शाहिद आज़मी को याद किया जाना क्यों ज़रूरी है?

शाहिद आज़मी का पूरा जीवन यह संदेश देता है कि हमारे देश में न्याय केवल अदालतों के माध्यम से ही संभव है। अन्यायपूर्ण तरीक़े से 7 साल जेल में बिताने के बाद भी वह न्याय व्यवस्था से निराश नहीं हुए और न्यायपालिका से न्याय पाकर अपने और अन्य बेगुनाहों दोनों के लिए न्याय हासिल करके दिखाया। यही वजह है कि शाहिद आज़मी से प्रेरित होकर हज़ारों युवाओं ने वकालत का पेशा अपनाया जो आज उनके काम को आगे बढ़ा रहे हैं।

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शाहिद आज़मी को याद किया जाना क्यों ज़रूरी है?

एडवोकेट अबूबक्र सब्बाक़

न्याय के लिए लड़ते हुए अपनी जान को बलिदान कर देने वाले बहादुर और ईमानदार वकील शाहिद आज़मी की शहादत को 13 वर्ष हो गए हैं। 11 फ़रवरी 2010 को मुंबई शहर में स्थित उनके ऑफ़िस में हमला करके उन्हें शहीद कर दिया गया था।

हर साल की तरह देश के हर बड़े शहर में उनकी क़ुर्बानी और कोशिशों को याद करते हुए श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। सोशल मीडिया पर भी श्रद्धांजलि दी जाती है। एक साधारण परिवार में जन्मे शाहिद आज़मी को आज एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जाना जाता है जिन्होंने न्याय की सर्वोच्चता के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। इसलिए ज़रूरी है कि हम उनके जीवन और उनके कारनामों पर बात करें, ताकि हम शाहिद आज़मी की वकालत कर सकें और उनके मिशन को जान सकें। 

आख़िर क्या कारण थे कि आतंकवाद के फ़र्ज़ी मामलों में फंसाए गए लोगों का बचाव करने पर उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई और फिर उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ा?

शाहिद आज़मी का जन्म वर्ष 1977 में देवनार, मुंबई में हुआ था। 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद जब देश भर में सांप्रदायिक दंगे भड़के तो देवनार समेत मुंबई के अन्य हिस्से इन दंगों की चपेट में आए। शाहिद आज़मी ने इन दंगों को अपनी आंखों से देखा था। सामान्यतः हमारे देश में साम्प्रदायिक दंगों का शिकार मुस्लिम आबादी ही होती है और दंगों के बाद आम गिरफ़्तारियां भी मुस्लिम युवकों की ही होती हैं।

पहली बार 1992-93 में 15 वर्ष की उम्र में शाहिद आज़मी को सांप्रदायिक दंगों में शामिल होने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। लेकिन नाबालिग़ होने के कारण उन्हें रिहा कर दिया गया था। दंगों और उसके परिणाम से दुःखी होकर, वह कश्मीर में एक अलगाववादी सशस्त्र आंदोलन में शामिल हो जाते हैं लेकिन जल्द ही मुंबई लौट आते हैं क्योंकि उन्हें अंदाज़ा हो जाता है कि शांतिपूर्ण संवैधानिक संघर्ष के माध्यम से ही शांति और न्याय को प्राप्त किया जा सकता है।

अंग्रेज़ी अख़बार ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के साथ एक इंटरव्यू के दौरान, शाहिद आज़मी कहते हैं कि “मैंने देखा कि पुलिस मेरे लोगों को मार रही है। मैं उस भयानक और भयावह क़त्ल का आँखों देखा गवाह हूं। जिसके ग़म, तकलीफ़ और ग़ुस्से ने मुझे प्रतिरोध के लिए प्रेरित किया।” यथार्थवाद (हक़ीक़त पसन्दी) के कारण शाहिद आज़मी कश्मीर से लौट आए और पढ़ाई करने लगे।

