। परंतु वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 में सत्ता में आने के बाद से मॉब लिंचिंग भारत के माथे का वो कलंक बन गया जो आज तक किसी से भी मिटाया नहीं जा सका। बल्कि इसके विपरीत यह कलंक लगातार बढ़ता जा रहा है। संसद में किए गए एक सवाल के जवाब में बताया गया कि भारत सरकार देश में होने वाली मॉब लिंचिंग की घटनाओं का कोई डेटा नहीं रखती। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भीड़ द्वारा हत्या की घटनाओं में 90% से अधिक घटनाएं मुस्लिम समुदाय के साथ घटित होती हैं। यह बात भी हक़ीक़त है कि 2014 में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद से भीड़ द्वारा पीट-पीट कर की गई हत्या की घटनाओं में सीधे तौर पर भाजपा और उसके समर्थित हिंदू धार्मिक संगठनों का हाथ रहा है। ऐसे में एक बात तो साफ़ है कि यह घटनाएं सत्ता संरक्षित और सत्ता पोषित हैं। इन सबका संबंध भारत सरकार अर्थात् प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी पर है। यही कारण है कि आज तक भीड़ द्वारा हत्या की घटनाओं के ख़िलाफ़ संसद में कोई कठोर क़ानून नहीं बनाया गया, उल्टे सत्ता समर्थित नेताओं के बयान और भाषणों के कारण इन घटनाओं में वृद्धि ही देखी गई।

सांप्रदायिक दंगों का सब से बड़ा भुक्तभोगी भारत का मुस्लिम समाज है। दंगों की आग में मिली भारतीय आज़ादी का अंधेरा आज तक साफ़ नहीं हो सका है। भड़काऊ भाषण, उत्तेजना से भरपूर नारे और उनके परिणामस्वरूप भड़की हिंसा में बहने वाले ख़ून, आंसू, चीख़-पुकार का असल ज़िम्मेदार कौन है? यह आज तक किसी सरकार ने जनता के सामने नहीं रखा और न ही किसी अपराधी को कटघरे में खड़ा किया गया। मलियाना, मुज़फ्फरनगर, कैराना, भागलपुर, गुजरात या भारत के कोने-कोने में घटने वाली सांप्रदायिक हिंसा, जिनका इतिहास के पन्नो के कोई वर्णन नहीं मिलता है भारतीय लोकतंत्र की जननी और विविधता में एकता के खोखले दावों की पोल खोलती हैं। इसके बाद भी दंगो के रोकथाम और उसके बचाव के लिए भारत की सरकारों द्वारा समय रहते कोई कठोर क़दम नहीं उठाए गए।

इसके अतिरिक्त आतंकवाद के फ़र्ज़ी आरोपों का दंश लेकर घूमने वाले भारतीय अल्पसंख्यकों में मुस्लिम समाज ही सबसे अधिक प्रताड़ित है। सालों से भारत सरकार की सरकारी मशीनरी और सरकारी तंत्र का शिकार भारतीय मुस्लिम समुदाय आतंकवाद का पर्याय बन चुका है। आतंकवाद के आरोपों से बच निकलने में सफल रहे लोगों की कहानियां, उन पर लिखी गई किताबें और इन घटनाओं पर समय-समय पर कोर्ट से आने वाले फ़ैसले यह बताते हैं कि भारत का मुसलमान किस प्रकार आतंकवाद के मामलों का जबरन आरोपी बनाया जाता है। परिणाम स्वरूप कई-कई साल या आजीवन सिर्फ़ फ़र्ज़ी आरोपों के ख़िलाफ़ अपनी सफ़ाई देने में सरकारी कार्यालयों और कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाता रह जाता है और अंततः जीवन के अंतिम दिनों में यह फ़ैसला आता है कि उक्त व्यक्ति को साक्ष्यों के अभाव में उक्त मामले में बाइज्ज़त बरी किया जाता है। सरकार और सरकारी तंत्र क्षमा मांग कर मामले को ख़त्म कर देता है लेकिन एक पूरे परिवार ने इस पूरी प्रक्रिया में जो कुछ बर्दाश्त किया उसका कोई जवाब सरकार या सरकारी मशीनरी के पास नहीं होता।

भारत, चीन, अमेरिका और म्यांमार के अतिरिक्त पाकिस्तान में हिंदू–मुस्लिम और आपसी उन्माद के घेरे में अल्पसंख्यक, ईरान में शिया-सुन्नी संघर्ष या पश्चिमी देशों में मुस्लिम विरोधी और नस्ल और रंग के आधार पर अल्पसंख्यक समुदाय के ऊपर हो रहे अन्याय की पटकथा दुनिया के सामने है। भारत में आतंकवाद का दंश, भीड़ द्वारा पीट-पीट कर हत्या, सांप्रदायिक हिंसा, नेताओं के धर्म विरोधी और नफ़रती बयान और आज़ादी के बाद से ही मीडिया और सिनेमा के माध्यम से मुस्लिमों की देश विरोधी छवि दिखाने की होड़, मुस्लिम समाज की असल हक़ीक़त को पीछे छोड़ एक काल्पनिक स्वरूप हमेशा से ही चिंता का विषय नहीं बन सकीं। अंततः अल्पसंख्यक समुदाय पर हो रहे इस अत्याचारी हम्माम में हर कोई नंगा है। फ़र्क सिर्फ़ यह है कि अपने चेहरे के दाग़ साफ़ करने की जगह हर किसी ने अपना आइना छोड़ दूसरों के दाग़ ज़्यादा दिखाने का प्रचलन बना लिया है।

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