अफ़ग़ानिस्तान को क्यों कहा जाता है साम्राज्यवादी महाशक्तियों का क़ब्रिस्तान?

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वर्तमान का जायज़ा यदि इतिहास के आईने से लिया जाये तो बहुत-सी हक़ीक़तें खुलकर सामने आती हैं। शायद यही कारण है कि इतिहास मानव सभ्यता व साम्राज्यों के लिए एक सीख भी होता है और संदेश भी। और इसी बहाने इतिहास से सबक़ लेने की औपचारिकता भी पूरी हो जाती है।

इसके विपरीत यदि इससे मुंह फेर लिया जाये तो वर्तमान भी असफलताओं की अंतहीन गाथा बन जाता है।

असफलताओं की ऐसी ही असीमित कहानियां पड़ोसी देश अफ़ग़ानिस्तान के अतीत के गर्भ में है। और अब एक नई दास्तान उसमें शामिल होने वाली है, जिसके लिए अफ़ग़ानिस्तान की वैश्विक पटल पर पहचान है, यानि साम्राज्यवादियों और आक्रांताओं के लिए कड़ा और पराजय का अनुभव।

अफ़ग़ानिस्तान मध्य एशिया का ऐसा देश जो भू-आबद्ध है लेकिन सामरिक व व्यापारिक कारकों से उतना ही महत्वपूर्ण। यह पश्चिमी एशिया को न सिर्फ़ दक्षिण एशिया से जोड़ता है अपितु हिंद महासागर व अरब सागर में आने के लिए प्रवेश द्वार भी है। यही कारण है कि मानव इतिहास में पिछले हज़ारों वर्षों से इसे अपने साम्राज्य में शामिल करने व यहां के प्राकृतिक संसाधनों से लाभ उठाने की इच्छा हर वैश्विक महाशक्ति की रही है। मगर यह भी संयोग है कि अफ़ग़ानिस्तान पर जितने भी बाहरी आक्रमण हुए, वे यहां पैर जमाने में हर बार असफल ही हुए। ईसा पूर्व से लेकर अब तक दुनिया कई राजनीतिक व्यवस्थाओं की साक्षी रही है, कभी राजशाही तो कभी तानाशाही, कभी साम्यवादी शासन तो कभी लोकतंत्र।‌‌ इन सभी ने अफ़ग़ानिस्तान की ओर रुख़ तो किया लेकिन परिणाम सदैव अफ़ग़ानिस्तान के ‘स्वाभिमान’ और ‘बाहरी अस्वीकरण’ के पक्ष में ही रहे।

अफ़ग़ानिस्तान पर बाहरी ताक़तों के अतिक्रमण का इतिहास तो ईसा पूर्व से ही प्रारंभ हो जाता है, लेकिन अधिकतम जानकारी यहां सिकंदर के असफल होने, पर्शियन साम्राज्य का अंग होने व सासानी सत्ता से जुड़े होने की ही मिलती है। इसके पश्चात् इस्लाम की छत्रछाया अफ़ग़ानिस्तान पर भी पड़ी। इस दौरान अफ़ग़ानिस्तान सीरियाई शासन का भाग रहा। यानि 1000 साल में अफ़ग़ानिस्तान पर विभिन्न वैश्विक शक्तियों व धार्मिक समूहों का प्रभाव पड़ा। लेकिन एक क्षेत्र व यहां के रहने वाले विभिन्न नस्लीय समूहों के विचित्र चरित्र में विशेष परिवर्तन नहीं हुआ, जो आज भी विद्यमान है।

ब्रिटिश राज के नाम पहली हार

आधुनिक काल में भी अफ़ग़ानिस्तान औपनिवेशिक ताक़तों की गिद्ध दृष्टि से अछूता नहीं रहा। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन के समय से ही यह दो तत्कालीन महाशक्तियों के प्रभाव केन्द्र में रहा है। भारत में राज कर रहा ब्रिटिश शासन सदैव अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति को लेकर दुश्चिंता में रहा। वह किसी भी परिस्थिति में भारत में अपने प्रभुत्व से कोई समझौता करने को तैयार नहीं था।‌‌ साथ ही उसे यह भी डर था कि उसकी समांतर महाशक्ति यानि सोवियत रूस भूमध्यसागरीय रणनीतियों को आधार बनाकर दक्षिण एशिया में कभी भी आक्रमण कर सकता है व अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा कर ब्रिटिश सम्राज्य के लिए चुनौती बन सकता है। वह अभी इसी दुविधा में था कि अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता पर क़ाबिज़ अब्दाली वंश के शासक शाह शुजा दुर्रानी को बग़ावत का सामना करना पड़ा। उसे शरण लेने के लिए भारत में पनाह लेनी पड़ी। यह उस विवाद का आरंभ था जो ‘19 वीं सदी के ग्रेट गेम’ के नाम से प्रचलित हुआ।

