चमकीला सिर्फ़ नाच-गाना या कॉमेडी नहीं, एक पूरी ट्रेजेडी है

‘चमकीला’ की लोकप्रियता और दलित पहचान होने के नाते उसकी हत्या कर दी जाती है। हत्या की ख़बरें तो अख़बारों में छपती हैं लेकिन हत्यारों को सज़ा नहीं होती। एक कलाकार जो अपनी कम आयु में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय होता है, उसको भारतीय समाज दलित होने के कारण हमेशा के लिए भुला देता है।

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चमकीला सिर्फ़ नाच-गाना या कॉमेडी नहीं, एक पूरी ट्रेजेडी है

अब्दुल मुक़ीत

भारतीय पंजाब के पहले रॉकस्टार माने जाने वाले अमर सिंह ‘चमकीला’ अपने जीवन पर आधारित फ़िल्म की रिलीज़ के बाद एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं। इम्तियाज़ अली द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में दिलजीत दोसांझ, अमर सिंह ‘चमकीला’ और परिणीति चोपड़ा उनकी दूसरी पत्नी अमरजोत कौर की मुख्य भूमिका में हैं।

इस फ़िल्म को देखने के बाद इस बात का एहसास होता है कि अमर सिंह ‘चमकीला’ की ज़िन्दगी किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं थी। एक ऐसा गायक जो कम उम्र में काफ़ी लोकप्रिय हो गया, और जिसका सफ़र दुःखद मौत के साथ ख़त्म हुआ। इसके बावजूद अमर सिंह ‘चमकीला’ का नाम और काम आज भी मशहूर है।

फ़िल्म निर्माता इम्तियाज़ अली ने स्क्रीन पर ढाई घण्टा जो दिखाया है, वह इतना ताक़तवर है कि आप गूगल पर ‘चमकीला’ का नाम सर्च करने पर मजबूर हो जायेंगे। फ़िल्म में ‘चमकीला’ की भूमिका दिलजीत दोसांझ ने बख़ूबी निभाई है और स्टेज पर गीतों की प्रस्तुति इतनी दमदार दी है कि आप भूल जायेंगे कि यह ‘चमकीला’ है या कोई और!

‘चमकीला’, उनकी दूसरी पत्नी और सह-गायिका अमरजोत कौर और उनकी मंडली के दो सदस्यों की 36 साल पहले जालंधर ज़िले के मेहसामपुर में अज्ञात हमलावरों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी। यहीं से फ़िल्म तूल पकड़ती है। कहानी एक मोज़े बनाने वाली फ़ैक्ट्री से शुरू होती है, जहां ‘चमकीला’ मोज़े सिलने का काम करता है। लेकिन उसके दिमाग़ में पूरे दिन केवल संगीत बजता है। कहानी में असली ट्विस्ट तब आता है जब ‘चमकीला’ के हाथों में क़लम की जगह पहली बार एक माइक आता है। सामने बैठी भीड़ उसको अपना सुपरस्टार बना लेती है और फिर सुपरस्टार की ज़िन्दगी शुरू होती है। चार-पांच अश्लील गाने चमकीला को आसमान पर ले जाते हैं।

फ़िल्म में सस्पेंस है, मिस्ट्री है, मामूली से ख़ास बनने की असंभव कहानी है और रूह को हिला देने वाली एक ख़तरनाक एन्डिंग है। ऐसा लगता है कि फ़िल्म आपको कुछ सिखाना नहीं चाहती, कुछ बदलना नहीं चाहती, सिर्फ़ आपकी सोच को कुछ दशक पीछे ले जाकर चमकीला के साथ खड़ा करना चाहती है।

बीबीसी पंजाबी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, अमर सिंह ‘चमकीला’ का जन्म 1960 में लुधियाना ज़िले के डुगरी में हुआ था। एक ग़रीब दलित परिवार में जन्मे, अमर सिंह ‘चमकीला’ का वास्तविक नाम धनी राम था और जल्द ही उन्हें परिवार को आर्थिक रूप से सहायता देने के लिए काम करने की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ी। इसलिए उन्होंने लुधियाना की एक कपड़ा फ़ैक्ट्री में काम करना शुरू कर दिया। ‘चमकीला’ के परिवार के मुताबिक़ उन्हें गाने लिखने और गाने का बहुत शौक़ था। 8 मार्च 1988 को जालंधर में अमर सिंह ‘चमकीला’ और उनकी दूसरी पत्नी अमरजोत कौर की हत्या कर दी गई। लेकिन इतने साल बीत जाने के बावजूद इस रहस्य से पर्दा नहीं उठ सका कि उनकी हत्या किसने की।

