महामारी में भारतीय अर्थव्यवस्था और तीसरी लहर की आमद

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कोविड-19 ने दुनिया की लगभग सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को भी गंभीर चोट पहुंचाई है। व्यवसायों के साथ-साथ आम जनमानस के रोज़मर्रा के जीवन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा है।

कोरोना उनके वित्तीय जीवन पर भी गहरा असर छोड़ गया है जिसे भरने में अभी लंबा वक़्त लगेगा।

Pew Research Centre की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक़ कोरोना महामारी की पहली लहर ने भारत में ग़रीबों की संख्या लगभग दोगुनी कर दी है। इस रिपोर्ट में प्रतिदिन 150 या उससे कम रूपये कमाने वालों को ग़रीब की श्रेणी में रखा गया है और यह बताया गया है कि इनकी संख्या पहले 6 करोड़ थी जो बढ़कर 13.5 करोड़ पहुंच गई है। मध्यम वर्गीय आबादी की तादाद भी 9.9 करोड़ से घटकर 6.6 करोड़ हो गई है। Pew के एक और सर्वेक्षण के अनुसार साल 2021 की शुरुआत से ही तक तक़रीबन 2.5 करोड़ भारतीय अपनी नौकरी गंवा चुके हैं।

सवाल यह उठता है कि यह सब-कुछ अचानक हो गया? क्या यह मानना ठीक होगा कि सिर्फ़ महामारी ने भारत की अर्थव्यवस्था को इस संकट के दौर में पहुंचा दिया है? या हालात पहले से‌ ही ख़राब थे और महामारी ने उन्हें चरम पर पहुंचा दिया? इसके लिए ज़रूरी है कि हम मार्च 2020, जब देश में पहला लॉकडाउन लगा, उससे पीछे जाएं और अर्थव्यवस्था का विश्लेषण करें।

Centre for Monitoring Indian Economy के अनुसार सन् 2011-12 से ही भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती निवेश में मंदी रही है। साल 2016 में नोटबंदी और फिर 2017 में जीएसटी ने व्यापार को तगड़ी मार पहुंचाई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार सन् 2017-18 में बेरोज़गारी पिछले 45 सालों में सबसे ज़्यादा रही जो 61% थी। मेक इन इंडिया की जब शुरुआत हुई तब यह माना जा रहा था कि निर्यात में बढ़ोत्तरी होगी और भारत आने वाले समय में विश्व का महत्वपूर्ण उत्पादन केंद्र बन जाएगा। लक्ष्य तो यह था कि मैन्युफ़ैक्चरिंग को जीडीपी का 25% हिस्सा बनाया जाए लेकिन यह 15% पर ही रुक गया। Centre for Economic Data and Analysis के अनुसार इस क्षेत्र का सबसे बुरा हाल रहा और मैन्युफ़ैक्चरिंग क्षेत्र में नौकरियां बीते 5 साल में आधी हो गईं। 2016 से जीडीपी और 2018 से इन्वेस्टमेंट में गिरावट देखी जा रही थी। CMIE के डेटा के अनुसार Industrial Production नीचे जाता रहा। 2014 से ही लगातार अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल देखी गई और मार्च 2021 में जब देशव्यापी लॉकडाउन लगाया गया, उसके बाद देश में अर्थव्यवस्था के हालात पूरी तरह बदल गए।

