आज़ादी का मतलब क्या?

आज़ादी का सबसे बड़ा हासिल तो यही है कि हमारे शासक हमारी मुट्ठी में हैं। लेकिन इस प्रत्यक्ष दिखने वाली सच्चाई की अपनी विडंबनाएं भी हैं। सत्ता लगातार जनता को बदल रही है। उसे अपने अधिकारों के प्रति सजग, समानता के मूल्य के प्रति सतर्क और सवाल पूछने वाले सचेत नागरिक नहीं चाहिए, उसे वैसे लोग चाहिए जिन्हें वह जनता का नाम देकर एक भीड़ में बदल सके और अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सके।

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आज़ादी का मतलब क्या?

प्रियदर्शन

क्या आज़ादी को शराब की तरह होना चाहिए जो जितनी पुरानी होती जाए, उतनी ही नशीली होती जाए? या आज़ादी को किताब की तरह होना चाहिए, जिसमें जितने पन्ने जुड़ते जाएं, उसके उतने ही अर्थ खुलते जाएं? पचहत्तर बरस पहले जो आज़ादी हमें मिली थी, वह न शराब थी न किताब थी, वह बस एक गुलाब थी – उम्मीदों का गुलाब, जो तीसरी दुनिया की मिट्टी में रोपा हुआ था और एक स्वप्नशील राजनेता की ऊपरी जेब से किसी बड़े प्रतीक की तरह झांकता था। उस वक़्त बहुत सारे कांटों और ज़ख़्मों के बावजूद वह गुलाब यह तसल्ली और भरोसा दिलाता था कि हिंदुस्तान नाम का जो बाग़ीचा है वह तरह-तरह के फूलों से महकता रहेगा और इस मुल्क की मिट्टी को ज़रख़ेज़ बनाता रहेगा।

लेकिन 75 साल बाद आज़ादी की बगिया में जितने फूल हैं, उससे ज़्यादा कांटे हैं और ऐसी ज़िद्दी हवाएं हैं जो चाहती हैं कि हर तरह के फूल इसमें न खिलें। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में आज़ादी की लड़ाई के लिए जो औज़ार हमने विकसित किए उनमें गोले-बंदूक नहीं थे, उनमें शांति, अहिंसा, सद्भाव का हल था जिससे हिंदुस्तान की पूरी मिट्टी जोत दी गई थी। महात्मा गांधी ख़ुद को जुलाहा मानते थे, उन्होंने चरख़े को आज़ादी का प्रतीक बनाया था, लेकिन वे किसी किसान की तरह इस देश के मिट्टी-पानी को अपने पसीने से सींचते और नरम बनाते रहे। यह सच है कि उनके देखते-देखते बंटवारे की राजनीति कामयाब हुई और दो मुल्कों में बंटे एक देश ने पाया कि वह आज़ाद तो हो गया है, मगर घायल है।

इस देश को बहुत संजीदगी से संभालने की ज़रूरत थी। गांधी के बाद नेहरू यह काम करते रहे। कोशिश करते रहे कि जो स्वाधीनता मिली है, वह सार्थक भी हो। तब इस सार्थकता की कई कसौटियां थीं – देश में सबके लिए खाने, कपड़े, आवास की व्यवस्था का सवाल था, शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान, कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में नई संस्थाएं बनाने की चुनौती थी और इन सबसे बढ़ कर उस गंगा-जमुनी तहज़ीब को बचाने का संघर्ष था जिसने बीते एक हज़ार साल में हिंदुस्तान का चेहरा गढ़ा था, जिसने आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी लेकिन जो सबसे ज़्यादा लहूलुहान थी। इसके अलावा एक चुनौती उस संविधान को लागू करने की थी जो ढाई हज़ार साल की तमाम असंगतियों-विसंगतियों को पाट कर एक समतामूलक समाज बनाने के सपने से बना था।

पश्चिम के बहुत सारे तथाकथित राजनीतिक जानकारों को तब लगता था कि यह हिंदुस्तान टिकेगा नहीं, वह अपने अंतर्विरोधों से टूट जाएगा, इतने सारे धर्म, इतनी सारी भाषाएं, इतनी सारी जातियां, तरह-तरह के नियम क़ायदे, लगता ही नहीं था कि यह एक देश है। एक आवेग ने भले इसे एक कर दिया था, लेकिन यह बना रहेगा, इस पर बहुत सारे लोगों को संदेह था। इस बात का भी संदेह था कि यहां लोकतंत्र टिकेगा नहीं।