इसी दौरान सोवियत रूस और चीन के मध्य एक समझौता हुआ जिसे ‘फ़ॉरवर्ड पॉलिसी’ कहा जाता है। साथ ही अफ़ग़ानिस्तान में एक ऐसे शासन की शुरुआत हुई जिसका झुकाव ब्रिटिश शासन की महत्वाकांक्षाओं के विपरीत था। उस समय के शासक दोस्त मोहम्मद से ब्रिटिश शासन ने बार-बार प्रयास किया कि वह उनके अनुरूप विदेश नीति को आकार दें, ताकि क्षेत्र में स्थिरता बरक़रार रह सके। लेकिन दोस्त मोहम्मद ने बदले में पेशावर क्षेत्र की मांग रखी जो उस समय अविभाजित पंजाब प्रांत का हिस्सा था।

कहा जाता है कि उस समय प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी रणजीत सिंह के पास था जो शाह शुजा अफ़ग़ानिस्तान से भागते समय अपने साथ ले आया था। अंततः ईस्ट इंडिया कंपनी ने तय किया कि वह शाह शुजा दुर्रानी को सत्ता पर बिठाये, जो भारत की राजनीतिक शरण में था। सन् 1839 के मार्च माह में ब्रिटिश व पंजाब शासन ने संयुक्त रुप से अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया। जिसे ‘प्रथम आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध’ भी कहा जाता है। लगभग 15,000 सैनिकों के साथ ब्रिटिश सरकार ने जनरल ऑकलैंड के निर्देश पर अफ़ग़ानिस्तान की ओर चढ़ाई की। और मात्र कुछ ही दिनों में अफ़ग़ानिस्तान के प्रमुख शहरों, कंधार व ग़ज़नी पर क़ब्ज़ा कर वहां के शासक दोस्त मोहम्मद को सत्ता से बेदख़ल कर दिया। सन् 1840 में अफ़ग़ानिस्तान के नये अमीर शाह शुजा गद्दी पर बैठे, जो एक पूर्व नियोजित समझौते के तहत ब्रिटिश शासन के कठपुतली मात्र थे। इस तात्कालिक जीत के पश्चात् तो अफ़ग़ानिस्तान ब्रिटिश सरकार के लिए एक पर्यटन स्थल बन गया था।

आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध

अभी ब्रिटिश पूरी तरह रूसोफ़ोबिया से उभर ही रहे थे कि आख़िर वह हुआ जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। कुछ ही महीनों के बाद अपदस्थ अमीर दोस्त मोहम्मद ने स्थानीय लोगों को स्वाभिमान व मातृभूमि की क़सम दिलाकर ब्रिटिश सेना पर हमला कर दिया। हमले की भीषणता का आलम ये था कि लगभग सभी ब्रिटिश सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया गया और एक सैनिक को ब्रिटिश अधिकारियों के पास भारत भेजा गया ताकि वह अपनी पराजय की दुर्दांत पटकथा सुना सके। यह सब ब्रिटिश शासन के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं था। इसके बाद ब्रिटिश शासन ने लगभग 40 साल तक अफ़ग़ानिस्तान की ओर देखना भी उपयुक्त नहीं समझा।

भारत में छत्र राज कर रहा ब्रिटिश शासन कब तक अफ़ग़ानिस्तान के सामरिक व भू-राजनीतिक महत्व को अनदेखा कर सकता था। और सोवियत रूस भी एशिया और इसकी सामुद्रिक प्रासंगिकता के बिना नहीं रह सकता था। सोवियत रूस ने सन् 1878 ईस्वी में अपना एक दूत भेजकर अफ़ग़ानिस्तान के तत्कालीन शासक शेर अली से मधुर संबंध बनाने ही चाहे कि ब्रिटिश सरकार ने स्थिति भांपकर पुनः अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया व शेर अली के स्थान पर याक़ूब ख़ान को नये अफ़ग़ान अमीर के तौर पर नियुक्त कर दिया। इसे ‘द्वितीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध’ की मान्यता मिली। लेकिन इसी दौरान वहां मौजूद ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि की हत्या कर दी गई, जिससे उसे इतिहास याद करने के तौर पर एक संदेश-सा मिल गया था।

