मणिपुर हमारी मानवीय संवेदना पर सवाल है

क्या आज के इस आधुनिक समाज में, जहां महिला अधिकारों की बात की जाती है, जहां सरकार ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ का नारा देती है, वहां महिलाओं का कोई मोल नहीं कि इस भयप्रद स्थिति में उनका साथ दिया जाए और आरोपियों को गिरफ़्तार कर के सज़ा दी जाए?

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मणिपुर हमारी मानवीय संवेदना पर सवाल है

ख़ान शाहीन जाटू

हमारे समाज में महिलाओं का शोषण आज ही से नहीं प्राचीन काल से चला आ रहा है। औरत के हर दिन का इतिहास ऐसी बर्बरतापूर्ण घटनाओं से भरा पड़ा है। आए दिन महिला उत्पीड़न की दिल दहला देनी वाली घटनाएं सामने आती रहती हैं और न जाने कितनी घटनाएं तो हमारी आंखों से ओझल हैं, क्योंकि वे सामने नहीं आ पातीं।

हाल ही में मणिपुर में हुई शर्मनाक घटना हमारी आंखों ने देखी है। एक वीडियो प्रसारित किया गया जिसमें कुकी समुदाय की दो महिलाओं को एक दूसरे पक्ष के लोगों द्वारा निर्वस्त्र करके सड़क पर घुमाया जा रहा है। वे महिलाएं लगातार मदद की गुहार लगा रही हैं, लेकिन इतने लोगों मे से किसी के सीने में दिल नहीं धड़क रहा था, किसी ने उन निर्दोष महिलाओं की मदद नहीं की, बल्कि हर कोई उनसे छेड़-छाड़ करता नज़र आ रहा था। यह भी बताया जा रहा है कि भीड़ द्वारा उनका गैंगरेप भी किया गया। आश्चर्य की बात है ये तमाम लोग पुलिस और क़ानून की पहुंच से दूर हैं।

इससे भयावह और क्या हो सकता है कि कोई महिला जो अपनी सभ्यता और संस्कृति का पालन करती हो और किसी रोज़ बेवजह उसको नग्न करके पूरी दुनिया के सामने दिखाया जाए! ये किन्हीं एक-दो या पांच-सात पुरुषों का काम नहीं था बल्कि बहुत-से लोग इसमें शामिल थे।

यह घटना 4 मई की बताई जा रही है और इसकी एफ़आईआर 18 मई को दर्ज हुई थी। सवाल प्रशासन से होना चाहिए कि इस भयावह मामले पर दो महीने तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या ऐसा मुमकिन है कि राज्य सरकार को इस मामले का पता न चला हो? अचंभित करने वाली बात तो ये है कि मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ने ये भी कहा कि ऐसी हज़ारों शिकायतें आई हैं। अगर आईं हैं तो उन पर अभी तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई? अगर ये वीडियो प्रसारित न होता क्या इस पर भी कार्रवाई न की जाती?

क्या आज के इस आधुनिक समाज में, जहां महिला अधिकारों की बात की जाती है, जहां सरकार ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ का नारा देती है, वहां महिलाओं का कोई मोल नहीं कि इस भयप्रद स्थिति में उनका साथ दिया जाए और आरोपियों को गिरफ़्तार कर के सज़ा दी जाए? ये है आज नया भारत जहां सभ्य समाज के लोग महिला सुरक्षा की बातें तो करते नज़र आते हैं लेकिन आज इस कुकर्म पर चुप्पी साधे बैठे हैं।

सवाल यह भी है कि क्या इन अपराधियों को मौत या उम्रक़ैद की सज़ा देने से ऐसे घिनौने अपराध के मामले बंद हो जायेंगे? क्या इससे पुरूष समाज का रवैया बदल जाएगा? इस न्याय प्रणाली का उपयोग बार-बार करने से कितनी पीड़ितों को न्याय मिला है? हक़ीक़त यह है कि दरअसल फांसी और उम्रक़ैद की सज़ा के बावजूद क़ानून अपराधियों की मानसिकता में कोई ख़ौफ़ पैदा करने में असमर्थ रहा है। कोई ऐसा क़ानून हो जो दिल में भय पैदा करे और इंसान को ख़ुद-ब-ख़ुद इस घिनौने काम से रोक दे। आज समाज को अपने रवैये और न्यायपालिकाओं और क़ानून निर्माताओं को अपने बनाए हुए क़ानूनों पर पुनर्विचार करने की सख़्त ज़रूरत है।

(लेखिका नेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ जीआईओ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)

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