लेकिन भारत ने सबको ग़लत साबित किया। उसने लोकतंत्र को नई रंगत दी। इस देश की करोड़ों की निरक्षर आबादी ने अपने शासक चुनने के अधिकार को बिल्कुल हार्दिकता से अंगीकार किया। पश्चिम में दो रंगों के राजनीतिक दलों की प्रतिद्वंद्विता वाले इकहरे लोकतंत्र के मुक़ाबले भारतीय लोकतंत्र कहीं ज़्यादा रंगीन और बहुदलवादी साबित हुआ। इसमें संदेह नहीं कि इस लोकतंत्र पर भारत की सामाजिक संरचनाओं की भी छाप पड़ी और इनकी कई विसंगतियां हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी चली आईं। धर्म और जाति के नाम पर जो सामाजिक ख़ेमेबंदियां थीं उन्होंने बिल्कुल राजनीतिक शक्ल इख़्तियार कर ली और हमारी चुनावी पद्धति को बुरी तरह प्रभावित किया। मगर इसके बावजूद हमने लोकतंत्र का एक बिल्कुल भारतीय भाष्य तैयार किया जिसमें अलोकतांत्रिक तौर-तरीक़ों से सत्ता पर क़ाबिज़ रहना लगभग असंभव है। लोकतंत्र रिसता हुआ लगातार ऊपर से नीचे गया है और समाज के लगभग हर तबक़े में चुनावी राजनीति के समीकरण समझे जाते हैं और उसी ढंग से वोटों की राजनीति होती है।

तो आज़ादी का सबसे बड़ा हासिल तो यही है कि हमारे शासक हमारी मुट्ठी में हैं। लेकिन इस प्रत्यक्ष दिखने वाली सच्चाई की अपनी विडंबनाएं भी हैं। सत्ता लगातार जनता को बदल रही है। उसे अपने अधिकारों के प्रति सजग, समानता के मूल्य के प्रति सतर्क और सवाल पूछने वाले सचेत नागरिक नहीं चाहिए, उसे वैसे लोग चाहिए जिन्हें वह जनता का नाम देकर एक भीड़ में बदल सके और अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सके। यह हमारी आज़ादी की एक बड़ी चुनौती है कि कैसे हम अपनी संविधान प्रदत्त नागरिकता को बचाए रखें और भीड़ का हिस्सा न होकर सत्ता द्वारा इस्तेमाल किए जाने से बचें। दूसरी चुनौती हमारे आधुनिक इतिहास की विडंबना से निकली है जो इस पहली चुनौती से मिलकर कहीं ज़्यादा संकट पैदा कर रही है। अंग्रेज़ों ने भारत तो छोड़ा लेकिन उसके पहले देश को बांट दिया। क़ायदे से भारत नाम का जो राष्ट्र है वह इस द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को नकारता है। जो धर्म के आधार पर अपना अलग देश चाहते थे, वे पाकिस्तान गए, लेकिन जिन्हें यह धार्मिक बंटवारा मंज़ूर नहीं था, उन्होंने हिंदुस्तान को अपना मुल्क माना। मगर इस तथ्य को कुछ इस तरह प्रचारित किया गया और लोकप्रिय बनाया गया कि पाकिस्तान तो मुसलमानों का है और हिंदुस्तान हिंदुओं का। इस देश की 80 फ़ीसदी से ज़्यादा हिंदू आबादी को लगातार इसी आधार पर आक्रामक बनाने की कोशिश हुई। बीते दो दशकों से इस देश में बहुसंख्यकवाद की राजनीति को लगातार बढ़ावा दिया गया। आज जो लोग सत्ता में हैं वे इस बहुसंख्यकवाद की राजनीति के नुमाइंदे हैं। यहां भी मोटे तौर पर यह दलील दी जाती है कि लोकतंत्र में जिसके ज़्यादा वोट होते हैं उसी की हुकूमत चलती है। लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक और ज़्यादा संवेदनशील परिभाषा यह है कि सच्चा लोकतंत्र अपने अल्पसंख्यकों का ख़याल रखकर ही बड़ा होता है। इस कसौटी पर भारतीय लोकतंत्र की राजनीतिक नुमाइंदगी पिछले दिनों अविश्वसनीय साबित हुई है। उसने लगातार अल्पसंख्यकों को निशाने पर रखा है। दिलचस्प यह है कि के अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाली यह राजनीति बहुसंख्यकों के वैध अधिकारों की भी रक्षा करने में विफल है। दरअसल इस बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देने में नकली मुद्दों का ही हाथ रहा है – ऐसे भावनात्मक मुद्दों का जिनका रोटी, रोज़गार और ख़ुशहाली से कोई वास्ता नहीं है। बहुसंख्यकों को बार-बार बताया गया कि अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण हो रहा है, उनके लिए विशेष क़ानून हैं, उनकी मस्जिदों और उनके चर्चों को कोई हाथ नहीं लगा सकता जबकि मंदिर टूट रहे हैं। इस नकली शिकायत को एक पूरा वैचारिक जामा पहनाने के लिए पुनरुत्थानवाद का एक अभियान चलाया गया जिसके तहत बार-बार बताया गया कि प्राचीन भारत कितना श्रेष्ठ था और कैसे बाहर से आने वाले आक्रांताओं ने उसे विकृत कर दिया। उस प्राचीन भारत को फिर से खड़ा करने की ज़रूरत है। राम मंदिर आंदोलन और काशी-मथुरा में नए सिरे से खड़े किए जा रहे विवाद दरअसल इसी वैचारिक पृष्ठभूमि के जघन्य प्रमाण हैं। इन दिनों सरकारें समान नागरिक संहिता का एजेंडा आगे बढ़ा रही हैं, निश्चय ही इसके अपने संवैधानिक पक्ष हैं, लेकिन जिस आक्रामकता से इसे आगे बढ़ाया जा रहा है उससे अल्पसंख्यकों के भीतर यह स्वाभाविक अंदेशा है कि कहीं इसमें उनके रीति-रिवाजों को चोट तो नहीं पहुंचेगी, कहीं इससे भारत की विविधता पर नकारात्मक प्रभाव तो नहीं पड़ेगा।

