भला ऐसे में सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा की चिंता क्यों हो?

यह एक कटु सच्चाई है कि सरकारी विद्यालयों में नामांकित अधिकांश बच्चे आर्थिक रूप से पिछड़े, गरीब, वंचित समाज के होते हैं, अकसर सम्पन्न और उच्च व मध्यम वर्ग के बच्चे तो प्राईवेट स्कूलों में अपने भविष्य का निर्माण करते हैं। नेताओं और नौकरशाह की बात तो दूर, अधिकांशतः विद्यालय में कार्यरत शिक्षक के बच्चे भी सुविधा सम्पन्न प्राईवेट स्कूलों में ही पढ़ाई करते हैं।

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प्रतीकात्मक फोटो

किसी भी राष्ट्र का सामाजिक आर्थिक व सांस्कृतिक विकास उस देश की शिक्षा पर निर्भर करता है। यदि देश या प्रदेश की शिक्षा नीति सदृढ़ नहीं होगी तो वहाँ की प्रतिभा दबकर रह जाएगी। निःसंदेह शिक्षा के क्षेत्र में बिहार का अतीत गौरवशाली रहा है और बिहारी प्रतिभा ने देश दुनिया में अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया है, परंतु वर्तमान शैक्षिक परिदृश्य में बिहार की शिक्षा व्यवस्था बदहाली का शिकार है। विश्वविद्यालयों व कालेजों में जहाँ अध्यापकों की घोर कमी है वहीं कई क्षेत्रीय भाषाएं अंगिका, मगही, अवधि, वज्जिका, भोजपुरी साहित्य के कोर्सेज विलुप्तता के कगार पर है क्योंकि इसे पढ़ाने वाले अध्यापकों की कमी पाई जा रही है। सरकारी महाविद्यालयों में नियमित रूप से क्लासेज नहीं हो रहे हैं।

राज्य के अधिकांशतः उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय व उच्च माध्यमिक विद्यालय शिक्षक विहीन हैं। बाबजूद इसके प्रत्येक वर्ष वहाँ से सैकड़ों विद्यार्थी मैट्रिक व इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर रहे हैं। आश्चर्यजनक है कि मध्य विद्यालयों के शिक्षकों के भरोसे उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय चलाए जा रहे हैं! बिहार विद्यालय परीक्षा समिति पटना द्वारा आयोजित होने वाले माध्यमिक एवं इंटरमीडिएट परीक्षा 2019 का शानदार रिजल्ट इस बात का द्योतक है कि बिहार में शिक्षा व्यवस्था काफी सुचारू रूप से चल रही है। गौरतलब है कि बगैर शिक्षक और बिना अध्यापन के यदि परीक्षा परिणाम अस्सी प्रतिशत से अधिक हो तो फिर शिक्षक बहाली की क्या आवश्यकता है? ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि बच्चों ने अपनी पढ़ाई किस परिस्थिति में की होगी।

प्रदेश के प्राथमिक व मध्य विद्यालय की बात करें तो स्थिति कुछ भी भिन्न नहीं है। शिक्षकों को कई कोटियों में बांट दिया गया है। ग्रेजुएट लेवल के विषयवार शिक्षकों की नियुक्ति के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की गई है! नतीजतन बेसिक लेवल के शिक्षकों के भरोसे ही कक्षा एक से लेकर आठ तक पढ़ाई होती है।छात्रों के अनुपात में वहां भी शिक्षकों की कमी देखी जा सकती है। अधिकांश नवसृजित प्राथमिक विद्यालयों में एकल शिक्षक हैं जिसका सीधा असर बच्चों के पठन पाठन पर होता है।

 यह एक कटु सच्चाई है कि सरकारी विद्यालयों में नामांकित अधिकांश बच्चे आर्थिक रूप से पिछड़े, गरीब, वंचित समाज के होते हैं, अकसर सम्पन्न और उच्च व मध्यम वर्ग के बच्चे तो प्राईवेट स्कूलों में अपने भविष्य का निर्माण करते हैं। नेताओं और नौकरशाह की बात तो दूर, अधिकांशतः विद्यालय में कार्यरत शिक्षक के बच्चे भी सुविधा सम्पन्न प्राईवेट स्कूलों में ही पढ़ाई करते हैं। भला ऐसे में सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा की चिंता क्यों हो?  इसका एकमात्र कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी है। समान विद्यालय प्रणाली का मुद्दा ठंडे बस्ते में पड़ा है।

प्रथम जैसी संस्थाओं की रिपोर्टें चौंकाने वाली होती है। विभागीय अधिकारियों की लापरवाही और सरकार की दोहरी नीति का खामियाजा समाज के पिछड़े और गरीब बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। प्रदेश की सत्तारूढ़ सरकार शिक्षकों को समुचित सम्मान भी नहीं देती! न सिर्फ शिक्षकों को कई वर्गों में बांटा गया है बल्कि समान कार्य के लिए समान वेतन भी नहीं दे रही है। फलतः यह मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय में अटका पड़ा है।

समय पर वेतन भुगतान तो नहीं हो पाता परंतु जब भी वेतन देने की बात होती है मीडिया में बड़े बड़े हेडलाइन के साथ सुर्खियाँ बटोरी जाती है मानो सरकार कोई वजीफा बांट रही हो।

एक ओर जहाँ शिक्षकों की घोर कमी है वहीं शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी, एसटीईटी) उत्तीर्ण अभ्यर्थियों की एक बड़ी संख्या सड़कों पर बेरोजगार घुम रही है और लगातार संघर्ष करते हुए पुलिस की लाठियां खा रही है। पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने का कांग्रेस का आश्वासन स्वागतयोग्य तो है परंतु इस मुद्दे पर खुलकर कोई चर्चा नहीं हो रही है।

शिक्षित बेरोजगार युवाओं को न तो रोजगार दिया जा रहा है और न ही अघ्यापकों की कमी का समाधान किया जा रहा है।  शिक्षकों के साथ भेदभाव करने वाली सरकार को वोट की चोट से सबक न सिखाया गया तो फिर बाद में शिक्षक संगठनों द्वारा विद्यालय बंद कर हड़ताल पर जाने, धरने प्रदर्शन का कोई औचित्य ही नहीं बनता है। दुनिया को लोकतंत्र की सीख भी बिहार की धरती से ही मिली है। लोकतंत्र के चुनावी समर में जनता ही जनार्दन होती है। विडंबना है कि आमजन शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को प्रमुखता से नहीं उठा रही है। नेताओं के चुटीले ब्यानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप के बीच शिक्षा, रोजगार जैसे अहम मुद्दे गौण हो जाते हैं।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी युवा पीढ़ी ऐसे मुद्दों पर सरकार को नहीं घेर पाती और पार्टियों द्वारा परोसे गए बेबुनियाद विषयों में उलझकर अपनी कीमती वोट उन्हें दे देती हैं। जाति, सम्प्रदाय, धर्म के नाम पर सिसायत कर वे सत्ता के शीर्ष तक पहुंच जाते हैं और आम अवाम फिर पुरानी धिसी पीटी व्यवस्था का हिस्सा बनकर रह जाते हैं। काश! आम मतदाता शिक्षा स्वास्थ्य व रोजगार को चुनाव का प्रमुख मुद्दा बना पाता.

लेखक: मंजर आलम (नालंदा खुला विश्वविद्यालय, पटना)

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