कोरोना महामारी के बाद स्वदेशी का नारा

मार्च 2020 में सरपंचों से वीडियो कॉन्फ़्रेसिंग पर बात करते हुए प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भरता पर काफ़ी ज़ोर दिया। आत्मनिर्भरता की बात भारत जैसे देश के लिए नई नहीं है। 70 और 80 के दशक में भी अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने की बात की गई थी लेकिन उस दौर के नारे में बहुत सारी ख़ामियां भी थीं। लाइसेंस राज और कोटा परमिट जैसी ख़ामियों के साथ-साथ उस समय जो उत्पाद भारत में बन रहे थे उनके दाम भी ज़्यादा थे और गुणवत्ता का स्तर भी कम था, लेकिन जिस आत्मनिर्भरता की बात इस दौर में की जा रही है उसमें कहा जा रहा है कि उत्पादों की गुणवत्ता भी विश्व स्तर की हो और ग्लोबल बाज़ार में अन्य सामानों के मुक़ाबले दाम भी कम ‌हों। बताते चलें कि आत्मनिर्भरता के पीछे यह उद्देश्य भी है कि भारत को ग्लोबल मैन्युफ़ैक्चरिंग केन्द्र बना दिया जाए। आशा जताई गई कि इससे बड़ी तादाद में कंपनियां चीन को छोड़कर भारत की तरफ़ आएंगी लेकिन विशेषज्ञ ऐसा नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि ट्रेड वॉर के दौर में यह सब प्रोपेगेंडा है और यह कहने के पीछे कारण है कि भारत अभी बुनियादी ढांचे और अपडेटेड टेक्नोलॉजी में चीन से बहुत पीछे है। चूंकि चीन अपनी टेक्नोलॉजी को अपग्रेड करता रहता है जिसकी वजह से MNC चीन जाएंगी, भारत नहीं।

कोरोना महामारी ने व्यवसाय और जीवन को कैसे प्रभावित किया?

1. स्वतंत्र आवागमन पर रोक की वजह से सर्विस सेक्टर प्रभावित

जैसे-जैसे वायरस फैलता गया सभी राज्य सरकारों ने पूर्णतः लॉकडाउन का ऐलान कर दिया, जिससे स्वतंत्र आवागमन पर रोक लग गई। भारत में रोज़गार से जुड़ा एक बड़ा तबक़ा असंगठित क्षेत्र में काम करता है। रेस्टोरेंट्स, होटल, पर्यटन स्थलों में पाबंदी से इस क्षेत्र पर बुरी मार पड़ी। Confederation of All India Traders के अनुसार अक्टूबर 2020 तक मांग में लगभग 10% की तेज़ी देखी गई। इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अगर हालात सामान्य रहते (जो कि अप्रैल-मई 2021 में भयावह रूप धारण कर चुके थे) तो चीज़ों में और सुधार की उम्मीद की जा सकती थी।

2. वर्क फ़्रॉम होम का कल्चर विकसित

वर्क फ़्रॉम होम (Anywhere) जैसे काम करने के तरीक़े इस दौरान विकसित हुए जिनकी वजह से Social Distancing संभव हो पाई। काम करने के इस तरीक़े से कर्मचारियों और कंपनियों दोनों को बहुत फ़ायदा हुआ। कर्मचारी अपने घर में रहकर काम करने लगे जिससे उनके ख़र्च कम हुए और कंपनियों को भी अपना Fixed Overhead कम करने का मौक़ा मिल गया।

3. स्वास्थ्य और फ़ार्मा क्षेत्र पर प्रभाव

भारत विश्व में स्वास्थ्य के क्षेत्र में तीसरा बड़ा स्थान रखता है‌। यह लगभग 60% वैक्सीन का उत्पादन करता है, जिसमें Diphtheria, Tetanus और काली खांसी जैसी बीमारियों की वैक्सीन शामिल है। कोरोना महामारी के दौरान स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़े परिवर्तन देखे गए। स्वास्थ्य और फ़ार्मा सेक्टर के स्टॉक्स की क़ीमतों में वृद्धि आई क्योंकि कंपनियों की सेल बहुत ज़्यादा थी। Pfizer Moderna और Serum Institute of India जैसी बड़ी कंपनियों के लिए तो चांदी हो गई। हेल्थ ऐप्स का चलन भी बढ़ा क्योंकि डॉक्टर मरीज़ों से सीधे तौर पर नहीं मिल रहे थे। डिजिटल स्क्रीन, फ़ोन कॉल और व्हाट्सऐप जैसे माध्यमों से मरीज़ डॉक्टरों से जुड़ सके।