दिसंबर 1994 में, ख़ुफ़िया एजेंसियों और पुलिस को शाहिद आज़मी की कश्मीर यात्रा के बारे में पता चला। जिसके बाद उन पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने और शिवसेना नेता बाल ठाकरे और अन्य नेताओं की हत्या की साज़िश रचने के फ़र्ज़ी आरोप में टाडा अधिनियम के सख़्त प्रावधानों के तहत गिरफ़्तार कर दिल्ली की तिहाड़ जेल में क़ैद कर दिया गया। कोर्ट ने पहले तो उन्हें दोषी क़रार दिया और पांच वर्ष की सज़ा सुनाई, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सम्मान सहित बरी कर दिया। तिहाड़ जेल में 7 वर्ष बिताने के बाद शाहिद आज़मी जेल से बाहर आए।

हालांकि उन्होंने तिहाड़ जेल में अपनी शिक्षा जारी रखी और जेल से छूटने के बाद क़ानून की डिग्री पूरी करके उन्होंने वकील का पेशा अपनाया। शाहिद आज़मी ने एजेंसियों को काम करते देखा था। जेल में रहते हुए अपराधी एक दूसरे के मामलों, उनके तथ्यों और अदालती प्रक्रियाओं से परिचित हो जाते हैं। शाहिद आज़मी की ख़ास बात यह थी कि उन्होंने इन स्थितियों और समस्याओं के सामने ख़ुद को कमज़ोर नहीं होने दिया। उन्होंने क़ानूनी प्रक्रियाओं को देखा, समझा और फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हमारे देश में ज़ुल्म व नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ अगर कहीं से आशा की जा सकती है तो वह न्याय व्यवस्था ही है।

2003 में, शाहिद आज़मी ने आपराधिक मामलों में बचाव पक्ष के वकील के रूप में क़ानून का अभ्यास शुरू किया, विशेष रूप से आतंकवाद के फ़र्ज़ी आरोपों में क़ैद मुस्लिम युवाओं के मामलों में। उनके द्वारा लड़े गए मामलों में 2002 घाटकोपर ब्लास्ट, 2006 औरंगाबाद आर्म्स रिकवरी केस, 7/11 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट, मालेगांव 2006 ब्लास्ट केस, 26/11 मुंबई ब्लास्ट में फ़हीम अंसारी का बचाव शामिल है। इन मामलों के सफल अभियोजन के दौरान, उन्हें बार-बार जान से मारने की धमकियां मिलीं, और अंततः वे शहीद हो गए। जिस समय शाहिद आज़मी शहीद हुए उस समय उनकी उम्र मात्र 32 वर्ष थी। 7 वर्ष की छोटी सी मुद्दत में 17 मुस्लिम युवकों को उनकी मेहनत और प्रयासों के कारण सम्मान के साथ बरी कर दिया गया।

आतंकवाद के मामलों में अभियुक्तों का बचाव करने वाले वकीलों पर अतीत में जानलेवा हमला होता रहा है। महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एक वकील अकबर पटेल पर 2004 में जानलेवा हमला किया गया था और 9 अप्रैल 2009 को मैंगलोर (कर्नाटक) में एक प्रमुख वकील शहीद हो गए थे। नौशाद कासिमजी की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। दावा किया जाता है कि पुलिस ने कासिमजी को मार डाला। इस दौरान उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और केरल में आतंकवाद के आरोपियों की पैरवी कर रहे कई वकीलों पर घातक हमले जारी रहे।

उत्तर प्रदेश के लखनऊ, फैज़ाबाद, ग़ाज़ियाबाद जैसे कई शहरों में वकीलों और बार एसोसिएशन ने फ़ैसला किया कि कोई भी वकील इस तरह के आरोपों के अभियुक्तों का बचाव नहीं करेगा और किसी भी वकील को उनका बचाव करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यही कारण रहा कि कई अदालतों में वकीलों द्वारा कथित रूप से अपराधी और उनकी पैरवी करने वाले वकीलों पर कइयों बार हमला करने, कपड़े फाड़ने और फाइलें छीनने के मामले सामने आते रहे।

शाहिद आज़मी की मुंबई में उनके कार्यालय में हत्या कर दी गई। हत्या के बाद भरत नेपाली गिरोह के देवेंद्र बाबू जगताप, पिंटो देवराम डागले, विनोद यशवंत विचारे और हसमुख सोलंकी को मुंबई पुलिस ने विशेष अधिनियम ‘मकोका’ के प्रावधानों के तहत गिरफ़्तार किया था। बड़े पैमाने पर विरोध और दबाव के बाद में मुंबई पुलिस ने इन बदमाशों को गिरफ़्तार तो किया लेकिन जांच में ईमानदारी नहीं की। जैसे कि बरामद हथियारों का फ़ॉरेंसिक परीक्षण नहीं किया गया, जो कि एक हत्या के मामले में बहुत महत्वपूर्ण है।

