कोविड ने हमें पर्यावरण के प्रति कितना संवेदनशील बनाया?

हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण पर बहुत बड़ा संकट मंडरा रहा है और पर्यावरण संकट का अर्थ है हमारे अस्तित्व पर संकट। लॉकडाउन में जो भी चीज़ें ठीक हुई हैं, वे भले ही थोड़े दिन के लिए हैं लेकिन अनजाने में इस लॉकडाउन ने हमें समझा दिया है कि अगर हम एक साथ चाहें तो अभी भी अपने पर्यावरण को बचा सकते हैं।

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कोविड ने हमें पर्यावरण के प्रति कितना संवेदनशील बनाया?

– सुशील कुमार

यह साल मानव सभ्यता के इतिहास में काफ़ी दुखद साल रहा, ख़ास तौर पर भारत के संदर्भ में। वैसे पिछला साल यानि 2020 भी काफ़ी बड़े स्तर पर तबाही भरा साल रहा था। यह देखा गया कि कोरोना महामारी के कारण बड़े-बड़े तथाकथित विकसित देशों के क़ब्रिस्तानों में भी जगह नहीं बची।

हमारे देश भारत में भी भयावह स्थिति रही। यहां लगभग 4 लाख लोगों को अपनी जान इस महामारी में गंवानी पड़ी। लेकिन हम सभी यह महसूस करते हैं कि मृत्यु का आंकड़ा इससे कहीं ज़्यादा है। इन सब दुखदायी घटनाओं के बीच एक अच्छी चीज़ जो हुई वह थी पर्यावरण को होने वाला फ़ायदा।

लॉकडाउन के कारण भारत के कई राज्यों में नदियां अचानक साफ़ हो गईं जिनके प्रदूषण को दूर करने के लिए सालों से सरकार असफल प्रयास कर रही थी। जैसे यमुना का पानी जो हमेशा काला एवं झाग भरा ही रहता था, आज साफ़ बह रहा है। यही कहानी देश की कई नदियों की है। लॉकडाउन के दौरान लोग घरों के अंदर रहे और वाहनों की आवाजाही कम रही, फ़ैक्ट्रियां बंद रहीं, जिससे हवा एकदम शुद्ध हो गई और काफ़ी लोगों ने अपने घरों से सैकड़ों किलोमीटर दूर के पहाड़ों के साफ़-साफ़ दिखाई देने का दावा भी किया। लॉकडाउन के बाद रुक-रुक कर लगातार बारिश हो रही है जिससे हवा में मौजूद एयरोसोल नीचे आ गए। एयरोसोल लिक्विड और  सॉलिड से बने ऐसे सूक्ष्म कण होते हैं जिनके कारण फेफड़े और हृदय को बहुत नुक़सान पहुंचता है। एयरोसोल की वजह से विज़िबिलिटी घटती है। जिन शहरों के एयर क्वालिटी इंडेक्स ख़तरे के निशान से बाहर थे वहां का आसमान भी नीला दिखने लगा।

लेकिन मुद्दा यह है कि हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण को लॉकडाउन के कारण फ़ायदा हुआ है और हम सभी यह भी जानते हैं कि लॉकडाउन एक सीमित समय से ज़्यादा रखा भी नहीं जा सकता और लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद फिर धीरे-धीरे चीज़े अपने पुराने ढर्रे पर चली जाएंगी। वही गाड़ियों की आवाजाही और फ़ैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं, वही ट्रैफ़िक जाम और वही ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन।

जिस तरह मौजूदा समय में जान बचाना लोगों की प्राथमिकता बनी हुई है वैसे ही लोगों को पर्यावरण के प्रति चिंतित कराया जाना ज़रूरी है। उनको यह बताया जाना भी ज़रूरी है कि पर्यावरण रहेगा तभी हम ज़िंदा रह पाएंगे। इसलिए हम लोगों को अपनी आदतों को बदलना होगा‌।

जैसे हम सभी स्वेच्छा से सप्ताह में एक दिन लॉकडाउन रखें और एक दिन किसी मोटर वाहन के बजाय साइकिल से चलें। हम कोशिश करें कि अपनी कार होने के बावजूद जहां तक संभव हो बस या ट्रेन में सफ़र करें।

लॉकडाउन के कारण एक और अच्छी चीज़ हुई है – वर्क फ़्रॉम होम। इसको जहां तक संभव हो बरक़रार रखना चाहिए। इसके अलावा हर छोटे-बड़े दुकानदार को तकनीकी ज्ञान बढ़ाने का भी प्रयास करना चाहिए ताकि वह ऑनलाइन आर्डर ले सके। यह सारी चीज़ें लॉकडाउन के दौरान हम लोगों ने की हैं और हमें यह भी एहसास हुआ है कि हम ग़ैर-ज़रूरी रूप से बाहर भी नहीं निकलेंगे।

हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण पर बहुत बड़ा संकट मंडरा रहा है और पर्यावरण संकट का अर्थ है हमारे अस्तित्व पर संकट। लॉकडाउन में जो भी चीज़ें ठीक हुई हैं, वे भले ही थोड़े दिन के लिए हैं लेकिन अनजाने में इस लॉकडाउन ने हमें समझा दिया है कि अगर हम एक साथ चाहें तो अभी भी अपने पर्यावरण को बचा सकते हैं। हमारे शरीर को शुद्ध हवा चाहिए, शुद्ध पानी चाहिए, हमारा कान एक निश्चित डेसिबल से अधिक नहीं सुन सकता, हमारे शरीर में विभिन्न माध्यमों से नुक़सानदायक केमिकल प्रवेश कर रहे होते हैं जो हमें भीतर से नुक़सान पहुंचाते हैं और जिसके कारण हम बहुत तरह की बीमारियों से ग्रसित होते जा रहे हैं।

हमें समझना होगा कि यह हमारा ही शरीर है, हमारा ही परिवार है, हमारा ही देश है और हमारी ही दुनिया है, इसलिए हमें ख़ुद इसके लिए जागरूक होना पड़ेगा।

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