इसके बाद अंग्रेज़ों ने पूर्व अनुभवों की भयावहता याद कर अफ़ग़ानिस्तान से निकलकर इस बार ‘डूरण्ड रेखा’ नामी सीमा भारत व अफ़ग़ानिस्तान के बीच में खींच दी ताकि भविष्य में उसे कोई ख़तरा अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते से अपने शासन क्षेत्र भारत में न हो। आख़िरकार प्रथम विश्व युद्ध के समय अफ़ग़ानिस्तान एक स्वतंत्र देश के रुप में अस्तित्व में आया। इस तरह एक वैश्विक सम्राज्य उस कड़ी में जुड़ गया जिसे अफ़ग़ानिस्तान में असफलता की नियति ही हाथ लगी हो।

अफ़ग़ानिस्तान के हाथों सोवियत रूस का विघटन

दुनिया के लगभग एक तिहाई से अधिक भू-भाग पर मौजूद साम्राज्य ने अफ़ग़ानिस्तान की ओर आक्रमण करते समय शायद यह नहीं सोचा होगा कि युद्ध के अंत तक विश्वमंच पर उसकी राजनीतिक भूमिका ही समाप्त हो जायेगी। प्रथम विश्व युद्ध में अफ़ग़ानिस्तान तटस्थ ही रहा। लेकिन शीत युद्ध में अमेरिका की तरफ़ झुकाव ने सोवियत रूस की चिंता बढ़ा दी, क्योंकि उस समय अफ़ग़ानिस्तान और तत्कालीन सोवियत रूस के बीच लंबा  सीमाई जुड़ाव था।

दूसरा कारण अफ़ग़ानिस्तान में एक ऐसे शासक का विराजमान होना था जो साम्यवादी विचारधारा को अधिक महत्व नहीं देता था। ऐसे में सोवियत रूस ने अफ़ग़ानिस्तान पर सीधा हस्तक्षेप सन् 1979 में कर वहां के शासक अमीन ख़ान को सत्ता से बेदख़ल कर दिया और साम्यवादी विचारधारा के शासक बरबक करमाल को देश की बागडोर सौंप दी, जिसकी लोकप्रियता भी नग्णय‌ थी।

शीत युद्ध चरम पर था। ऐसे में अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में किसी साम्यवादी दल का इस तरह शीर्ष पर होना कैसे सहन कर सकता था? हालांकि वहां मौजूद अन्य धार्मिक व आदिवासी समूह भी सोवियत रूस के इस बर्ताव के ख़िलाफ़ थे। एक ऐसे देश में जहां लगभग शत-प्रतिशत आबादी धार्मिक प्रवृत्ति की हो, वहां साम्यवादी शासन के सहारे कब तक व्यवस्था चलाई जा सकती थी? सोवियत रूस ने जिस विचारधारा के आधार के अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया, अब एक ऐसी ही धार्मिक विचारधारा उसके प्रतिशोध के लिए तैयार थी।

अफ़ग़ानिस्तान के जिन धार्मिक समूहों को हथियार व आर्थिक सहायता की आवश्यकता थी उसकी भरपाई अमेरिका ने की, जबकि इस दौरान अफ़ग़ानिस्तान में लामबंद हो रहे विभिन्न नस्लीय समूहों ने संगठित होकर ‘मुजाहिदीन’ की परिकल्पना देकर सोवियत रूस के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। मुजाहिदीन को मानव संसाधन की आवश्यकता को दुनिया भर से आये मुसलमानों ने पूरा किया। अब यह विवाद सत्ता और शासन से परे धार्मिक युद्ध के रूप में धारण हो चुका था‌।

आख़िरकार सोवियत रूस की हार हुई और कुछ ही समय बाद दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य का अंत विश्व मानचित्र पर 15 देशों के उद्भव के साथ हुआ।

अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत रूस की वापसी

शांत अफ़ग़ानिस्तान व एक और साम्राज्य की पराजय

1992 वो दौर था जब पहली बार अफ़ग़ानिस्तान के लोगों की अंकाक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला शासन स्थापित हुआ। ऐसी सरकार जो अन्य किसी बाहरी शक्ति‌ से पूरी तरह मुक्त और स्वायत्त थी। इन सालों में अफ़ग़ानिस्तान में ‘तालिबान’ का शासन रहा। हालांकि इस सरकार को लेकर अमेरिका अधिक चिंतित नहीं था क्योंकि वह तालिबान को हितैषी के रूप में देखता था। लेकिन तालिबान का अपने देश में शरीयत के लागू करते ही पश्चिमी देशों में अलग तरह की बहस ने जन्म लिया। ये उसे भविष्य में ख़तरे, बड़े वैचारिक मतभेद और अपनी आर्थिक नीतियों के घाटे के रूप में देखने लगे। पश्चिम देशों, विशेष रूप से अमेरिका को एक ऐसे बहाने की तलाश थी जिसके आधार पर तालिबान को सत्ता से दूर कर दिया जाये।

ठीक इसी समय अमेरिका में 9/11 का हमला हुआ, जिसमें बहुत-से अमरीकीयों की जान गई। इसी आपदा को अमेरिका ने अवसर समझ कर तालिबान सरकार पर आरोप लगाया कि वह ओसामा बिन लादेन को शरण दिये हुए है, जो इस हमले में संलिप्त है। अमेरिका ने इसे आतंकी हमला क़रार देकर दुनिया भर से सहानुभूति जुटाई और आत्मरक्षा की आड़ में अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया।

अक्तूबर 2002 में अमेरिका की लगभग 1 लाख सेना, नाटो सहयोगियों  व अफ़ग़ानिस्तान के कुछ तालिबान विरोधी समूहों के साथ मिलकर अफ़ग़ानिस्तान पर धावा बोल दिया गया। इसके बाद तालिबान काबुल से निकलकर पहाड़ों में चल गये। ये अमेरिका के लिए वियतनाम का दोहराव था तो अफ़ग़ानिस्तान के लिय अनचाही परंपरा का हिस्सा।

अब लगभग दो दशक बाद अमेरिका भी पूरी तरह अफ़ग़ानिस्तान छोड़ कर जाने के लिए तैयार है। अमेरिका ने भी वह स्वाद चख लिया है, जो पूर्व में कई अन्य वैश्विक साम्राज्यों ने अनुभव किया था। इस युद्ध में अमेरिका को लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर ख़र्च करने पड़े, जो विश्व के कई देशों की जीडीपी से भी अधिक है। हज़ारों सैनिकों की मौत हुई, कई स्थायी रूप से विकलांग हुए तो कई मानसिक रोगी। और इन सबके बीच लाखों मासूम अफ़ग़ानियों की मौत और अंतहीन अशांति के भंवर में फंसी हुई कई पीढ़ियां।

15 अगस्त 2021 | काबुल से अमेरिकी दूतावास खाली होता हुआ

इतिहास के बारे में कहा जाता है कि यह अपने आप को दोहराता है और लगता है इसकी पुष्टि हर बार अफ़ग़ानिस्तान ही करता है। सैकड़ों वर्षों तक दुनिया की ताक़तों का संघर्ष क्षेत्र रहे अफ़ग़ानिस्तान का आचरण दुनिया से भिन्न है। आश्चर्य की बात है कि आधुनिक दुनिया में किसी के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप को अवैध और अनैतिक समझा जाता है, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में ऐसे आक्रमणों को अहिंसा की संज्ञा दी जाती है। गुणवत्तापूर्ण जीवन जीने और एक लोकतांत्रिक सरकार का चुनाव करने का अधिकार अफ़ग़ानिस्तान की अवाम से छीनने की अनंत कोशिशें हुईं हैं, जो अभी तक जारी हैं। आशा है कि दुनिया अफ़ग़ानिस्तान को अब ख़ुद की तस्वीर और तक़दीर बनाने का अवसर देगी, जिससे वे सदियों से योजनाबद्ध तरीक़े से वंचित किये गये हैं।

– अशफ़ाक़ ख़ान

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