आसिफ़ इक़बाल तन्हा : ये क़दम-क़दम बलाएँ, ये सवाद-ए-कू-ए-जानाँ

यह अजीब तमाशा है कि जामिया के आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस ने जामिया कैंपस में घुसकर लाइब्रेरी के अंदर छात्र-छात्राओं की पिटाई की। इस कार्रवाई का वीडियो मौजूद है। जामिया प्रशासन ने इस मामले में पुलिस के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करवाने के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटा चुका है लेकिन सरकार पुलिस पर कार्रवाई करने के बजाए उल्टा छात्र-छात्राओं को परेशान कर रही है।

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जामिया मिल्लिया इस्लामिया के स्टूडेंट लीडर आसिफ़ इक़बाल को तन्हा करने की ख़ातिर अदालती हिरासत में भेज दिया गया लेकिन उनके साथ तो तन्हाई पहले ही से जुड़ी हुई है। न जाने कब और क्यों आसिफ़ इक़बाल ने अपने नाम के साथ ‘तन्हा’ जोड़ दिया लेकिन जामिया का यह स्टूडेंट तन्हा कभी नहीं था। सीएए के ख़िलाफ़ आंदोलन में सरगर्म किसी रहनुमा का तन्हा होना मुमकिन ही नहीं है।

एक समय में, आसिफ़ इक़बाल को जामिया मिल्लिया इस्लामिया में ही जाना जाता था। स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इंडिया (SIO) में शामिल होने के बाद, उनकी लोकप्रियता का दायरा और बढ़ गया। सीएए विरोधी आंदोलन ने उन्हें देश के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक बना दिया,‌ और अब दिल्ली के ज़ालिम प्रशासन ने इस बेक़ुसूर स्टूडेंट लीडर को कोविड महामारी के दौरान गिरफ़्तार करके इसे सारी दुनिया के समर्थन और हमदर्दी का हक़दार बना दिया।

रमज़ान के इस मुबारक महीने में कौन-सा ऐसा दर्दमंद दिल होगा जो आसिफ़ इक़बाल, सफ़ूरा ज़रगर और मीरान हैदर के लिए परेशान न हो और उनके लिए दुआ न कर रहा हो! लेकिन इन नौजवानों का मामला भिन्न है। जेलों में बंद करके इन्हें ख़ौफ़ज़दा करना मुमकिन नहीं है क्योंकि ये इस शेर की तरह बुलन्द हौसले वाले लोग हैं —

मेरी  आक़िबत  के  दुश्मन  मुझे ‌ चैन  आ  चला  है,

कोई और दाग़-ए-ताज़ा, कोई और ज़ख्म-ए-कारी?

दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच की टीम के मुताबिक़ शाहीन बाग़ के क़रीब अबुल फ़ज़ल इनक्लेव में रहने वाले आसिफ़ इक़बाल को जामिया इलाक़े में 15 दिसम्बर 2019 के दिन सिटिज़नशिप अमेंडमेंट एक्ट के ख़िलाफ़ होने वाले विरोध के दौरान होने वाली हिंसा के इल्ज़ाम में गिरफ़्तार किया गया है। 24 वर्षीय आसिफ़ इक़बाल जामिया में बीए फ़ारसी का छात्र होने के साथ-साथ स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इंडिया का सक्रिय सदस्य भी है।

उन्हें साकेत कोर्ट में मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया जहां से उसे 31 मई तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। यह अजीब तमाशा है कि जामिया के आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस ने जामिया कैंपस में घुसकर लाइब्रेरी के अंदर छात्र-छात्राओं की पिटाई की। इस कार्रवाई का वीडियो मौजूद है। जामिया प्रशासन ने इस मामले में पुलिस के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करवाने के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटा चुका है लेकिन सरकार पुलिस पर कार्रवाई करने के बजाए उल्टा छात्र-छात्राओं को परेशान कर रही है। पुलिस की ओर से की जाने वाली हिंसा की जांच अगर उसी को सौंप दी जाए तो इसका नतीजा और क्या निकलेगा?‌ वे ख़ुद अपने आप को अपराधी तो नहीं बता सकते। बक़ौल मंज़र भोपाली —

आप ही की है अदालत, आप ही मुंसिफ़ भी हैं,

ये तो कहिए आप के ऐब-ओ-हुनर देखेगा कौन?

