क्या फ़िलिस्तीन एक ख़ाली ज़मीन थी? जानिए इज़राइल का बड़ा झूठ

सातवीं शताब्दी के मध्य से, फ़िलिस्तीन का इतिहास अरब और मुस्लिम दुनिया के साथ गहराई से जुड़ चुका था (मध्य कालीन युग में एक छोटे अंतराल के अपवाद के साथ, जब इस पर क्रुसेडर्स ने क़ब्ज़ा कर लिया था)। इस देश के उत्तर, पूर्व और दक्षिण के विभिन्न मुस्लिम साम्राज्य तथा राजवंश इस पर नियंत्रण करने की आकांक्षा रखते थे, क्योंकि यह मक्का और मदीना के बाद इस्लाम धर्म का दूसरा सबसे पवित्र स्थल था।

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इज़राइल के दस झूठ – भाग 1

इलान पापे

(छात्र विमर्श अपने पाठकों के लिए प्रसिद्ध इतिहासकार Ilan Pappé की किताब Ten Myths About Israel का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत कर रहा है। पढ़िए इस किताब के पहले अध्याय ‘फ़िलिस्तीन एक ख़ाली ज़मीन थी’ का अनुवाद।)

पहला झूठ: फ़िलिस्तीन एक ख़ाली ज़मीन थी

वह भू-राजनीतिक क्षेत्र जिसे आज ‘इज़राइल’ या ‘फ़िलिस्तीन’ कहा जाता है, रोमन काल से ही एक सर्वमान्य देश रहा है। सुदूर अतीत में इसकी हैसियत और परिस्थिति, उन लोगों के बीच जो मानते हैं कि बाइबिल जैसे स्रोतों का कोई ऐतिहासिक मूल्य नहीं है और वे जो इस पवित्र पुस्तक को एक ऐतिहासिक वृत्तांत भी मानते हैं, बहस का विषय रही है। इस पुस्तक के अगले कुछ अध्यायों में इस देश के पूर्व-रोमन इतिहास की सार्थकता का वर्णन किया जाएगा। हालांकि, ऐसा प्रतीत होता है कि विद्वानों के बीच इस बात पर व्यापक सहमति है कि रोमनों ने ही इस भूमि को ‘फ़िलिस्तीना’ नाम दिया था, और यह ‘फ़िलिस्तीन’ के नाम से इस भूभाग के अन्य सभी समान संदर्भों से पहले की बात है। पहले रोमन और बाद में बाईज़न्टाइन शासन के दौरान, यह एक शाही प्रांत था, और इसकी नियति बहुत हद तक रोम और बाद में क़ुस्तुंतुनिया के भाग्य पर निर्भर थी।

सातवीं शताब्दी के मध्य से, फ़िलिस्तीन का इतिहास अरब और मुस्लिम दुनिया के साथ गहराई से जुड़ चुका था (मध्य कालीन युग में एक छोटे अंतराल के अपवाद के साथ, जब इस पर क्रुसेडर्स ने क़ब्ज़ा कर लिया था)। इस देश के उत्तर, पूर्व और दक्षिण के विभिन्न मुस्लिम साम्राज्य तथा राजवंश इस पर नियंत्रण करने की आकांक्षा रखते थे, क्योंकि यह मक्का और मदीना के बाद इस्लाम धर्म का दूसरा सबसे पवित्र स्थल था। बेशक, इसकी उपजाऊ ज़मीन और रणनीतिक स्थिति के कारण इसके अन्य आकर्षण भी थे। अतीत के इन शासकों में से कुछ की सांस्कृतिक समृद्धि अभी भी इज़राइल और फ़िलिस्तीन के कुछ हिस्सों में देखी जा सकती है। हालांकि, वर्तमान स्थानीय पुरातत्व विभाग रोमन व यहूदी विरासतों को प्राथमिकता देता है और इसलिए मध्यकाल के विकसित और संपन्न इस्लामी राजवंशों जैसे ‘ममलूकों’ और ‘सल्जूक़ों’ की विरासतों की खुदाई अभी तक नहीं हो सकी है।

