कर्नाटक के शैक्षणिक संस्थानों पर हिजाब प्रतिबंध का प्रभाव: PUCL-K रिपोर्ट का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

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-ज़ैनब गज़ाली
अंग्रेजी से अनुवाद: उसामा हमीद

PUCL अपने अध्ययन में कहता है, ‘कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश ने शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने के राज्य सरकार के निर्देश को बरकरार रख कर, न केवल मुस्लिम लड़कियों के शिक्षा के अधिकार बल्कि उनके अन्य संबद्ध संवैधानिक अधिकारों को भी खतरे में डाल दिया है। करीब नौ महीने से चल रही यह लड़ाई समानता और सम्मान की लड़ाई है।
इस रिपोर्ट में जहां हिजाब प्रतिबंध और राज्य सरकार के आदेशों के विभिन्न आयामों पर चर्चा की गई, वहीं यह रिपोर्ट कर्नाटक में मुस्लिम छात्राओं की दुर्दशा के बारे में भी बात करती है। PUCL की छह सदस्यीय टीम ने “राज्य और अन्य जगहों पर मुस्लिम महिलाओं द्वारा बर्दाश्त की गई कठिनाईयों एवं उनके उन संघर्षों, जो उन्होंने एक ऐसे माहौल के खिलाफ खड़े होने के लिए किया है जहां नफरत ही आदर्श है; और जहां अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों की रक्षा करने में राज्य की घोर विफलता सामने आई है” का अध्ययन किया है।

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यह निर्णय, कुछ याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए प्रमुख मुद्दे, अर्थात् उनके शिक्षा के अधिकार पर मंडला रहे संकट के बजाय, इस बात पर केंद्रित रहा कि क्या हिजाब पहनना एक आवश्यक धार्मिक प्रथा है?

कानूनी विचारकों और विद्वानों द्वारा ERP (आवश्यक धार्मिक अभ्यास) परीक्षण की कड़ी आलोचना की गई है। यह एक अनिवार्य धार्मिक प्रथा के रूप में हिजाब पर गलत केंद्रण था। यह निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार गैर-भेदभाव के सिद्धांत पर केंद्रित रहने में भी विफल रहा है। उच्च न्यायालय ने कहा कि अभिव्यक्ति, भाषण और गोपनीयता की स्वतंत्रता का अधिकार केवल ‘व्युत्पन्न अधिकार’ है और ‘योग्य सार्वजनिक स्थानों’ पर इनका दावा नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय इन अधिकारों को संबोधित करने में विफल रहा।
एक विकल्प के तौर पर ‘उचित गुंजाइश के सिद्धांत’ पर आधारित, छात्रों को यूनिफॉर्म के अलावा ‘निर्धारित ड्रेस कोड’ के रंग का हिजाब पहनने की अनुमति दी जा सकती थी। मुस्लिम छात्राएं ड्रेस कोड के खिलाफ नहीं थीं, उनका अनुरोध यह था कि ड्रेस कोड थोड़ा लचीला हो ताकि वे हिजाब को यूनिफॉर्म के साथ समायोजित कर सकें। सुमैया रोशन, जीआईओ अध्यक्ष स्पष्ट करती हैं कि “हिजाब कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे उन लोगों एक हफ्ते या एक महीने पहले पहनना शुरू किया था। यह उनकी पहचान का हिस्सा है। अचानक उन्हें इसे हटाने तथा हिजाब व शिक्षा के बीच चयन करने के लिए कहना अनुचित है ।”
हालांकि, कोर्ट का तर्क है कि इस तरह की कोई भी गुंजाइश ‘सामाजिक-अलगाव’ की भावना को स्थापित करेगी और एकरूपता की भावना जिसे ड्रेस कोड द्वारा सभी छात्रों के बीच उनके धर्म और विश्वासों की परवाह किए बिना स्थापित करने के लिए बनाया गया है, को ठेस पहुंचाएगी।

यह स्पष्ट है कि इस व्याख्या से मुस्लिम महिलाओं को राज्य द्वारा स्थापित अनुचित बाधाओं के फलस्वरूप शिक्षा से गंभीर रूप से वंचित रहना पड़ेगा। मुस्लिम महिलाओं के शिक्षा के अधिकार के उल्लंघन की खतरनाक प्रकृति और याचिका कर्ताओं के वकीलों द्वारा कानून के इस सवाल पर विस्तृत वाद-विवाद के बावजूद, अदालत मुश्किल से इस मुद्दे को संबोधित करती है और केवल यह कहती है कि ‘स्कूल ड्रेस कोड में हिजाब, भगवा या धर्म के किसी अन्य प्रतीक परिधान का बहिष्करण, महिलाओं की स्वायत्तता या उनके शिक्षा के अधिकार को नहीं छीनता है’।
मीडिया की भूमिका
मीडिया अक्सर अपनी प्रस्तुतियों में एकतरफा रहा है, सामूहिक हिंसा के रिकॉर्ड इतिहास के साथ पहचाने जाने वाले, नफरत फैलाने वाले हिंदुत्व समूहों को अनुचित कवरेज दिया है; हिजाब के विरोध में भगवा शॉल पहनने वाले छात्रों की आक्रामक भूमिका को भी नजरंदाज करता किया गया है। कन्नड़ टीवी मीडिया ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश को हथियार बना कर सभी कॉलेज परिसरों में हिजाब पर प्रभावी प्रतिबंध लगाने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है।