4. शिक्षा क्षेत्र पर प्रभाव

कोरोना महामारी ने दुनिया भर में लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि उन्हें जीवन को जीने का तरीक़ा बदलना पड़ेगा। आमतौर से जिस तरह जीवन यापन होता था, वह तरीक़ा बदल गया है। इसलिए यह भी कहा जा रहा है कि कोरोना के साथ जीवन गुज़ारना सीख लीजिए क्योंकि अब यही ‘न्यू नॉर्मल’ है। शिक्षा का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। दुनिया में शायद ही ऐसी कोई जगह होगी जहां शिक्षा प्रणाली में बदलाव न किया गया हो ताकि छात्रों की पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया चलती रहे। टेक्नोलॉजी के भरोसे शिक्षा व्यवस्था चल रही है। एशियाई और अफ़्रीकी देशों में इसका बहुत नकारात्मक प्रभाव भी देखा गया है। एक बड़ी तादाद ऐसी है जिसकी पहुंच से टेक्नोलॉजी अभी भी दूर है। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जी रहे अनेक परिवार ऐसे भी हैं जो एक मोबाइल फ़ोन भी नहीं ख़रीद सकते। बाज़ारीकरण से शिक्षा का क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार Unacademy और Byju’s की कमाई में अत्यधिक बढ़ोत्तरी देखी गई है। हालात यह हैं कि Unacademy का Netflix जैसी कंपनी से मुक़ाबले की बात की जा रही है। इससे समझा जा सकता है कि भारत में EdTech कंपनियों की कमाई कितनी ज़्यादा है। यह तथ्य अलग है कि छात्रों की एक बड़ी आबादी की पढ़ाई-लिखाई पूरी तरह बर्बाद हो गई है।

5. विदेशी मुद्रा भंडार ने नई ऊंचाइयों को छुआ

1991 में जब भारत ने अपने बाज़ार को दुनिया के लिए खोला तो उससे पहले भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ी कठिनाइयों के दौर से गुज़रना पड़ा, जिसमें विदेशी मुद्रा का भंडार सिर्फ़ एक ही हफ़्ते का रह गया था यानि कि उसके बाद भारत बाहर से सामान नहीं ख़रीद सकता था। या यह कहा जाए कि बाहर से आने वाले सामान का भुगतान नहीं कर सकता था क्योंकि विदेशी मुद्रा नहीं बची थी। लेकिन कोरोना के दौर में कहानी कुछ अलग थी जब विदेशी मुद्रा भंडार तक़रीबन 608 बिलियन डॉलर के साथ अभी तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। विदेशी मुद्रा का बढ़ना किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत है जिससे प्रभावित होकर विदेश के लोग व कंपनियां वहां निवेश करती हैं।

विशेषज्ञों की मानें तो विदेशी मुद्रा के बढ़ने के पीछे बहुत-से कारण हैं। जैसे विदेशी निवेशकों का भारतीय कंपनियों के शेयर्स में निवेश (FDI और FPI के रूप में), अंतराष्ट्रीय बाज़ार में पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में गिरावट की वजह से इम्पोर्ट बिल में कमी, कोरोना की वजह से विदेशी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में भारतीय छात्रों की संख्या में कमी इत्यादि कारणों से विदेशी मुद्रा की मांग में कमी आई है।

 भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए प्रमुख चुनौतियां और अनिश्चितताओं का दौर

देश के प्रत्येक नागरिक को अच्छा और गुणवत्ता पूर्ण जीवन जीने का संवैधानिक अधिकार है लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि सरकार ऐसी आर्थिक नीतियों को अपनाए जिसमें हर व्यक्ति को न्यूनतम फ़ायदा तो पहुंचे। आने वाला समय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ज़्यादा चुनौतीपूर्ण होगा और अर्थव्यवस्था का भविष्य सही और सटीक आर्थिक नीतियों के चयन पर निर्भर करेगा।

1. बेरोज़गारी की समस्या

Centre for Monitoring Indian Economy के आंकड़ों के अनुसार भारत में इतनी बेरोज़गारी पिछले कई दशकों से नहीं देखी गई, जो आज देखने में आ रही है। शहरी क्षेत्रों का हाल ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में बहुत ख़राब है। शहरों में बेरोज़गारी चरम पर है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में MGNREGA जैसी योजनाओं का कुछ-न-कुछ सकारात्मक प्रभाव देखा जा रहा है। बेरोज़गारी की बढ़ती समस्या को लेकर सरकार को सचेत होना होगा और जल्द ही कोई क़दम उठाना होगा।

2. सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में गिरावट से भारी नुक़सान

