हम हिजाब विवाद को कैसे सुलझा सकते थे?

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-निहाल किडीयूर

अंग्रेजी से अनुवाद- उसामा हमीद

कर्नाटक के लोगों के लिए पिछले कुछ दिन बेहद तकलीफदेह रहे हैं। उडुपी के कुंडापुर कॉलेज में मुस्लिम छात्रों के लिए दरवाजे बंद कर दिए जाने की दुखद घटना, परिजनों, विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के लिए एक डरावनी परिस्थिति है।शिक्षा में मुस्लिम लड़कियों की संख्या में सुगम वृद्धि संस्थानों पर वर्षों में धीरे-धीरे निर्मित इस विश्वास का परिणाम थी कि वे सीखने और विकास के समावेशी स्थान हैं। लेकिन आज इस मौलिक विचार को चुनौती दी जा रही है कि शिक्षा आस्था से समझौता करने की कीमत पर आती है। हाल के एक लेखांश में, योगेंद्र यादव बताते हैं कि कैसे कभी-कभी गलत प्रश्न का सही उत्तर भी गलत उत्तर होता है। वे कहते हैं कि कैसे लोग हिजाब के पूरे मुद्दे को सुविधानुसार विभिन्न दृष्टिकोणों से देख रहे हैं, और कैसे, एक लोकतांत्रिक समाज में, समुदायों और विचारों के बीच हमेशा संवाद और विचार-विमर्श होता रहना चाहिए। यही आधुनिक समाज की जीवन रेखा है।उदाहरण के लिए मेरी कहानी को लीजिए। मैं उडुपी जिले के थोनसे नामक गांव से हूं, जहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, यह एक ऐसा जिला है जहां मुस्लिम आबादी 15% से कम है। मैंने मिलाग्रेस प्री-यूनिवर्सिटी (पीयू) कॉलेज, उडुपी में पढ़ाई की, जहां मुस्लिम लड़कियों के पास कक्षा में हिजाब पहनने का विकल्प था। वे बुर्के में आती थीं, जिन्हें वे कक्षा में प्रवेश करने से पहले हटा देती थीं, लेकिन अपने सिर को वे हिजाब में ढक कर ही रखती थीं। इसी प्रकार मेरी पत्नी ने भी अपनी प्राथमिक शिक्षा के लिए एक सरकारी स्कूल में पढ़ाई की, बाद में हाई स्कूल के लिए एक निजी संस्थान में शिक्षा प्राप्त की, फिर पीयू और अंत में एक सरकारी कॉलेज – उसने इस पूरे समय हिजाब पहना था। कक्षा में यह समावेश कर्नाटक में मुस्लिम महिलाओं को शैक्षिक और सामाजिक सशक्तिकरण प्रदान करने की कुंजी थी।सरकारी और निजी संस्थानों के अलावा, इस क्षेत्र की मुस्लिम लड़कियों के पास मुस्लिमों द्वारा संचालित महिला विशेष संस्थानों जैसे कि मेरे गांव में सालिहात कॉलेज या मैंगलोर में हिरा कॉलेज में पढ़ने का विकल्प था, जो उन्हें उनकी धार्मिक स्वतंत्रता से समझौता करने के डर से मुक्त, शिक्षा में आगे बढ़ने का मौका देते हैं। इन संस्थानों का इतिहास लड़कियों की शिक्षा के संबंध में समुदाय के बीच जागरूकता में वृद्धि से जुड़ा हुआ है। हमारे संगठन, स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया (एसआईओ) ने भी इस प्रयास में पर्याप्त योगदान किया है। हिजाब पहनने वाली मुस्लिम लड़कियों को कक्षाओं से प्रतिबंधित करने के कदम से यह सब श्रमसाध्य कार्य और प्रगति पूर्ववत हो जाने का खतरा है।अफसोस की बात है कि आज पूरे मुद्दे को सतही तौर पर देखा जा रहा है और सोशल मीडिया पर जो कुछ चल रहा है, उसके आधार पर राय बनाई जा रही है। उडुपी के सरकारी कॉलेज के मामले में, मामला तब सामने आया जब कुछ छात्राओं ने, जिन्होंने हिजाब नहीं पहना था, एक दक्षिण पंथी छात्र संगठन के नेतृत्व में एक विरोध प्रदर्शन में भाग लिया, और तब स्थानीय समुदाय के सदस्यों को इसमें शामिल होना पड़ा। और जब इनमें से कुछ छात्राओं ने बताया कि उन्हें कॉलेज द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार कक्षा में हिजाब पहनने की अनुमति नहीं है, तो मुद्दा हद से बाहर निकल गया।उडुपी मुस्लिम ओक्कुटा ने – एक संगठन समूह जो इस क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका एसआईओ एक अभिन्न अंग है – हर कदम पर इस मुद्दे को सौहार्दपूर्ण ढंग से हल करने का प्रयास किया। प्राचार्य व महाविद्यालय विकास समिति की बैठक से लेकर जिला आयुक्त व राज्य के अल्पसंख्यक विभाग तक पहुँच कर तनाव को दूर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई।