कुश्ती के रिंग से सड़कों तक की लड़ाई

जिस दिन नये संसद भवन का उद्घाटन बड़ी धूमधाम से हो रहा था, देश के लिए ओलंपिक पदक जीतने वाली महिला पहलवानों को बेरहमी के साथ विरोध प्रदर्शन से उठाकर पुलिस की गाड़ियों में जबरन धकेला जा रहा था। इन दृश्यों ने लोकतंत्र के प्रति सत्ताधारी अभिजात वर्ग की सोच को उजागर किया।

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कुश्ती के रिंग से सड़कों तक की लड़ाई

अब्दुल मुक़ीत

देश की कई प्रमुख महिला पहलवान एक महीने से अधिक समय से भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह द्वारा कथित यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग कर रही हैं। एक ऐसा विरोध प्रदर्शन जिसने समाज के विभिन्न क्षेत्रों का ध्यान आकर्षित किया है। इस विरोध प्रदर्शन को कई प्रख्यात हस्तियों और संगठनों का समर्थन मिला है लेकिन इसके प्रति केंद्र सरकार का रवैया बेहद शर्मनाक रहा है।

सत्तारूढ़ पार्टी, भारतीय जनता पार्टी के सांसद बृजभूषण शरण सिंह उत्तर प्रदेश से कई बार निर्वाचित हुए हैं। उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक प्रभावशाली राजनेता और राज्य में भाजपा का एक मज़बूत स्तंभ माना जाता है। वे रेसलिंग फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष भी हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, ओलंपिक में इन पहलवानों को सफलता मिलने पर आमंत्रित किया था और देश का नाम रोशन करने के लिए उनकी सराहना भी की थी, लेकिन आज जब उन्होंने एक गंभीर आरोप के चलते बृजभूषण शरण सिंह का विरोध करना शुरू किया है, तो उन्होंने इन पहलवानों से मुंह मोड़ लिया है।

जिस दिन नये संसद भवन का उद्घाटन बड़ी धूमधाम से हो रहा था, देश के लिए ओलंपिक पदक जीतने वाली महिला पहलवानों को बेरहमी के साथ विरोध प्रदर्शन से उठाकर पुलिस की गाड़ियों में जबरन धकेला जा रहा था। इन दृश्यों ने लोकतंत्र के प्रति सत्ताधारी अभिजात वर्ग की सोच को उजागर किया और हर कोई यह सोचने पर मजबूर हो गया कि यदि देश का नाम रोशन करने वालों के साथ ऐसा व्यवहार किया जा सकता है, तो आम नागरिकों के प्रति सरकार का रवैया क्या होगा? होना तो यह चाहिए था कि जब इन महिला पहलवानों ने आरोपों का ख़ुलासा किया, तो सरकार हरकत में आ जाती, जांच शुरू कर देती और भारतीय कुश्ती महासंघ अध्यक्ष को तुरंत इस्तीफ़ा देने के लिए कहती।

लेकिन यह कोई पहला मामला नहीं है। भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह कई आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं, जो संख्या में 38 हैं। उनके ख़िलाफ़ चोरी, जान से मारने की धमकी, हत्या के प्रयास और अपहरण जैसे गंभीर आरोपों में मामले दर्ज किए गए हैं। कैमरे पर उन्होंने ख़ुद स्वीकार किया है कि उन्होंने एक हत्या की है। उनके समर्थकों का यह भी दावा है कि 1974 से 2007 के बीच दर्ज सभी मामलों में उन्हें बरी कर दिया गया है। कैमरा के सामने आ कर बोलने से यह भी साबित होता है कि उन्हें क़ानूनी पेचीदगियों का फ़ायदा उठाकर बचाने के लिए देश के क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम पर पूरा भरोसा है और शायद यही वजह है कि देश के प्रमुख पहलवान क़ानून लागू करने वालों पर भरोसा नहीं कर पाए हैं, क्योंकि इंसाफ़ में इतनी देरी हो जाती है कि न्याय की संभावना खो जाती है और उत्पीड़कों को उत्पीड़न जारी रखने का अवसर मिलता है। 

दिल्ली में संसद से थोड़ी दूर जंतर-मंतर पर अभिजात वर्ग की गिरफ़्तारी न होने के विरोध में महिला पहलवान एक महीने से अधिक समय से धरने पर बैठी हैं। इनमें साक्षी मलिक, विनेश फोगाट और बजरंग पूनिया जैसे बड़े पहलवान शामिल हैं। बजरंग पुनिया, विनेश फोगाट और साक्षी मलिक द्वारा बीते दिनों ट्विटर पर साझा किए गए एक बयान में कहा गया है कि पुलिस और सरकार उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार कर रही है। उन्होंने लिखा कि उन्होंने पदक वापस नहीं किए, “क्योंकि वे उन्हें लौटाएंगे किसे? राष्ट्रपति, जो ख़ुद एक महिला हैं, बमुश्किल दो किलोमीटर दूर बैठकर देखती रहीं, और उन्होंने कुछ नहीं कहा।” पहलवानों ने अपने बयान में खेद जताया कि प्रधानमंत्री ने उनके प्रति कोई चिंता नहीं दिखाई। बल्कि उन्होंने बृजभूषण सिंह को नए संसद भवन के उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने चमकीले सफ़ेद कपड़ों में तस्वीरें भी खिंचवाईं। “यह चमक हमें चुभ रही है।” पहलवानों ने बयान में कहा कि इसलिए बीते दिन की शाम छह बजे वे हरिद्वार जाएंगे और अपने पदक गंगा में प्रवाहित करेंगे। ये पदक हमारी आत्मा हैं। आज उन्हें गंगा में फेंकने के बाद जीने का कोई कारण नहीं रहेगा। इसलिए हम इसके बाद इंडिया गेट पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल करेंगे। इंडिया गेट वह जगह है जहां हम देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीदों को याद करते हैं। हम उनकी तरह पवित्र नहीं हैं, लेकिन जब हम अंतरराष्ट्रीय मंच पर खेले तो हमारा जज़्बा सैनिकों जैसा था।

