पाकिस्तान में नया संकट- आज़ादी मार्च

प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे मौलाना फजलुर्रहमान का कहना है कि वर्तमान सरकार पूरी तरह विफल हो चुकी है। उनका आरोप है कि सरकार की गलत नीतियों की वजह से महंगाई,बेरोजगारी और आर्थिक अस्थिरता पैदा हुई है।

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आज़ादी मार्च को संबोधित करते हुए जमीयत उलेमा इस्लाम के प्रमुख फजलुर्रहमान

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में इस समय हज़ारो प्रदर्शनकारी सड़कों पर है। उनका कहना है कि वर्तमान सरकार को सत्तासीन होने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि जिन चुनावों के आधार पर इनकी जीत है, वो पूरी तरह आशंकाओ और धांधली से प्रभावित थे। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि इन हालात में प्रधानमंत्री इमरान खान को अपने पद से इस्तीफा देकर संसद भंग कर देनी चाहिये, तथा नयी चुनावों तारीख़ों की घोषणा भी साथ हो ताकि एक नई पारदर्शी सरकार का गठन हो सके।

पाकिस्तान सरकार के लिये एक और चुनौती

अपने अस्तित्व के सबसे बुरी अर्थव्यवस्था के दौर से गुज़र रहे पाकिस्तान सरकार के लिये आज़ादी मार्च ने और मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इमरान खान के सत्ता संभालने के बाद से पहली बार उन्हें बड़े राजनीतिक संकट का सामना है। प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे मौलाना फ़ज़्लुर्रहमान का कहना है कि वर्तमान सरकार पूरी तरह विफल हो चुकी है। उनका आरोप है कि सरकार की गलत नीतियों की वजह से महंगाई, बेरोज़गारी और आर्थिक अस्थिरता पैदा हुई है। इतना ही नहीं बल्कि पाकिस्तान के अस्तित्व से जुड़े मुद्दे कश्मीर पर भी सरकार नाकाम हुई है। ऐसे मे सरकार के सामने चुनौती है कि वो किस तरह इन आरोपों का जवाब देती है। ज्ञात रहे कि पाकिस्तान की वर्तमान सरकार पर अनुभवहीनता के चलते गलती करने के आरोप लगते रहे हैं।

क्या देश में फिर होगा सत्ता परिवर्तन ?

पाकिस्तान मे विपक्षी दलों द्वारा धरना प्रदर्शन कर सत्ता को अपदस्थ करने की पुरानी परंपरा रही है। देश में अब तक कई बार ऐसा हुआ जब ऐसे प्रदर्शनों के बाद सेना ने मार्शल लॉ लागू कर सत्ता की चाबी अपने हाथ में ले ली। इस्लामाबाद मे चल रहे ‘आज़ादी मार्च’ मे भी लगभग सभी बड़े विपक्षी राजनीतिक दल शामिल है। जिनमे पीएमएल-एन और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी प्रमुख हैं। उन दलों का जमीनी प्रभाव भी बहुत अहम है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या किसी मानवीय क्षति होने के डर से, एक बार फिर सेना अपने हाथों में सत्ता की बागडोर संभालेगी? बज़ाहिर तो इसकी संभावना वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत कम है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान में सरकार और सेना के बीच सबसे अधिक समन्वय और साझेदारी है और पाकिस्तान में कोई भी राजनीतिक उथल-पुथल सेना की सहमति के बिना नहीं होती है। इस मार्च के आरंभ में जब जमीयत उलेमा इस्लाम के प्रमुख फ़ज़्लुर्रहमान के सरकार के विरुद्ध तेवर देखकर सबका यही अनुमान था कि इस प्रदर्शन के पीछे सेना की भी शह है। लेकिन हाल ही में सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ ग़फ़ूर द्वारा दिये गये बयान से स्पष्ट है कि सेना पूरी तरह सरकार के साथ है। ऐसे मे किसी बड़े राजनीतिक परिवर्तन का होने की आशंकाएं यहीं दम तोड़ देती हैं।

भारत पर प्रभाव

वैसे तो पाकिस्तान की राजनीतिक हलचलें भारत को कम ही प्रभावित करती हैं। इस घटनाक्रम के दोनो रुपों मे भी भारत पर अधिक प्रभाव पड़ने वाला नहीं है। क्योंकि भारत और पाकिस्तान के मध्य इस समय तनाव चरम पर है। दोनो देश के दूतावास लगभग निष्क्रिय है। सभी प्रकार की पोस्टल और कम्यूनिकेशन की सुविधाएं बाधित हैं। वैसे भी पाकिस्तान की विदेश नीतियों का निर्वहन वहां की सेना करती है, तो ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री कोई भी रहे ये निर्भर नहीं करता है।

लेखक

Ashfaaq Khan

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