ये वक़्त ख़ुदा की तरफ़ पलटने का है

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पिछले कुछ दशकों में इंसान ने जो तरक़्क़ी की है, उतनी तरक़्क़ी पिछली कई सदियों में भी नहीं हुई। भौतिक सुख-सुविधाओं से सुसज्जित जीवन, संचार के ऐसे साधन कि इंसान घर बैठे पूरी दुनिया की सैर कर ले, कई दिनों में पूरे होने वाले सफ़र चंद घंटों में पूरे कर ले, वगैरह-वगैरह। इन सुविधाओं ने इंसान की ज़िंदगी को बहुत आसान बना दिया।

इंसान की इस तरक़्क़ी से जहां बहुत-से फ़ायदे हुए, वहीं यह हादसा भी हुआ कि इंसान स्वयं को “सर्वशक्तिमान” समझने लगा। वह यह भूल गया कि उसके ऊपर भी कोई शक्ति है जो इस पूरे ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करती है। वह भौतिकवाद के नशे में स्वार्थी और लालची भी होता चला गया।

वैश्वीकरण ने देशों को तो आपस में जोड़ दिया लेकिन इंसान, इंसान से दूर होता चला गया। मानव संवेदनाएं लकवाग्रस्त होती चली गईं। लेकिन सिर्फ़ भूल जाना ही इंसान की प्रकृति का हिस्सा नहीं है, बल्कि इंसान की विशेषता यह भी है कि वह कुछ हादसों या घटनाओं को देख कर भूले हुए सबक़ भी याद करने लगता है, उसे अपने कमज़ोर होने का एहसास होने लगता है।

बीते साल से पूरी दुनिया के लिए कठिन परीक्षा का जो दौर शुरू हुआ है, वह अभी तक जारी है। यह पूरी मानवजाति की संवेदनशीलता, सहनशीलता और विवेकशीलता की परीक्षा का दौर है। यह मनुष्य की कल्पनाओं से भी परे था कि हवा की गति से दौड़ती ज़िंदगी यूं थम जाएगी और दूसरे ग्रहों पर जीवन तलाश करने वाला इंसान, ख़ुद अपनी पृथ्वी पर इस क़दर बेबस व असहाय हो जाएगा।

कोविड-19 की दस्तक देखते ही देखते एक महामारी का रूप धारण करने लगी और कई देशों ने सम्पूर्ण लॉकडाउन घोषित कर दिया। अब मानव जाति के सामने कोरोना महामारी के साथ-साथ तालाबंदी में जीवन यापन की चुनौती भी थी। भारत में मार्च 2020 के अंतिम सप्ताह में देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई। अचानक हुई इस तालाबंदी ने देश को एक और महामारी की तरफ़ धकेल दिया और हर आने वाला दिन लोगों के लिए समस्याओं में इज़ाफ़ा करता गया। देश-भर से भयानक और मार्मिक तस्वीरें आने लगीं, और इन तस्वीरों ने देश की आंतरिक स्थिति की पोल खोल कर रख दी।

लॉकडाउन के दौरान हमें एहसास हुआ कि हम कितने सामाजिक, व्यवस्थित और जागरूक हैं! शासन व प्रशासन के बड़े-बड़े दावों और विकास की कहानियों में कितनी सच्चाई है! अप्रैल 2021 में जब कोविड की दूसरी लहर आई तो यह किसी क़यामत के आने से कम नहीं था। हमने देखा कि किस तरह पूरा देश इस महामारी के सामने बेबस हो गया। इंसान ने अपने चारों तरफ़ मौत का ऐसा तांडव देखा कि कलेजे मुंह को आ गए। हर दूसरे या तीसरे घर में मातम का माहौल पसरा हुआ था। यह भी हुआ कि लोगों ने लोगों से दूरी बना ली, कई जगह तो अपने घर के लोगों की लाश को भी लेने से लोगों ने मना कर दिया।

हादसे जहां एक तरफ़ तबाही मचाते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ इंसान के विवेक को भी झिंझोड़ते हैं, इंसानी समाज के प्रति उसके उत्तरदायित्व का एहसास उसे कराते हैं, सर्वशक्तिमान ईश्वर की तरफ़ उसके दिल के झुकाव का ज़रिया बनते हैं, वो ईश्वर की इस पुकार को सुनते हैं कि “क्या लोगों के लिए अब भी वक़्त नहीं आया कि वे ईश्वर को याद करें, उसके उतारे हुए सत्य से उनके दिल पिघलें और वे ईश्वर के आगे झुक जाएँ?” इसीलिए ये मंज़र भी हमने देखे कि अपनों के ठुकराए हुए लोगों को दूसरों ने सहारा दिया, मानवता की सेवा करने वालों की संख्या भी इस महामारी के दैरान बहुत तेज़ी से बढ़ी, लोग धर्मों के भेद से ऊपर उठ कर एक दूसरे का सहारा बनते देखे गए, मरीज़ों को अस्पताल पहुंचाने के लिए, दवाओं का इंतज़ाम करने के लिए, लोगों के घरों में ऑक्सीजन सिलेंडर ले जाने के लिए, राशन बांटने के लिए कई सामाजिक संगठन और व्यक्ति आगे बढ़े, नफ़रतों को दम तोड़ते हुए और लोगों को पश्चाताप करते हुए भी देखा गया।

इस महामारी ने जो भयानक स्थिति पैदा की, उसका तक़ाज़ा यही है कि हम अपने पालनहार की पुकार सुनें, हमें अपने सृजनकर्ता की तरफ़ पलटना चाहिए, ताकि हमारे दिल नर्म हों, इस तबाही से लड़ने, इससे जो नुक़सान हुए हैं उन्हें सहने और उनकी भरपाई करने की हिम्मत हमें मिले, समाज के बिखरे ताने-बाने फिर से हम जोड़ सकें, रिश्तों को क़रीब ला सकें, पवित्र क़ुरआन में ये बात कही गई है कि अगर इंसान ख़ुदा को याद रखे तो ख़ुदा भी उसको याद रखता है, वो अपने बंदों की क़द्र करता है, ये वक़्त ख़ुदा को याद करने और उसकी तरफ़ पलटने का है।

मुत्तलिब मिर्ज़ा

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