इस प्रसंग की इतने विस्तार से चर्चा का एक मक़सद और है – इस बात की ओर ध्यान खींचना कि प्राचीन भारत को अपने आदर्श की तरह प्रस्तुत कर रही यह वैचारिकी आधुनिक भारत में बन रही नई विडंबनाओं के प्रति बिल्कुल लापरवाह है, बल्कि वह उन्हें बढ़ाने में अपना योगदान दे रही है। इन दिनों भारत के विकास की दुंदुभि बजाई जा रही है। भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था होने की प्रतीक्षा की जा रही है। हवाई अड्डों, बाज़ारों और तमाम तरह के आलीशान उपक्रमों के ज़रिए एक शक्तिशाली देश की छवि बनाई जा रही है। लेकिन इसका एक बड़ा सच यह भी है कि इन्हीं वर्षों में देश में विषमता कई गुना बढ़ गई है। एक तरफ़ 30-40 करोड़ का इंडिया है जो यूरोप-अमेरिका को टक्कर देने को बेताब है तो दूसरी तरफ़ 80-90 करोड़ का एक भारत है जो दो जून की रोटी के लिए भी संघर्ष कर रहा है। सरकार बार-बार दावा करती है कि कोविड काल से अब तक वह हर महीने 80 करोड़ लोगों को मुफ़्त का अनाज मुहैया कराती रही है। यह ग़रीबों के प्रति उसकी संवेदनशीलता का प्रमाण है। लेकिन इस देश में 80 करोड़ लोग ऐसे क्यों हैं जिनको इस तरह का मुफ़्त अनाज चाहिए? उनकी मुफ़लिसी का ज़िम्मेदार कौन है?

इस सवाल को हमारी आज़ादी के 75 साल का सबसे बड़ा सवाल होना चाहिए। ऐसा लगता है जैसे आज़ादी बस चंद लोगों की है – बाक़ी लोग अलग-अलग आधारों पर इससे दूर हैं। बल्कि भारत की विषमता इतनी प्रत्यक्ष पहले कभी नहीं थी। जिन फ़्लाई ओवरों के ऊपर से इस इस देश के खाते-पीते लोगों की नई चमचमाती गाड़ियां गुज़रती हैं, उन्हीं के नीचे एक बेबस और बदहाल भारत सोया रहता है। दरअसल एक छोटे से भारत ने एक बहुत बड़े भारत को अपना उपनिवेश बना रखा है। इस उपनिवेश से आने वाले लोग अपने शासक भारतीयों के सबसे ज़रूरी काम सबसे सस्ते में निपटाते हैं – वे सुबह-सुबह उन्हें अख़बार दे जाते हैं, उनकी गाड़ियां साफ़ करते हैं, उनका कूड़ा उठाते हैं, उनके कपड़े इस्त्री करते हैं, इनके घरों की महिलाएं उनके यहां घरेलू सहायिकाओं का काम करती हैं। यह लोग सिर्फ़ आर्थिक तौर पर लाचार नहीं हैं, इनकी ग़रीबी पूरे राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर इन्हें वेध्य बनाती है, इनके हिस्से का न्याय छीन लेती है। इन पंक्तियों के लेखक ने पहले भी यह लिखा है कि स्वाधीनता और समानता बिल्कुल जुड़वां आती हैं – स्वाधीनता न हो तो समानता का सवाल नहीं उठता और समानता न हो तो स्वाधीनता बेमानी हो जाती है।

निःसंदेह हमारी आज़ादी की चुनौतियां और भी हैं – जो औपनिवेशिक मानस हमने बना रखा है, उससे मुक्ति पाने की कोशिश कहीं नहीं दिखती, ज्ञान-विज्ञान के स्रोतों पर हमारी पकड़ ढीली पड़ती जा रही है, हम उपभोक्ता होकर ही ख़ुश हैं और इस बात पर प्रमुदित कि दुनिया हमें बहुत शक्तिशाली बाज़ार समझती है। हम अपनी शिक्षा का सत्यानाश करते जा रहे हैं, हमने बेहतर मनुष्य बनाने की प्रविधि समझने की कोशिश ही नहीं की, हम बस लोकलुभावन नारों में उलझे रहे हैं, आपस में लड़ते रहे हैं।

इन सारी चुनौतियों का सामना लेकिन तभी हो सकेगा जब हम समानता और सामाजिक न्याय में अपनी निष्ठा बनाए रखेंगे और अचूक ढंग से इस बात को पहचानेंगे कि विकास का एक समग्र चेहरा होता है और आज़ादी तब सार्थक होती है जब वह सबके लिए हो, सबको आश्वस्त कर सके। क्या हम आज़ादी की इस नई लड़ाई के लिए तैयार हैं?

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