आसिफ़ इक़बाल को जिस दिन गिरफ़्तार किया गया, उसी दिन जामिया मिल्लिया के अनूठे आंदोलन पर प्रशासन की बर्बरता के पांच महीने पूरे हुए थे। 16 दिसंबर 2019 को दिल्ली पुलिस ने जामिया के अंदर हिंसा करने के झूठे इल्ज़ाम में दस लोगों को गिरफ़्तार कर मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कामरान ख़ान की अदालत में पेश किया था और उन सभी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। दिल्ली पुलिस ने उन लोकल बाशिंदों पर सियासतदानों के इशारे पर आंदोलन में हिंसा करने और सरकारी सम्पत्ति को नुक़सान पहुंचाने का बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाया था, जबकि पुलिस की बर्बरता की वीडियोज़ से सोशल मीडिया भरा हुआ था। गिरफ़्तार किये गये लोगों में से एक समीर के वकील ने कोर्ट में बताया कि उन के मुवक्किल को घर से गिरफ़्तार किया गया और सीसीटीवी कैमरे में इसका सुबूत मौजूद है। पुलिस के पास उन मासूम लोगों के ख़िलाफ़ अपने अफ़सर के बयान के अलावा कोई सुबूत नहीं था। ये दरअसल आसिफ़ इक़बाल जैसे दिलेर प्रर्दशनकारियों को डराने का एक सुनियोजित षड़यंत्र था कि जो उनके साथ हुआ, वो तुम्हारे साथ भी होगा। लेकिन ये कोशिश नाकाम हो गई क्योंकि उनका मामला इस शेर की तरह है —

जो चाहो सज़ा दे लो,   तुम और भी खुल खेलो,

पर हमसे क़सम ले लो, की हो जो शिकायत भी!

29 जनवरी को जामिया मिल्लिया इस्लामिया के एक छात्र मोहम्मद मिनहाजुद्दीन ने दिल्ली पुलिस के ख़िलाफ़ उच्च अदालत का दरवाज़ा खटखटा कर एसआईटी के द्वारा निष्पक्ष जांच की मांग की थी क्योंकि पुलिस बर्बरता के कारण उनकी आंख ज़ख़्मी हो गई थी। क्या दुनिया में कहीं ख़ुद हिंसा करने वाले एसआईटी जांच की मांग करते हैं?

इसके बाद 19 फरवरी को जामिया प्रशासन ने पुलिस की बर्बरता दिखाने वाले सीसीटीवी फ़ुटेज जारी करके एचआरडी मिनिस्ट्री को दिल्ली पुलिस की बर्बरता की वजह से 2.66 करोड़ रुपए के नुक़सान का बिल पेश किया। पुलिस ने अपनी बर्बरता को छुपाने के लिए 25 सीसीटीवी कैमरों को भी नुक़सान पहुंचाया था। पुलिस ने उन वीडियोज़ की सच्चाई जांचने का वादा किया था लेकिन 3 महीने बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई और होती भी कैसे! हिंसा चूंकि हो चुकी है इसलिए अपराधियों को बचाने के लिए बेक़ुसूर छात्र-छात्राओं को निशाना बनाया जा रहा है ताकि उनकी आवाज़ को दबाया जा सके।

हुकूमत को याद रखना चाहिए कि ये किसी क्षणिक ग़म और ग़ुस्से या फ़रेब और लालच की वजह से इस रास्ते पर आने वाले लोग नहीं हैं बल्कि इन्हें इन रास्तों में आने वाली मुश्किलों का पूरा इल्म है और अपने ख़ालिक़ और मालिक पर पूरा भरोसा भी है। इनके दिल की कैफ़ियत आमिर उस्मानी के इस शेर के जैसी है —

ये क़दम-क़दम बलाएं, ये सवादे-कू-ए-जानां

वो यहीं से लौट जाए जिसे ज़िन्दगी हो प्यारी

आसिफ़ इक़बाल का नाम बीती फ़रवरी में राष्ट्रीय मीडिया में आया। उस वक़्त पुलिस बर्बरता और गोदी मीडिया के द्वारा किए गए दुष्प्रचार के बावजूद जामिया मिल्लिया और शाहीन बाग़ की आंदोलन मुल्क के चप्पे-चप्पे में फैल चुकी थी और फ़रवरी में पूरे मुल्क को विरोध प्रदर्शनों ने लपेट में ले लिया था। उस दौरान 14 फरवरी को तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में सीएए विरोधी आंदोलन के ख़िलाफ़ पुलिस ने हिंसक कार्रवाई की जिसमें कई लोग ज़ख़्मी हो गए और 1-2  की मौत की भी ख़बर आई।