जब पहली बार काले हिजाब का मुद्दा उठा, तो ओक्कुटा के एक महिला प्रतिनिधिमंडल ने प्रिंसिपल से मुलाकात की और उनसे छात्राओं को नीले हिजाब (शॉल) पहनने की अनुमति देने का अनुरोध किया, जो कॉलेज की यूनिफॉर्म से मेल खाता है। प्राचार्य ने नियम पुस्तिका का हवाला देते हुए उनके इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया। जिसके बाद कॉलेज की विकास समिति के अध्यक्ष और विधायक रघुपति भट से संपर्क किया गया, जिन्होंने विरोध करने वाले छात्रों के लिए ऑनलाइन कक्षाओं का सुझाव दिया।जब मामला उडुपी के अन्य हिस्सों में बढ़ा, विशेष रूप से कुंडापुर कॉलेज, जहां छात्राओं को दो दिनों से परिसर में आगमन की अनुमति नहीं थी, ओक्कुटा के अधिकारियों ने अतिरिक्त जिला आयुक्त के साथ मुलाकात की और शांति स्थापित करने की कोशिश की और यह सुनिश्चित किया कि हिजाब वाली छात्राओं को परिसर में अनुमति दी जाएगी, लेकिन समस्या का समाधान होने तक अलग कक्षा में बैठेंगी। पीयू बोर्ड के साथ बैठक भी हुई। इस प्रकार स्थानीय स्तर पर इस मुद्दे को हल करने के सभी माध्यमों को ईमानदारी और दृढ़ता के साथ अपनाया गया।साथ ही साथ, छात्रों और उनके अभिभावकों को इस समस्या को उचित तरीके से हल करने के लिए भी मार्गदर्शन करने के प्रयास किए गए। ओक्कुटा ने छात्राओं से यूनिफॉर्म से मैच करते हुए हिजाब पहनने को कहा था, जो कि एक आम बात है। उदाहरण के लिए, कुंडापुर कॉलेज ने छात्रों को (इस विवाद से पहले) इस शर्त के साथ हिजाब पहनने की अनुमति दे रखी थी कि यह यूनिफॉर्म के रंग का हो। धार्मिक विद्वानों और नेताओं के साथ अभिभावकों की एक बैठक की भी व्यवस्था की गई थी, जिन्होंने समझाया कि रंगीन पर्दा भी हिजाब का एक उपयुक्त रूप है, और उन्हें काले रंग पर जोर नहीं देना चाहिए। ये सभी कोशिशें वार्तालाप और संवाद के उन स्तरों को उजागर करती हैं, जिनका पालन गतिरोध को हल करने में किया गया था।लेकिन कानून और व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित करने में राज्य की स्पष्ट विफलता से परे, दक्षिण पंथी छात्र संगठनों की भगवा शॉल पहनने, झूठी समानता बनाने और “जय श्री राम” के खुले युद्ध के नारों के माध्यम से हंगामा करने की चाल ने माहौल को और खराब कर दिया।वास्तव में, यह कहना कि विवाद से पहले 80 मुस्लिम छात्राओं का एक बड़ा प्रतिशत हिजाब पहनना जरूरी नहीं मानता था, आपत्ति के लिए कोई वास्तविक आधार नहीं है। खासकर जब उनमें से कई हिजाब पहनने को तैयार हों, या कम से कम पसंद के विकल्प को मानती हों, लेकिन इस स्वतंत्रता को एकरूपता की आड़ में खत्म दिया गया। दुख की बात यह है कि आजादी के सात दशकों के बाद भी, एक समुदाय की शिक्षा तक पहुंच हिजाब जैसी बुनियादी चीजों पर समझौता करने के अधीन है।यह विवाद तथाकथित उदारवादियों और प्रगतिवादियों को भी भंडाफोड़ करता है, जो मर्ज़ी और पसंद की बात करते हैं, लेकिन यह समझने में विफल रहते हैं कि एक व्यक्ति की अंतरात्मा – जो इस्लाम में ईश्वर और पुरुष/महिला के बीच के रिश्ते का दूसरा नाम है – पवित्र है। और यह कि यह संविधान में निहित है और निजता के अधिकार के रूप में सर्वोच्च न्यायालय के पुट्टस्वामी निर्णय द्वारा भी दोहराया गया है।यह प्रश्न अब भी बना हुआ है कि क्या छात्रों के लिए उनके विवेक और आस्था को खोए बिना शिक्षा ग्रहण करने का कोई प्रावधान है? विभिन्न मानकों को विभाजित करने वाला राज्य का धर्मनिरपेक्ष प्रयास भी एकरूपता की इस बोली में समस्या का भाग है। कक्षाएं, न केवल पाठ्यक्रम में शामिल विषयों और पाठों को सीखने के लिए, बल्कि आपसी सम्मान के आधार पर आपसी संबंधों को समझने, परखने और विकसित करने के लिए भी साझा स्थान हैं।शैक्षिक संस्थानों को विविध पृष्ठभूमि के छात्रों के बीच स्वस्थ चर्चा के लिए माहौल प्रदान करना चाहिए और उन्हें एक-दूसरे के प्रति सम्मान विकसित करने में मदद करनी चाहिए। जहां एक ओर इस समस्या के भड़कने की जांच की जरूरत है, इस मुद्दे को वास्तविक वार्तालाप और एक ईमानदार संवाद, विचार-विमर्श और समतावादी समाज की खोज की आवश्यकता है ताकि हम आगे बढ़ सकें।

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