समकालीन इज़राइल और फ़िलिस्तीन को समझने के लिए ओटोमन काल और भी अधिक प्रासंगिक है, जो 1517 में इस भूमि पर क़ब्ज़े के साथ शुरू हुआ। ओटोमन शासक 400 वर्षों तक यहां शासन करते रहे, अतः उनकी विरासत आज भी कई मामलों में महसूस की जा सकती है। इज़राइल की क़ानून प्रणाली, धार्मिक अदालत के रिकॉर्ड (सिज्जिल), भूमि रजिस्ट्री (टापू), और कुछ वास्तुशिल्प रत्न सभी ओटोमन शासकों की उपस्थिति के महत्व की गवाही देते हैं। जब ओटोमन शासक यहां पहुंचे, तो उन्हें एक ऐसा समाज मिला जो ज़्यादातर सुन्नी मुसलमानों पर आधारित और ग्रामीण था, जिनके साथ एक छोटा शहरी संभ्रांत वर्ग भी था जो अरबी बोलता था। इनके अलावा 5 प्रतिशत से भी कम जनसंख्या यहूदी थी और संभवतः 10 से 15 प्रतिशत लोग ईसाई थे। योनाटन मेंडल (Yonatan Mendel) टिप्पणी करते हैं:

ज़ायोनवाद के उदय से पहले यहूदी आबादी का सटीक प्रतिशत अज्ञात है। हालांकि, यह संभवतः 2 से 5 प्रतिशत तक था। ओटोमन रिकॉर्ड के अनुसार, 1878 में इस भाग में 462,465 की कुल आबादी निवास करती थी जो आज इज़राइल/फ़िलिस्तीन है। इस संख्या में से 403,795 (87 प्रतिशत) मुसलमान थे, 43,659 (10 प्रतिशत) ईसाई और 15,011 (3 प्रतिशत) यहूदी थे।

दुनिया भर के यहूदी उस समय फ़िलिस्तीन को बाइबिल की पवित्र भूमि मानते थे। हालांकि, यहूदी धर्म में तीर्थयात्रा की उतनी भूमिका नहीं है जितनी ईसाई धर्म और इस्लाम में है, लेकिन फिर भी कुछ यहूदी इसे एक कर्तव्य के रूप में देखते थे और थोड़ी बहुत संख्या में तीर्थयात्रियों के रूप में इस देश की यात्रा करते थे। जैसा कि इस पुस्तक के एक अध्याय से पता चलेगा कि ज़ायोनवाद के उद्भव से पहले मुख्य रूप से यह ईसाई थे, जो चर्च संबंधी कारणों से यहूदियों को फ़िलिस्तीन में अधिक स्थायी रूप से बसाने की इच्छा रखते थे।

सोलहवीं शताब्दी के बाद से फ़िलिस्तीन के इतिहास से संबंधित इज़रायली विदेश मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट को देखकर आप यह नहीं जान पाएंगे कि ओटोमन शासन के 400 वर्षों के दौरान यह फ़िलिस्तीन ही था:

1517 में ओटोमन विजय के बाद, इस भूमि को चार ज़िलों में विभाजित किया गया, जिसे प्रशासनिक रूप से दमिश्क प्रांत से जोड़ा गया और इसका नियंत्रण इस्तांबुल से किया जाता था। ओटोमन युग की शुरुआत में, लगभग 1,000 यहूदी परिवार थे जो देश में, मुख्य रूप से यरूशलेम, नब्लुस (शेकेम), हेब्रोन, ग़ज़ा, सफ़ेद (तज़फ़त) और गलीली के गांवों में रहते थे। यह समुदाय यहूदियों के उन वंशजों से बना था जो हमेशा से इसी भूमि पर रहते आए थे और जिनमें कुछ उत्तरी अफ़्रीक़ा और यूरोप से आए प्रवासी भी थे।
महान सुल्तान सुलेमान की मृत्यु (1566) तक व्यवस्थित सरकार ने बहुत से सुधार लाए और यहूदी आप्रवासन को प्रोत्साहित किया। कुछ नए लोग यरूशलेम में बस गए, लेकिन अधिकांश सफेद चले गए, जहां 16वीं शताब्दी के मध्य तक, यहूदी आबादी लगभग 10,000 हो चुकी थी, और पूरा शहर एक संपन्न कपड़ा उद्योग का केंद्र बन चुका था।