अमर सिंह ‘चमकीला’ अपने विद्रोही रवैये के लिए मशहूर थे। लेकिन उनके कुछ गानों से कई लोग नाराज़ भी थे। हालांकि टेलीग्राफ़ के अनुसार, ऐसे गाने 1980 के दशक में पंजाब में काफ़ी लोकप्रिय थे। यही वह समय था जब ख़ालिस्तान आंदोलन अपने चरम पर था।

“ये बंदूक वालों का तो काम है गोली चलाना, तो ये चलाएंगे। हम गाने-बजाने वाले हैं, हमारा काम है गीत गाना तो हम गाएंगे। न वो हमारे लिए रुकेंगे ना हम उनके लिए। जब तक हम हैं, तब तक स्टेज पर हैं और जीते जी यूंही मर जाएं, इससे तो अच्छा है मर के ज़िंदा रहें।” फ़िल्म का यह डायलॉग ‘चमकीला’ की विद्रोही छवि को प्रदर्शित करता है।

8 मार्च 1988 के दिन जब ‘चमकीला’ और अमरजोत एक शो करने जा रहे थे, तभी दोपहर क़रीब 2 बजे जैसे ही वे अपनी कार से बाहर निकले, मोटर साइकिलों पर सवार एक गिरोह ने उन पर अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दीं। अमरजोत कौर गर्भवती थीं। उनकी छाती में गोली लगने से मौत हो गई। अमर सिंह ‘चमकीला’ को चार गोलियां लगीं और उनकी भी मौक़े पर ही मौत हो गई। हमले में उनके दो सहयोगी भी मारे गये। हत्या के मामले में आज तक किसी को गिरफ़्तार नहीं किया गया और पुलिस ने अब जांच भी बंद कर दी है।

यह फ़िल्म रिलीज़ होने के बाद देखने वालों की अलग-अलग टिप्पणियां भी सामने आईं हैं। शोभा गुप्ता लिखती हैं, “‘चमार हूं, पर भूखा नहीं मरूंगा!’ यह एक डायलॉग अमर सिंह ‘चमकीला’ फ़िल्म में जब आता है तो एक क़ाबिल कलाकार धनी राम के टीस का मर्म और उसकी ज़िद की गहराई और भीतर से समझ आती है। इस बार इम्तियाज़ अली का यह निर्देशन दुनिया के उन सभी कलाकारों के पक्ष में है जिन्हें शील-अश्लील केटेगरी में बांटा जाता है। कला, शील-अश्लील नहीं होती, सोच होती है। अमर सिंह ‘चमकीला’ फ़िल्म समाज की हिपोक्रेसी का सटीक उदाहरण है। इसमें वह सारे संघर्ष दिखाए गए हैं जो एक कलाकार के जीवन में होना स्वाभाविक हैं सिर्फ़ इसलिए क्योंकि हमारा समाज सेंसेटाइज़ नहीं है।”

आशिमा लिखती हैं, “एक महत्वाकांक्षी दलित मर्द भी अधिकतर एक दलित औरत को कुचल कर आगे बढ़ता है। आप कितने ही महान और पॉपुलर गायक क्यों ना हों, लेकिन अपनी पत्नी के साथ किये धोखे से मुक्त नहीं हो सकते। इतिहास गवाह है, महत्वाकांक्षी मर्द तरक़्क़ी की राह में जब भी किसी औरत को कुचलते हैं तो उसके प्रशंसक उसकी इस करतूत को इग्नोर कर देना चाहते हैं। शुक्र है कि इम्तियाज़ अली ने कम-से-कम एक सीन ऐसा रखा जिसमें चमकीला को उस अपराधबोध के साथ पहली पत्नी का सामना करना होता है, शायद कोई और फ़िल्म मेकर ये ज़हमत भी ना उठाता, क्योंकि बायोपिक में हीरो को महान बताने के लिए ऐसे पक्ष छुपाना या जस्टिफ़ाई करना नई बात ना होती। एक तो औरत ऊपर से ग़रीब, ऊपर से दलित, मतलब सोने पे सुहागा पे सुहागा! बाक़ी फ़िल्म की बात करें तो जाति का पक्ष ग़ायब तो नहीं लेकिन बेवजह हल्का ज़रूर किया गया है, जिसकी ज़रूरत नहीं थी, और इम्तियाज़ अली यह काम अच्छे से कर भी सकते थे। मैं मान नहीं सकती कि ‘चमकीला’ अपनी जाति के कारण तत्कालीन पंजाबी गायकी के मठाधीशों के निशाने पर नहीं रहा होगा। मैं नहीं मान सकती कि अपनी जाति के कारण उसको घृणा का सामना नहीं करना पड़ा होगा।”