15 फ़रवरी को इस बर्बरता के ख़िलाफ़ जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र-छात्राओं और जामिया कोआर्डिनेशन कमेटी के सदस्यों ने दिल्ली में तमिलनाडु हाउस के सामने ज़बरदस्त विरोध प्रदर्शन किया। इस मौक़े पर जिन प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में लिया उनमें आयशा रायना के साथ आसिफ़ इक़बाल तन्हा और मीरान हैदर का नाम भी शामिल था। जामिया से जाने वाली बस की खिड़की से बाहर यह लोग खड़े होकर हाथ हिला रहे थे। वहां पर उनके अलावा 100 से ज़्यादा प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने गिरफ़्तार किया लेकिन इससे भी उन जियालों के हौसले पस्त नहीं हुए, क्योंकि इन जांबाज़ों की ज़ुबान पर इस तरह के अशआर होते हैं —

तेरा एक ही करम है, तेरे हर सितम पा भारी,

ग़म ए दो जहां से बख़्शी मुझे तूने रस्तगारी।

आसिफ़ इक़बाल की गिरफ़्तारी पर जिन लोगों को हैरत है उन्हें दिल्ली की हिरासत के दो दिन बाद लखनऊ में की जाने वाली उनकी तक़रीर को याद करना चाहिए जिसने हुकूमत के ऐवानों में ज़लज़ला बरपा कर दिया था। 17 फ़रवरी को योगी प्रशासन की तमाम रूकावटों के बावजूद लखनऊ के ऐतिहासिक घंटाघर पर जारी महिलाओं के धरने को एक महीना पूरा हुआ था। इस मौक़े पर कई शहरों से आए हुए लोगों के साथ-साथ जिन यूनिवर्सिटियों के छात्र-छात्राओं ने वहां सम्बोधित किया था, उनमें शेर दिल छात्र भी शामिल था। आसिफ़ ने कहा था कि हम गांधी जी, डॉ अंबेडकर, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और हसरत मोहानी के ख़्वाबों को पूरा करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हम तब तक डटे रहेंगे जब तक सीएए, एनआरसी और एनपीआर को वापस नहीं लिया जाता।

हुकूमत चूंकि कोरोना लॉकडाउन के बाद एनपीआर शुरू करने का नापाक इरादा रखती है, इसीलिए अपने एहतियात के तौर पर उन आवाज़ों को दबाने की कोशिश कर रही है जिनसे उसे ख़तरा है। हुकूमत अपने अंदेशों के तहत अपना काम करेगी और आसिफ़ इक़बाल जैसे नौजवान अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करेंगे। बक़ौल ग़ालिब —

वो अपनी ख़ू न छोड़ेंगे हम अपनी वज़्अ क्यों छोड़ें

 सुबुक-सर बन के क्या पूछें कि हम से सरगिराँ क्यों हो

उस धरने में शामिल लोगों को बेदार रहने के लिए आग्रह करने के बाद आसिफ़ इक़बाल ने लखनऊ में कहा था कि मौजूदा वक़्त में हमें सबसे ज़्यादा एनपीआर को लेकर चिंतित होना चाहिए, क्योंकि पहली अप्रैल से इस पर काम करने की तैयारी शुरू हो रही है। उन्होंने बताया था कि एनपीआर ही एनआरसी का पहला क़दम है और जनगणना के साथ ही एनपीआर किया जाएगा। हमें एनपीआर फ़ार्म नहीं भरना है और जिन राज्यों में एनपीआर शुरू होगा, वहां की विधानसभाओं का घेराव किया जाएगा।

कोरोना लॉकडाउन के बाद ज़रूरी एहतियात की वजह से एनपीआर को टाल दिया गया लेकिन सरकार जानती है कि अगर वो अपने इरादों से बाज़ न आई तो उसको ज़बरदस्त विरोध का सामना करना पड़ेगा। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट की हिदायत के बावजूद कि जेलों में भीड़ कम की जाए, केंद्र सरकार के तहत चलने वाला दिल्ली प्रशासन छात्र-छात्राओं को गिरफ़्तार कर रहा है। इसमें मीरान हैदर और सफ़ूरा ज़रगर के बाद ताज़ा नाम आसिफ़ इक़बाल तन्हा का है। इस तरह के हथकंडों से न कोई पहले डरा था और न ही अब डरेगा बल्कि सरकार की इन ओछी हरकतों से यह आंदोलन और ज़्यादा मज़बूत होगा। तारीख़ गवाह है कि जेलों के ख़ौफ़ से हक़ का सैलाब न थमता है और न रुकता है। बक़ौल मजरूह सुल्तानपुरी —

रोक सकता हमें ज़िंदान-ए-बला क्या मजरूह

हम  तो  आवाज़  हैं  दीवार  से  छन  जाते  हैं


डॉ॰ सलीम ख़ान

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