एक कुख्यात वीडियो में, दिग्विजय टीवी का एक रिपोर्टर स्कूल परिसर में हिजाब पहने एक युवा बच्ची के पीछे कैमरा लेकर भागते हुए दिखाई दे रहा है। समाचार एंकर अक्सर हिजाब पहनने वाली छात्राओं को पिछड़े और अड़ियल के रूप में चित्रित करते हैं, और इस मुद्दे को मुस्लिम महिलाओं द्वारा शिक्षा पर हिजाब को वरीयता देने के रूप में चित्रित करते रहे हैं।
PUCL टीम से बात करने वाली लड़कियों ने बताया कि यही कारण है कि विवाद के दौरान उन्होंने मीडिया से बात नहीं की क्योंकि उन्हें लगा कि मीडिया उनके बयानों में हेरफेर कर सकता है और उनकी स्थिति को और भी अनिश्चित बना सकता है।
नौकरशाहों के साथ बातचीत से पता चला कि संबंधित विभाग और प्रशासनिक ढांचे न केवल मुद्दे को हल करने और मुस्लिम छात्राओं के अधिकारों को बनाए रखने में विफल रहे हैं, बल्कि उन्हें न्याय से भी वंचित कर दिया है।
प्रभावित छात्रों पर फैसले का प्रभाव – शैक्षिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आयाम

हिजाब पहनने वाली उन ज्यादातर छात्राओं के लिए जो इस साल परीक्षा में शामिल न हो सकीं, उच्च न्यायालय का फैसला उनकी पढ़ाई और भविष्य की योजनाओं के मार्ग में एक कठोर रुकावट के रूप में आया। उनकी तत्काल चिंता परीक्षा में शामिल होने और अपनी शिक्षा को फिर से शुरू करने को लेकर है।
इस प्रकार, वे पहनने और संगति के संदर्भ में अपनी पसंद की स्वतंत्रता को बल पूर्वक रखने की कोशिश कर रही हैं। हिजाब मुद्दे से उत्पन्न संघर्ष और तनाव का लगातार सामना करने से छात्रों में अलगाव और विघटन की भावना पैदा हो रही है। उन्हें हिजाब पहनने के कारण लक्षित किया जा रहा है और उन्हें लगातार भय और दबाव की स्थिति में रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
PUCL ने जिन मुस्लिम छात्राओं से बात की, उनकी तात्कालिक चिंता जहां एक तरफ अदालत के फैसले को उलटने की मांग थी, जिससे फैसले और उसके बाद हुए नुकसान की भरपाई हो सके। वहीं उनका यह भी कहना है कि कक्षा में हिजाब पहनना संविधान द्वारा प्रत्याभूत एक मौलिक अधिकार है, जिसका अर्थ है कि हिजाब पहनने के अधिकार के साथ भी आधुनिक शिक्षा प्राप्त की जा सकती है। वे चाहती हैं कि इस विकल्प को मान्यता दी जाए और इसी रूप में स्वीकार किया जाए।

साक्ष्य इंगित करते हैं कि कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले के बाद भारतीय नागरिकों को गारंटीकृत अधिकारों की एक श्रृंखला का व्यापक उल्लंघन किया गया है। जिन अधिकारों का उल्लंघन किया गया है उनमें बिना किसी भेदभाव के शिक्षा का अधिकार, समानता का अधिकार, गरिमा का अधिकार, निजता का अधिकार, अभिव्यक्ति का अधिकार, गैर-भेदभाव का अधिकार और मनमानी राज्य कार्रवाई से स्वतंत्रता शामिल हैं। विशेष रूप से बिना किसी भेदभाव के शिक्षा के अधिकार के उल्लंघन पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। यह न केवल एक मौलिक अधिकार है, बल्कि राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत राज्य का दायित्व भी है। अनुच्छेद 41 के तहत राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमा के भीतर अन्य अधिकारों के साथ शिक्षा का अधिकार निश्चित करने के लिए प्रभावी प्रावधान करेगा।
यह रिपोर्ट संवैधानिक नैतिकता की रक्षा के दायित्व को पूरा करने में राज्य सरकार की पूर्ण विफलता को दर्शाती है, और इसलिए ऐसा करने का दायित्व नागरिकों पर पड़ता है। अपने हक के लिए खड़े होने वाली मुस्लिम छात्राओं का हौसला, जज्बा और निडरता काबिल-ए-तारीफ है।

(यह लेख पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज कर्नाटक (PUCL _ K) की अंतरिम रिपोर्ट “कर्नाटक के शैक्षिक संस्थानों पर हिजाब प्रतिबंध का प्रभाव” पर एक विश्लेषणात्मक अध्ययन है।)

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