शोभा लिखती हैं, “चमकीला एक अच्छा माध्यम है अपने आसपास के लोगों को समझने के लिए। आप देखिए कि कौन हैं जो इस फ़िल्म की तारीफ़ें कर रहा है? उनकी पहचान क्या है? वे किस जगह से आते हैं? क्यों उनके भीतर फ़िल्म को लेकर कोई सवाल नहीं है? क्यों आपको अपने आसपास कोई ये सवाल पूछता नहीं दिख रहा कि फ़िल्म में जाति को लेकर सिर्फ़ एक संवाद क्यों है? सिर्फ़ एक! किसी दलित व्यक्ति पर फ़िल्म बना कर आप उसकी आईडेंटिटी को एक संवाद में समेटकर कैसे छोड़ सकते हैं? कौन लोग हैं जो जाति के मुद्दे को डायल्यूट किए जाने पर भी तारीफ़ें कर रहे हैं और लिख रहे हैं कि ‘फ़िल्म बिना लाउड हुए अपनी बात कह रही है।’ कौन हैं ये लोग जिनके लिए जाति पर बात करना लाउड होने की तरह है? क्यों ‘चमकीला’ की हत्या की वजह जातीय हिंसा न होकर उसके केंद्र में ‘अश्लीलता’ को रखा गया और जाति के मुद्दे को मिटा दिया गया? क्यों जाति को गोल करके ग़रीब दिखा दिया जाता है दलित व्यक्ति को और जाति को ग़ायब कर दिया जाता है?‌‌ इतने बड़े जीवन को पर्दे पर उतारा गया है लेकिन क्यों कहीं जाति से जुड़ा कोई संवाद नहीं दिखता है? क्या असल जीवन में व्यक्ति कभी बात नहीं करता अपनी जातीय पहचान पर? अपने घर में, दोस्तों में? डायरी में? मन में? कहीं भी? तो क्यों नहीं दिखता फिर वो पर्दे पर?”

मनीष आज़ाद ने लिखा है कि ‘चमकीला’ की चमक बाज़ार की चमक है! वे कहते हैं, “बर्टोल्ट ब्रेख़्त के नाटकों में संगीत देने वाले ‘हैंस आइस्लर’ ने A Rebel In Music में जनता के बीच ‘लोकप्रिय’ सस्ते संगीत की तुलना देशी शराब से की है, जो दिन भर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद निश्चित रूप से जनता को तात्कालिक ‘रिलीफ़’ देती है, लेकिन दूरगामी तौर पर यह मेहनतकश जनता के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए किसी ज़हर से कम नहीं होती। इन सस्ते/अश्लील गानों की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण इनकी धुनें होती हैं, जो कमोबेश लोकधुनों से उठाई गयी होती हैं। हैंस आइस्लर कहते हैं कि लोकधुनें प्रकृति के बीच जीवन-संघर्षों से पैदा हुईं थीं, इसलिए सीधे जनता के दिलों पर असर करती हैं। पूंजीवाद में ये धुनें आमतौर से प्रतिक्रियावादी/यथास्थितिवादी विचारों/मूल्यों की वाहक बन जाती हैं।

अमर सिंह ‘चमकीला’ ऐसे गायकों की कड़ी में महज़ एक कड़ी भर था। 8 मार्च 1988 को अगर उसकी और उसकी सहगायिका पत्नी अमरजोत को गोली न मारी गयी होती तो शायद ही किसी की उसमें रूचि होती। ज़ाहिर है, इसी रूचि के कारण इम्तियाज़ अली ने उस पर यह बहुचर्चित फ़िल्म बनाई। एक इंटरव्यू में इम्तियाज़ अली ने ‘चमकीला’ में अपनी रूचि के कारणों का ख़ुलासा करते हुए कहा कि जब अश्लील गाने न गाने के लिए उस पर चारों तरफ़ से दबाव पड़ रहा था, तो उसने इन दबावों को दरकिनार करते हुए उसने अश्लील गाने गाना जारी रखा। लेकिन इसका कारण ‘चमकीला’ की बहादुरी नहीं थी, बल्कि लालच था। इसी चीज़ ने मुझे ‘चमकीला’ के साथ कनेक्ट किया।