कोरोना महामारी ने जीडीपी को जो नुक़सान पहुंचाया है वो तक़रीबन दो सालों के बराबर है। 2019-20 में भारत की जीडीपी लगभग 146 ट्रिलियन रुपया थी जो 2020-21 में 135 ट्रिलियन रुपया पर पहुंच गई। जब हम 146 ट्रिलियन रुपया की बात कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि भारत ने 146 ट्रिलियन रुपया के बराबर गुड्स और सर्विसेज़ को बनाया है। जीडीपी में गिरावट का सीधा असर रोज़गार पर पड़ता है क्योंकि जीडीपी में गिरावट मतलब बाज़ार में सामान की मांग नहीं हुई, जिसकी वजह से प्रोडक्शन नहीं हुआ अर्थात् कल-कारख़ाने बंद रहे। सरकार के लिए ज़रूरी है कि वह उत्पाद की मांग को बढ़ाने के तरीक़े विकसित करे और उत्पादन बढ़ाए।

3. रिटेल और होलसेल इन्फ़्लेशन में बढ़ोत्तरी

बाज़ार में मौजूद उत्पादों की क़ीमत में बढ़ोत्तरी चिंता का विषय है जिसके लिए जल्द-से-जल्द आर्थिक नीतियों का चयन करना ज़रूरी है। क़ीमतों में वृद्धि का सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ता है जो अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है। बीते माह के इन्फ़्लेशन डेटा को देखें तो मालूम होता है कि मंहगाई लगातार बढ़ रही है। इसी वजह से रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने पेट्रोल और डीज़ल की बढ़ती क़ीमतों को लेकर चिंता व्यक्त की है क्योंकि इससे ट्रांसपोर्ट कॉस्ट मंहगी हो जाएगी जिसका असर बाज़ार में उत्पादों की क़ीमतों पर पड़ेगा और आख़िरी उपभोक्ता तक मंहगा सामान पहुंचेगा‌। बढ़ती हुई मंहगाई को नियंत्रित करना इस समय सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।

4. धीमी वैक्सीनेशन प्रकिया और तीसरी लहर का ख़तरा

यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि भारत सरकार जब तक देश की एक बड़ी आबादी तक वैक्सीन नहीं पहुंचा देती, तब तक अर्थव्यवस्था में बहुत अधिक सुधार की उम्मीद करना बेकार है। जिस तरह वैक्सीनेशन प्रकिया में सुस्ती दिखाई जा रही है उससे तीसरी लहर का ख़तरा साफ़ नज़र आ रहा है। अगर ऐसा होता है तो अर्थव्यवस्था को बहुत भारी झटका लगेगा। जब तक यह अनिश्चितताओं का दौर रहेगा तब तक बाज़ार भी धीमा रहेगा और अर्थव्यवस्था को इससे उबरने में समय लग जाएगा क्योंकि ऐसे वक़्त में उपभोक्ता जेब पर तेज़ नज़र रखता है और कम ख़र्च करता है। बाज़ार में गति लाने और उपभोक्ताओं में आत्मविश्वास पैदा करने के लिए ज़रूरी है कि वैक्सीनेशन प्रकिया को तेज़ किया जाए।

 जैसा कि हमने पहले बताया कि आने वाला वक़्त भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियों का दौर है जिसमें यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं है कि आगे क्या होने वाला है! ऐसे वक़्त में सरकार ही है जो कोई बड़ा क़दम उठा सकती है जिससे अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके। प्राइवेट सेक्टर को उम्मीद की नज़र से देखना फ़ायदे का सौदा नहीं होगा क्योंकि इस तरह के अनिश्चितताओं के दौर में यह ज़िम्मेदारी सरकार की होती है कि वह अपनी पॉलिसियों को हालात देखते हुए बदले। यह भी ज़रूरी है कि लोगों में आत्मविश्वास पैदा किया जाए अन्यथा यह सुस्ती बरक़रार रहेगी। भारत में चुनाव सर्वेक्षण करने वाली एजेंसी CVoter की एक रिपोर्ट के अनुसार बड़ी संख्या में लोगों के जीवन स्तर में गिरावट आई है और अधिकतर लोगों को आने वाले एक साल में आशा की कोई किरण नज़र नहीं आ रही है।

– हमज़ा अय्यूबी

(लेखक अर्थव्यवस्था संबंधी मामलों के विशेषज्ञ तथा ‘Economics On The Move’ के संस्थापक हैं।)

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