इससे ऐसा प्रतीत होता है कि सोलहवीं शताब्दी का फ़िलिस्तीन मुख्य रूप से यहूदी था, और इस क्षेत्र का व्यवसायिक जीवन इन शहरों में यहूदी समुदायों में केंद्रित था। आगे क्या हुआ? विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार:

ओटोमन शासन की गुणवत्ता में धीरे-धीरे गिरावट के साथ, देश को व्यापक उपेक्षा का सामना करना पड़ा। 18वीं शताब्दी के अंत तक, अधिकांश भूमि अनुपस्थित ज़मींदारों के स्वामित्व वाली थी और ग़रीब किरायेदार किसानों को पट्टे पर दी जा चुकी थी, और लगान उतना ही ख़तरनाक और निरंकुश हो चला था। गलीली और कार्मेल पर्वत श्रृंखला के विशाल जंगल पेड़ों से वंचित हो गए थे; कृषि भूमि पर दलदल और रेगिस्तान का अतिक्रमण हो चुका था।

इस कहानी में, 1800 तक फ़िलिस्तीन एक रेगिस्तान बन चुका था, जहां वे किसान जो वहां के नहीं थे, किसी तरह उस सूखी ज़मीन पर खेती करते थे जो उनकी नहीं थी। लेकिन यही भूमि एक द्वीप की तरह भी प्रतीत होती थी, जिसमें एक अच्छी ख़ासी यहूदी आबादी थी, जिसे ओटोमन शासक बाहर से नियंत्रित कर रहे थे। साथ ही यह निरंकुश शाही परियोजनाओं से पीड़ित थी जिसने इसकी मिट्टी की उर्वरता को छीन लिया था। हर गुज़रते साल भूमि अधिक बंजर होती गई, वनों की कटाई बढ़ती गई और कृषि भूमि देखते-देखते रेगिस्तान में बदल गई। एक आधिकारिक राज्य-वेबसाइट के माध्यम से प्रचारित यह मनगढ़ंत तस्वीर अभूतपूर्व है।

यह एक कड़वी विडंबना है कि इस कहानी की रचना में लेखकों ने इज़राइली विद्वता पर भी भरोसा नहीं किया। अधिकांश इज़राइली विद्वान इन बयानों की वैधता को स्वीकार करने या इस तरह की कहानी को प्रायोजित करने में काफ़ी झिझकेंगे। उनमें से कई ने, जैसे कि डेविड ग्रॉसमैन (David Grossman, प्रसिद्ध लेखक नहीं बल्कि जनसांख्यिकीविद्), अम्नोन कोहेन (Amnon Cohen) और येहौशुआ बेन-एरीह (Yehoushua Ben-Arieh) ने वास्तव में इसे सफलतापूर्वक चुनौती भी दी है। उनके शोध से पता चलता है कि फ़िलिस्तीन एक रेगिस्तान होने के बजाय, सदियों से एक संपन्न अरब समाज था जिसमें बड़ी आबादी मुसलमानों की थी। यह मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्र था, लेकिन कुछ जीवंत शहरी केंद्र भी थे।

हालांकि, कथानक के इस मतभेद के बावजूद, इसे आज भी इज़राइली शैक्षिक पाठ्यक्रम के साथ-साथ मीडिया में प्रचारित किया जाता है, जिसका प्रसार (कम योग्य लेकिन शिक्षा प्रणाली पर अधिक प्रभावशाली) विद्वानों द्वारा किया जाता है। इज़राइल के बाहर, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में, यह धारणा कि वचनबद्ध भूमि ज़ायोनवाद के आगमन से पहले एक ख़ाली, उजाड़ और बंजर ज़मीन थी, अभी भी जीवंत व प्रचलित है, और इसलिए इस पर ध्यान देना आवश्यक है। हमें तथ्यों की जांच करने की ज़रूरत है।

हिन्दी अनुवाद: उसामा हमीद

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