यह TINA (There Is No Alternative) का दौर है। कलाकारों का भी इससे प्रभावित होना लाज़िमी है। इसलिए वे वही फ़िल्म बनाते हैं, जो जनता पसंद करती है। वही गाने बनाये जाते हैं, जो जनता पसंद करती है। सत्ता में वही बैठता है जिसे जनता पसंद करती है।‌ (People Get Leaders They Deserve) जनता फ़ासीवाद पसंद करती है इसलिए फ़ासीवाद आ जाता है। यानि अब कला का कोई मक़सद नहीं रहा, सिवाय जनता की तथाकथित पसंद का इन्तज़ार करने के। इसी कारण इम्तियाज़ अली की टीम फ़िल्म के प्रमोशन के लिए कपिल शर्मा के शो में भी गयी क्योंकि जनता को कपिल शर्मा शो की बेहूदगियां ‘पसंद’ हैं।

इम्तियाज़ अली को पता है कि 99 प्रतिशत अश्लील गाने महिलाओं का वस्तुकरण (objectification) करते हैं, इसलिए फ़िल्म के अंतिम हिस्से में ‘इरशाद कामिल’ के एक प्रभावशाली गाने के माध्यम से महिलाओं द्वारा पुरुष का वस्तुकरण (objectification) करवा दिया है। मामला बराबर। पोर्न फिल्म इंडस्ट्री में भी एक ‘female gaze’ धारा है, जो पोर्न में ‘फ़ीमेल एजेंसी’ को ‘प्रधानता’ देती है, परंतु असल सवाल तो शरीर के वस्तुकरण को ही ख़त्म करने का है। चाहे वह शरीर पुरुष का हो या स्त्री का।

जब मंटो पर जनता के स्याह पक्ष को उभारने का आरोप लगा था तो मंटों ने जवाब दिया कि मैं समाज की चोली क्या उतारूंगा, वो तो पहले से नंगी है। लेकिन मंटो जब जनता के स्याह पक्ष को सामने लाते हैं, तो उसे स्याह पक्ष की तरह ही पेश करते हैं। लेकिन ‘चमकीला’ के बहाने जब इम्तियाज़ अली जनता के स्याह पक्ष को सामने लाते हैं तो उसे उजला बना कर पेश करते हैं। फ़िल्म के अंत में DSP अपने किशोर बेटे से भावुक अंदाज़ में कहता है कि जब भी मन करे ‘चमकीला’ को सुन लिया कर। मंटो और इम्तियाज़ का यही फ़र्क़ है।

‘चमकीला’ बनाते हुए इम्तियाज़ अली ने काफ़ी शोध किया था, जो उनकी इस फ़िल्म में दिखता भी है। लेकिन क्या उन्होंने चमकीला की पहली पत्नी गुरुमेल कौर से बात की? गुरुमेल कौर का क्या पक्ष है? यह इस फ़िल्म में नदारद है। गुरुमेल कौर ने एक हालिया इंटरव्यू में बताया कि उन्होंने ‘चमकीला’ के मरने के बाद 5 रुपये प्रतिदिन पर दिहाड़ी की है। ‘चमकीला’ ने जब दूसरी शादी सह गायिका अमरजोत कौर से की तो उसने अमरजोत और गुरुमेल दोनों को अंधेरे में रखा और यह बात फ़िल्म में इतने हल्के और लगभग कॉमेडी की शक्ल में पेश की गयी है कि आश्चर्य होता है कि इम्तियाज़ अली महिला प्रश्न पर इतने असंवेदनशील कैसे हो सकते हैं!

जो लोग फ़िल्म की तारीफ़ महज़ इसीलिए कर रहे हैं कि चमकीला दलित समुदाय से था, हालांकि उसकी दलित पहचान महज़ एक डायलॉग में सीमित कर दी गयी है, तो उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि ‘चमकीला’ की पहली पत्नी गुरुमेल भी दलित ही थीं।‌ लेकिन कोई भी चमक रात को दिन में नहीं बदल सकती। कला का उद्देश्य चमक पैदा करना भी है, लेकिन यह चमक जीवन से निकलनी चाहिए, जीवन के कृतिम म्यूटेशन से नहीं।”

‘चमकीला’ की लोकप्रियता और दलित पहचान होने के नाते उसकी हत्या कर दी जाती है। हत्या की ख़बरें तो अख़बारों में छपती हैं लेकिन हत्यारों को सज़ा नहीं होती। एक कलाकार जो अपनी कम आयु में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय होता है, उसको भारतीय समाज दलित होने के कारण हमेशा के लिए भुला देता है।

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