हत्याकांड के चश्मदीद गवाह शाहिद आज़मी के सचिव इंदर सिंह थे। जिन्हें कुछ महीने बाद ही फ़ोन पर धमकियां मिलने लगीं। इसके बावजूद गवाह को भी कोई सुरक्षा नहीं दी जाती है। 20 जनवरी 2011 को अदालत ने शुरू में ‘मकोका’ के प्रावधानों को रद्द कर दिया क्योंकि पुलिस ने ‘मकोका’ के प्रावधानों के तहत मामला स्थापित करने के लिए अपने आरोप पत्र में कोई सबूत पेश नहीं किया था। ‘मकोका’ हटने के बाद 23 जुलाई 2012 को मुंबई हाईकोर्ट ने इस मामले के मुख्य आरोपी विनोद विचारे को ज़मानत पर रिहा कर दिया।

शाहिद आज़मी को पहले आतंकवाद के फ़र्ज़ी आरोपों में फंसाए गए युवकों का बचाव करने से रोकने के लिए जान से मारने की धमकी दी गई और फिर शहीद कर दिया गया, लेकिन उनकी शहादत के बाद आतंकवाद के मामलों का एक महत्वपूर्ण पहलू बहस का विषय बन गया। एक सवाल बहुत आम हो गया कि “ऐसे क्या कारण हैं कि पुलिस चाहती है कि आतंकवाद के कथित आरोपी का वकील भी पुलिस की पसंद का हो?” किसी भी आरोप में आरोपी को यह संवैधानिक हक़ हासिल है कि उसके मामले की देख-रेख उसके पसंद का वकील करे। कौन और क्यों, वकीलों या उनके संगठनों को इन बचाव पक्ष के वकीलों पर हमला करने के लिए मजबूर कर रहा है?

हमारे आज़ाद लोकतांत्रिक देश का संविधान कहता है कि किसी भी आरोपी को तब तक बेगुनाह नहीं माना जाएगा जब तक कि वह दोषी साबित न हो जाए। पिछले वर्ष अहमदाबाद की एक अदालत ने क़रीब 15 वर्ष बाद 28 लोगों को बाइज़्ज़त बरी कर दिया। आख़िर हमारी अदालतों को यह देखने में 15 वर्ष क्यों लगे जबकि इन लोगों के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं थे?

शाहिद आज़मी का पूरा जीवन यह संदेश देता है कि हमारे देश में न्याय केवल अदालतों के माध्यम से ही संभव है। शाहिद आज़मी ने अपनी वकालत के दौरान अनुभव किया कि कैसे पुलिस द्वारा और पुलिस की मदद से मुसलमानों के जीवन और संपत्ति को सांप्रदायिक दंगों में नष्ट कर दिया जाता है। दंगाई लूटपाट करते हैं और पुलिस के साथ मिलकर मुसलमानों के घरों को जलाते हैं। और इन साम्प्रदायिक दंगों के बाद मुसलमानों को ही गिरफ़्तार कर लिया जाता है। शाहिद आज़मी भी सशस्त्र विद्रोह आंदोलन के क़रीब आ गए, लेकिन उन्हें जल्द ही एहसास हो गया कि यह रास्ता सुधार की ओर नहीं ले जा सकता और अन्यायपूर्ण तरीक़े से 7 साल जेल में बिताने के बाद भी वह न्याय व्यवस्था से निराश नहीं हुए और न्यायपालिका से न्याय पाकर अपने और अन्य बेगुनाहों दोनों के लिए न्याय हासिल करके दिखाया। यही वजह है कि शाहिद आज़मी से प्रेरित होकर न केवल हज़ारों युवाओं ने वकालत का पेशा अपनाया, बल्कि हर 11 फरवरी को शाहिद आज़मी के कामों को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।

उर्दू से अनुवाद: अब्दुल मुक़ीत

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  1. शानदार लेख लेकिन लेखक को ध्यान रखना चाहिए कि आज इस तरह के कैसो पर काम बहुत से वकील करना चाहते हैं लेकिन मार्गदर्शको की बहुत कमी है

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