पहलवानों ने विरोध में अपने अंतर्राष्ट्रीय मेडल गंगा में फेंकने का ऐलान किया था, लेकिन किसान नेता राकेश टिकैत ने आख़िरी समय में उन्हें समझा-बुझाकर रोक दिया। उन्होंने प्रदर्शनकारी खिलाड़ियों का समर्थन करते हुए कहा, “जंतर-मंतर पर जिस तरह से हमारी बेटियों के साथ बर्ताव हुआ, उसे पूरा देश बर्दाश्त नहीं करेगा। जिस तरह से उन्हें वहां से जबरन ले जाया गया, उससे पूरा देश आक्रोशित है।”

ग़ौरतलब हो कि पुलिस द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करने के बावजूद, बृजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ कोई रिपोर्ट दर्ज न होने पर इन महिला पहलवानों को धरने पर बैठने के लिए मजबूर होना पड़ा था। फिर सुप्रीम कोर्ट के दख़ल के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। खिलाड़ियों की मांग है कि बृजभूषण शरण सिंह को भी उसी तरह गिरफ़्तार किया जाए, जिस तरह यौन उत्पीड़न के मामले में अन्य लोगों को गिरफ़्तार किया जाता है।

विरोध करने वाली महिला पहलवान साक्षी मलिक अपने एक ट्वीट में लिखती हैं कि “मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे कुश्ती के रिंग में लड़ते-लड़ते एक दिन ऐसे न्याय के लिए सड़कों पर भी लड़ना पड़ेगा। देश की बेटियां बहुत मज़बूत होती हैं। जब वह दूसरे देशों में पदक जीत सकती हैं, वह अपने देश में न्याय की लड़ाई जीतने में भी विश्वास रखती हैं।” एक अन्य ट्वीट में साक्षी ने लिखा कि “दिल्ली पुलिस ने बृजभूषण के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न की एफ़आईआर दर्ज करने में 7 दिन का समय लिया और चुपचाप विरोध करने पर हमारे ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने में 7 घंटे भी नहीं लगे। क्या इस देश में तानाशाही शुरू हो गई है? दुनिया देख रही है कि सरकार अपने खिलाड़ियों के साथ कैसा व्यवहार कर रही है।”

एक अहम पहलू यह भी है कि महिला पहलवानों के धरने के बाद सरकार और सरकार प्रायोजित महिला आयोग ने भी आवाज़ नहीं उठाई। दूसरी ओर, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और प्रमुख विपक्षी नेताओं ने न केवल इन लड़कियों का समर्थन किया बल्कि इनमें से कई नेता धरना स्थल यानि जंतर-मंतर गए और धरने के दौरान महिला पहलवानों के साथ कुछ समय बिताया‌ और अपना समर्थन देने का आश्वासन दिया।

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अंतरराष्ट्रीय वेब पोर्टल द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक ख़बर को रीट्वीट करते हुए कहा कि “भाजपा के काल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दमन-शोषण-उत्पीड़न की ख़बरें छपने से पूरी दुनिया में देश की छवि ख़राब हो रही है। भाजपा मूलतः सामंती सोच की पोषक है, वहाँ न नारी का मान है, न आम जन मानस का। भाजपा ने लोकतंत्र को शर्मसार किया है।”

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने ट्वीट कर कहा कि “खिलाड़ियों की छाती पर लगे मेडल हमारे देश की शान होते हैं। उन मेडलों से, खिलाड़ियों की मेहनत से देश का मान बढ़ता है। भाजपा सरकार का अहंकार इतना बढ़ गया है कि सरकार हमारी महिला खिलाड़ियों की आवाज़ों को निर्ममता के साथ बूटों तले रौंद रही है। ये एकदम ग़लत है। पूरा देश सरकार के अहंकार और इस अन्याय को देख रहा है।”

