शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए ‘ रेड कल्चर ‘ से ज्यादा नियत की है जरूरत

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इस समय बिहार के सरकारी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार के प्रयास किये जा रहे हैं। सतत विद्यालय निरीक्षण, स्मार्ट क्लास, ऑनलाइन प्रशिक्षण एवं शिक्षकों के रिक्त पदों पर बहाली इत्यादि।
इन प्रयासों के पीछे केवल एक ही उद्देश्य है कि सरकारी विद्यालयों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की जा सके। पर पिछले कई दिनों में सामने आने वाली खबरों को देखने पर अंदाजा होता है की अफसरों ने सरकार के निरीक्षण के आदेशों के पीछे की मंशा को धत्ता बता कर अजय देवगन की फिल्म ‘ रेड ‘ का स्टाइल अपने लिए ज्यादा उपयुक्त समझा है जिसका सीधा असर शिक्षकों के मनोबल पर पड़ रहा है।

सतत विद्यालय निरीक्षण अंतर्गत प्रत्येक बुधवार एवं वृहस्पतिवार को प्रसाशनिक पदाधिकारियों द्वारा विद्यालय का भर्मण किया जाता है। जिला पदाधिकारी से लेकर प्रखंड विकास पदाधिकारी तक विद्यालय के पठन पाठन, विद्यालय प्रबंधन एवं मध्याह्न भोजन का निरीक्षण करते हैं। निरीक्षण के नाम पर सर्वप्रथम माननीय प्रधानाध्यापक के कुर्सी पर विराजमान हो जाते हैं, शिक्षकों की उपस्थिति पंजी देखना की कितने बच्चे उपस्थित हैं कहीं छात्र उपस्थित पंजी में दर्ज हाजिरी से अधिक तो नहीं है, सरकार द्वारा प्रेशर देने के बाद मध्याह्न भोजन चख लेते हैं, यदि किसी क्लास में भूले भटके पहुँच गए तो सामान्य ज्ञान के कुछ प्रश्न पूछ कर विद्यालय के शिक्षा का अंदाज़ा कर लेते हैं। यदि सामान्य ज्ञान के प्रश्न का उत्तर उस समय शिक्षक नहीं दे पाए तो उनकी खैर नहीं उनको भरी कक्षा में ही बच्चों के सामने मानसिक रूप से प्रताड़ित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।
इस सब के पीछे उनकी मानसिकता केवल यह होती है कि किसी तरह मीडिया की नज़र में बने रहें, सुर्खियां और वाह- वाही जितना हो सके बटोर लें नहीं तो कुछ दान-दक्षिणा दे कर ही मामले को पूर्व की भांति कर लिया जाए।
निरीक्षण के इस मॉड्यूल ने शिक्षा व्यवस्था के साथ बहुत भद्दा मजाक किया है। इस कारण समाज में विद्यालय एवं शिक्षक समाज की एक नकारात्मक छवि बन रही है। विद्याल्यों को हीन भावना से देखा जाने लगा है। इस कार्यशैली ने शिक्षकों को भी विद्यालय से दूर किया है। शिक्षक विद्यालय में मौजूद तो होते हैं लेकिन उनकी आत्मा विद्यालय में नहीं होती, दान-दक्षिणा मॉडल ने कुछ शिक्षकों के पेशेवर मूल्यों में भी ह्रास किया है वो इस रास्ते का प्रयोग कर विद्यालय आते ही नहीं है।
पिछले दिनों ही वैशाली के जिला शिक्षा पदाधिकारी द्वारा शिक्षकों के ड्रेस कोड को लेकर एक आदेश निर्गत किया गया कि विद्यालय में कुर्ता पायजामा एवं जीन्स पहन कर जाने से शिक्षकों की नकारात्मक छवि बनती है। शायद साहब को याद नहीं रहा की वो भारत के कस्बे में नौकरी करते हैं जहां सदियों से कुर्ता- पायजामा पहनने की परंपरा रही है और यह इस देश की समृद्ध संस्कृति एवं सभ्यता का एक महत्वपूर्ण अंग है ।
हमारे अफसर आखिर किस दर्शन के अनुसार इस तरह का निर्देश देते हैं वो समझ से परे है। इससे एक प्रकार का दार्शनिक दिवालियापन झलकता है। चौतरफा निंदा के बाद शिक्षा विभाग ने सफाई देते हुए कहा कि शिक्षकों के लिए कोई ड्रेस कोड नहीं है और वैशाली के शिक्षा पदाधिकारी ने उस आदेश को वापस ले लिया।
प्रशासनिक पदाधिकारियों में शिक्षा क्या है? किस प्रकार शिक्षा दी जाए? शिक्षण पद्धति क्या हो? समाज की वो कौन कौन सी एजेंसियाँ हैं जो शिक्षा में मुख्य योगदान देती हैं? छात्र केंद्रित शिक्षा के लिए क्या क्या चुनौतियाँ हैं? समाज को जागरूक कैसे किया जाए? शिक्षा के क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर शोध का अवसर कैसे तलाशा जाए? इन सब मुद्दों पर कभी कोई चिंतन – मंथन भी नहीं होता और न ही उन्हें इसका कोई अनुभव होता है। निरीक्षण के नाम पर केवल कुछ कागज़ी प्रक्रियाओं को पूरा करना और सरकार को रिपोर्ट सौंपना ही हमारे अफसरों को असल काम लगता है।
सरकार को चाहिए वो इस पद्धति में बदलाव कर शिक्षाविदों से विद्यालय का निरीक्षण करवाए। शिक्षा जीवन की आत्मा है इसके बिना सब व्यर्थ है। प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा निरीक्षण और जांच के स्टाइल से विद्यालयों केवल डर का माहौल पैदा होता है। इसके कई सारे वाजिब कारण भी हैं, आमतौर पर अधिकारियों की भाषा जरा भी शालीन नहीं होती है । यही वजह है की अपने स्वाभिमान की रक्षा हेतु कोई भी शिक्षक यह नहीं चाहता कि अधिकारी उनके विद्यालय आएं और इसके लिए वो भरसक प्रयास करते हैं इस चलन ने भी हमारे सिस्टम के सुचारू संचालन के लिए मुश्किलें पैदा की हैं।
इस प्रकार हम शिक्षा में गुणवत्ता का सपना देखना समय की बर्बादी और घोर बेईमानी है।
जब तक एक खुला माहौल, स्वस्थ चर्चा एवं बदलाव की भावना के लिए पूरा तंत्र अपनी खुद की आत्मा को तैयार नहीं करेगा, अपनी जिम्मेदारी तय नहीं करेगा, कर्तव्य के प्रति निष्ठावान नहीं होगा ,तबतक इस तरह के प्रयासों से कोई भी लाभ नहीं होने वाला।

-वसीम अकरम फलाही

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