इन सच्चे सितारों की क़द्र करें!

जब देश के सियासी हालात कुछ अच्छे थे तो भाषण देने वाले बहुत थे मगर वे ज़्यादातर आवाज़ उठाने वाले नहीं, अपना सियासी कारोबार चमकाने वाले थे। उन्होंने अपने भाषणों के दाम वसूल किए और शांत हो गए। बाद में जब हालात सख़्त हुए, मोदी, अमित शाह और योगी जैसे तानाशाहों ने शिकंजे कसे तो वे सब अपनी दुकानों समेत ग़ायब हो गए।

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मुहियुद्दीन ग़ाज़ी

(मैंने जामिया के विरोध प्रदर्शनों के दौरान आसिफ़ तन्हा की आवाज़ अपने कानों से सुनी और हैरान रह गया। उस दुबले नौजवान की आवाज़ में बहुत ताक़त है। अल्लाह उसे और उसके सब साथियों को अपनी अमान में रखे। उसकी आवाज़ में उम्मत के रौशन मुस्तक़बिल की नवीद सुनाई देती है।)

लॉकडाउन के दौरान सरकारी ज़ुल्म के विरोध में आगे-आगे रहने वाले मुस्लिम छात्रों और छात्राओं की गिरफ़्तारी की ख़बरें सब को बेचैन कर देने वाली हैं। क्योंकि इन गिरफ़्तारियों से करोड़ों लोगों के सम्मानित रूप से जीने के हक़ और हौसले को कुचलने के बुरे इरादों की गंध आ रही है।

मुसलमानों को संगीन ख़तरों से डालने वाला नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) बना, इस क़ानून की आड़ में सियासी खेल खेलने के लिए देश के संविधान की आत्मा को बुरी तरह कुचलते हुए पामाल किया गया, मुस्लिम छात्रों और छात्राओं ने आगे बढ़कर इस क़ानून के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, उन पर पुलिस ने बेरहमी से लाठियां बरसाईं, आवाज़ नहीं दबी तो मुस्लिम विरोधी दंगे करा कर मुसलमानों को भारी जानी और माली नुक़सान पहुंचाया गया और फिर बड़ी संख्या में मुस्लिम नौजवानों के ख़िलाफ़ ही एफ़आईआर भी दर्ज की गईं और अब पतन की इंतेहा यह है कि लॉकडाउन के मुश्किल हालात में उनकी गिरफ़्तारियां भी शुरू हो गईं।

हिंदुस्तान की जेलों में मुसलमानों का प्रतिशत कई सालों से बहुत ज़्यादा रहा है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने इस पर बहुत पहले चिंता व्यक्त की थी। बाद में भी इस सिलसिले में चिंताजनक रिपोर्टें आती रही हैं कि मुसलमानों की आबादी के प्रतिशत से बहुत कम उनका प्रतिशत शिक्षा और रोज़गार के अवसरों में है, और बहुत ज़्यादा प्रतिशत जेलों में है। लेकिन एक बात नोट जो करने की है वह यह कि अब तक जो मुसलमान जेल में थे वे या तो कोई जुर्म करके जेल गए थे या उन्हें झूठे इल्ज़ाम लगाकर जेल में बंद कर दिया गया था। जबकि अब जो छात्र-छात्राएं गिरफ़्तार होकर जेल जा रहे हैं वे दूसरे क़ैदियों से बिल्कुल अलग हैं। ये वो हैं जिनका क़ुसूर यह है कि उन्होंने अपने देश की सुरक्षा और अपनी क़ौम की हिफ़ाज़त के लिए आवाज़ उठाई थी। ये देश और मिल्लत के हीरो हैं। ये इस दौर के सितारे हैं, फ़िल्मी सितारे नहीं, वास्तविक सितारे। इनकी क़द्र ज़रूरी है। रातों को जाग कर इनके लिए दुआएं करना वाजिब है। इन्होंने जो आवाज़ उठाई है, उसको दबने नहीं देना फ़र्ज़ है।

जब देश के सियासी हालात कुछ अच्छे थे तो भाषण देने वाले बहुत थे मगर वे ज़्यादातर आवाज़ उठाने वाले नहीं, अपना सियासी कारोबार चमकाने वाले थे। उन्होंने अपने भाषणों के दाम वसूल किए और शांत हो गए। बाद में जब हालात सख़्त हुए, मोदी, अमित शाह और योगी जैसे तानाशाहों ने शिकंजे कसे तो वे सब अपनी दुकानों समेत ग़ायब हो गए। अब दुकानें चमकाने का वक़्त ख़त्म हुआ और आवाज़ उठाने का वक़्त आ गया। मिल्लत को इन हालात में ऐसे जियालों की ज़रूरत थी जो किसी लाल-पीले झंडे तले आए बग़ैर, निःस्वार्थ भावनाओं के साथ, जान हथेली पर रख कर आवाज़ उठाएं। ये काम आसान नहीं था मगर बहुत से छात्र-छात्राओं ने आगे बढ़कर बहादुरी के साथ यह काम किया।

आज हिंदुस्तान के असल हीरो वही हैं जो मौजूदा हालात में आवाज़ उठाने की जुर्रत रखते हैं। ऐसे लोग अगर जेलों में ठूंसे जा रहे हैं तो ये ताज्जुब की बात नहीं है क्योंकि मौजूदा तानाशाही हुकूमत की सबसे ज़्यादा दुश्मनी आवाज़ से है। लेकिन ज़रूरी है कि इन गिरफ़्तारियों से मुसलमानों में ख़ौफ़, घबराहट और मायूसी न फैले बल्कि जोश बढ़े, और ज़्यादा क़ुव्वत के साथ आवाज़ उठाने का जोश।

सारी दुनिया ने देखा और दिन के उजाले में राजधानी की सड़कों पर महीनों तक देखा कि इन छात्र-छात्राओं ने हथियार नहीं उठाए और हथियार उठाने की बात भी नहीं की, लेकिन उनपर हथियार उठाए गए और उन्हें डराया और भड़काया गया। लेकिन वो न तो डरे और न ही भड़के, उन्होंने कोई तोड़फोड़ भी नहीं की, बस आवाज़ उठाई और हक़ और इंसाफ़ की आवाज़ उठाई। देश के ख़िलाफ़ नहीं, देश के हक़ में आवाज़ उठाई, फिर आख़िर उन्हें क्यों जेलों में डाला जा रहा है? नैतिक पतन के इस ज़माने में इंसाफ़ के तक़ाज़ों को पैरों तले रौंदते हुए इन मानवता प्रेमियों को गिरफ़्तार किया जा सकता है लेकिन उनकी आवाज़ को नहीं दबाया जा सकता। ये आवाज़ बार-बार उठेगी, लॉकडाउन में भी उठेगी और लॉकडाउन के बाद भी उठती रहेगी, क्योंकि ये इंसाफ़ और बहादुरी की आवाज़ है।

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