तेलंगाना विधानसभा सदस्य व बीआरएस नेता कालवा कुंतला ने महिला पहलवानों के समर्थन में आते हुए कहा कि “महिला पहलवानों ने पूरी दुनिया में अपनी उपलब्धियों से हमारे देश को गौरवान्वित किया है। मैं केंद्र सरकार से ऐसी पहल की मांग करती हूं, जो राष्ट्रहित के लिए हो, हमारे खिलाड़ियों की गरिमा के लिए हो।” उन्होंने आगे लिखा कि “स्वर्ण पदक से सम्मानित महिला पहलवानों के साथ जारी क्रूरता निंदनीय है। सरकार को पता होना चाहिए कि इस मुद्दे पर पूरी दुनिया की नज़र है और देश की जनता केंद्र सरकार से जवाब चाहती है। इस गंभीर मुद्दे पर केंद्र सरकार की चुप्पी बेहद दुखद है।” बीआरएस नेता ने मांग की कि केंद्र सरकार को अपनी आंखें खोलकर पहलवानों की समस्याओं को सुनना चाहिए और उचित समाधान निकालना चाहिए।

ओलंपिक पदक विजेता महिला पहलवानों के साथ पुलिस के व्यवहार पर कई खिलाड़ियों ने नाराज़गी भी जताई। इनमें भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व गेंदबाज़ अनिल कुंबले भी शामिल हैं। कुंबले ने कहा कि “28 मई को हमारे पहलवानों के साथ पुलिस की बर्बरता देखकर बहुत दुःख हुआ। किसी भी समस्या का समाधान बातचीत से निकाला जा सकता है। हम जल्द से जल्द इस मामले के हल की उम्मीद करते हैं।”

देश की प्रमुख बुद्धिजीवी मृणाल पाण्डेय ने एक लेख में लिखा है कि “इस मामले ने न केवल खिलाड़ियों को बल्कि सभी महिलाओं को अपमानित किया है, लेकिन अब यहां वापसी का कोई सवाल नहीं रहा। यह सिलसिला लंबे समय तक चलने वाला नहीं है। मुझे यकीन है कि ये निपुण महिला पहलवान जल्द ही अपमान की राख से उठेंगी और आगे बढ़ेंगी।”

इसी बीच, अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने एक बयान में कहा कि “शनिवार को एथलीट्स के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, वह बहुत ही दुखद है। समिति को उम्मीद है कि यौन उत्पीड़न मामले की निष्पक्ष जांच की जाएगी।” विश्व कुश्ती महासंघ ने भी इस मुद्दे को लेकर भारतीय कुश्ती महासंघ की सदस्यता निलंबित करने की धमकी दी है।

वरिष्ठ विश्लेषक नीरव भाटिया का कहना है कि सरकार ने इस मुद्दे से निपटने में ग़लती की है। “सरकार को समझना चाहिए कि इन लड़कियों ने ऐसे ही इस तरह के आरोप नहीं लगाए। ये अपने लिए नहीं लड़ रही हैं बल्कि ये अपने शानदार करियर को दांव पर लगाकर दूसरी खेल रही लड़कियों के लिए लड़ रही हैं। सरकार निश्चित रूप से इसमें ग़लत है।” नीरव भाटिया का कहना है कि सरकार को लगा कि यह कोर्ट का केस है और वहीं ख़त्म हो जाएगा या किसान आंदोलन की तरह मर जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नीरव ने आगे कहा कि “यह घटना न केवल भारत के लोगों के बीच बल्कि दुनिया भर में सरकार की छवि को धूमिल कर रही है। किसी अन्य देश में, अगर कोई एथलीट यौन उत्पीड़न का आरोप लगाती है, तो सरकार उसे गंभीरता से लेती है और समय पर कार्रवाई करती है, लेकिन यहां कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।”

बृजभूषण शरण सिंह की जगह कोई और होता तो ऐसे आरोप लगते ही शायद वह स्वेच्छा से अपने पद से इस्तीफ़ा दे देता और एक स्वतंत्र और पारदर्शी जांच का मार्ग आसान कर देता। महिला पहलवानों के दख़ल के बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने 28 अप्रैल को भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था। मगर बीते दिनों रेसलर्स ने पार्लियामेंट की तरफ़ मार्च करने की ठानी तो न सिर्फ़ उन्हें बेदर्दी के साथ गिरफ़्तार किया गया बल्कि उनके विरुद्ध दंगा करने और लोक सेवकों को उनके कर्तव्यों का पालन करने से रोकने के गंभीर आरोपों में 7 घंटे के भीतर मामला दर्ज कर लिया गया।

इससे साफ़ संदेश जाता है कि ओलंपिक जैसी अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश के लिए पदक जीतने वाले खिलाड़ियों की भी सरकार की नज़र में कोई क़ीमत नहीं है। वह सरकार के ख़िलाफ़ किसी से, कुछ नहीं सुनना चाहते। सरकार को परवाह नहीं है कि प्रदर्शनकारी कौन हैं और उन्होंने देश के लिए क्या किया है! बस अगर वे सत्ता पक्ष में किसी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं, तो उन्हें सरकार विरोधी माना जाता है, और उनके साथ भी वैसा ही व्यवहार किया जाएगा, जैसा कि अन्य लोगों के साथ अब तक किया जाता रहा है। शायद भारतीय खेलों के इतिहास में यह पहली बार है कि ओलंपिक पदक विजेता भी ख़राब शासन, अनियमितताओं और कथित यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे हैं।

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