दक्षिणपंथ का वैश्विक उभार लोकतांत्रिक मूल्यों और समावेशी संरचना के लिए ख़तरा

भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में दक्षिणपंथी पार्टी का वर्चस्व लोकतंत्र के लिए ख़तरा माना जा रहा है, जहां देश की विभिन्नता पर कुठाराघात करते हुऐ समान नागरिक संहिता जैसा क़ानून लाने की चर्चा चल रही है।

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दक्षिणपंथ का वैश्विक उभार लोकतांत्रिक मूल्यों और समावेशी संरचना के लिए ख़तरा

मसीहुज़्ज़मा अंसारी

दुनिया एक बार फिर दक्षिणपंथी विचारधारा का अभ्युदय देख रही है। नैतिक पहलुओं से आज़ाद और मानवीय संवेदना से ख़ाली इस दक्षिणपंथी विचारधारा से दुनिया भर के उन लोकतांत्रिक देशों और उनकी समावेशी संरचना को बड़ा ख़तरा है जो विविधता को जीते हैं और किसी भी धर्म, नस्ल, जाति, भाषा और रंगभेद के बिना सहअस्तित्व की भावना को आत्मसात कर सभी के साथ मिलकर रहना चाहते हैं।

दक्षिणपंथी विचारधारा वाले संगठन, समूह, पार्टी, पक्ष-विपक्ष या किसी देश में सरकार और सत्ता के रूप में अपना वर्चस्व बढ़ा रहे हैं और नस्लीय व जातीय भेदभाव को निरंतर हवा दे रहे हैं। दुनिया भर में दक्षिणपंथी विचारधारा एक ही पैटर्न पर काम कर रही है। फ़्रांस में अल्जीरियाई मूल के मुस्लिम किशोर नाहेल की पुलिस द्वारा गोली मारकर हत्या, भारत में मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों की लिंचिंग, अमेरिका में पुलिस द्वारा अश्वेत टैक्सी ड्राइवर की हत्या, डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में 6 माह पूर्व एक दक्षिणपंथी नेता द्वारा तुर्किये के दूतावास के बाहर क़ुरआन की प्रतियां जलाना, ईद-उल-अज़हा के दिन 28 जून 2023 को स्वीडन में सलवान मोमिका द्वारा राजधानी स्टॉकहोम की एक मस्जिद के सामने क़ुरआन की प्रति जलाने की घटना जिसे वहां की दक्षिणपंथी सरकार ने अनुमति दी थी।

दक्षिणपंथी विचारधारा और सरकार ने दुनिया भर में जातीय और नस्लीय भेदभाव को खुला समर्थन दिया है और दक्षिणपंथी ताक़तों ने खुलेआम अपराधों में संलिप्त अपने लोगों को सराहा है और उनका समर्थन भी किया है। कई मामलों में उनकी अप्रत्यक्ष रूप से वित्तीय मदद भी की गई है।

दक्षिणपंथी विचारधारा को उग्र राष्ट्रवाद की कोरी कल्पना में अपनी निर्लज्जता को छिपाने का हुनर ख़ूब आता है। इसकी निर्लज्जता की गाथा अंतहीन है जो मानव संवेदना, सहअस्तित्व की भावना और मानवीय मूल्यों से ख़ाली है, जिसमें दूसरे विचार, दूसरी नस्ल, दूसरे धर्म, दूसरी भाषा और दूसरे संस्कार के लिए कोई स्थान नहीं है। भारत सहित दुनिया भर के दक्षिणपंथ में यह समानता पाई जाती है।

फ़्रांस में अल्जीरियाई मूल के मुस्लिम किशोर नाहेल की गोली मारकर हत्या करने वाले पुलिसकर्मी के समर्थन में लोगों ने चंदा जमा किया, जो मारे गए व्यक्ति को मिले मुआवज़े से अधिक था। भारत में मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों की लिंचिंग करने वालों के समर्थन में दक्षिणपंथी संगठनों ने रैली निकाली और एक रेप के आरोपी के समर्थन में तिरंगा यात्रा भी निकाली गई। शहीद इंस्पेक्टर सुबोध के हत्यारे का दक्षिणपंथी संगठनों ने माला पहनाकर स्वागत किया।

इसी प्रकार मध्य प्रदेश के सीधी में एक आदिवासी युवक पर पेशाब करने वाले ब्राह्मण व्यक्ति के समर्थन में अखिल भारतीय ब्राहण समाज ने आरोपी के परिवार को 51 हज़ार रुपये की मदद पहुंचाई। स्वीडन और डेनमार्क में क़ुरआन जलाने वालों पर कार्रवाई करने के बजाय दक्षिणपंथी सरकारों ने उन्हें सुरक्षा प्रदान की। देश और दुनिया भर में बढ़ता दक्षिणपंथी रुझान दुनिया के लोकतांत्रिक देशों के लिए एक बड़ा ख़तरा है। दुनिया भर में बढ़ते इस दक्षिणपंथी रुझान को कुछ घटनाओं और उदाहरणों से समझा जा सकता है।

फ़्रांस 

फ़्रांस में 17 साल के मुस्लिम किशोर नाहेल की ट्रैफ़िक जांच के दौरान पुलिस द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई। आरोप था कि नाहेल चेकिंग के लिए नहीं रुका, उसने अपनी मर्सिडीज़ आगे बढ़ा दी जिस पर पुलिसकर्मियों ने पॉइंट-ब्लैंक पर उसे गोली मार दी और नाहेल की मौत हो गई। वह अपनी मां का इकलौता बेटा था और टेकअवे डिलीवरी करता था। अल्जीरियाई मूल के नाहेल का कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं था। इस घटना के बाद फ़्रांस में भारी संख्या में विरोध प्रदर्शन हुए। अल्जीरियाई मूल के किशोर की मौत पर विरोध प्रदर्शनों ने आधुनिक फ़्रांस में गंभीर नस्लीय तनाव को फिर से उजागर कर दिया है। वहां लंबे समय से अल्पसंख्यकों को अलग-थलग करने का आरोप लगाया जाता रहा है।

अल-जज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिक़ किशोर की हत्या करने वाले पुलिसकर्मी के लिए फ़ंड जुटाया जा रहा है। फ़्रांस की धुर-दक्षिणपंथी नेत्री Marine Le Pen के पूर्व सलाहकार Jean Messiha इसके लिए अभियान चला रहे हैं। Jean द्वारा स्थापित, GoFundMe पर चंदा इकठ्ठा किया जा रहा। एक हफ़्ते पहले तक नाहेल पर गोली चलाने वाले पुलिसकर्मी के लिए 963,000 यूरो (लगभग 80 लाख रुपए) जमा हो चुके थे। मारे गए किशोर नाहेल की दादी, नादिया से हाल ही में क्राउड फ़ंडिंग अभियान के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि एक हत्यारे के लिए फ़ंड रेज़िंग जैसी बातें सुनकर वह बेहद दुःखी हैं।

इसके अलावा, फ़्रांस के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना ​​है कि हालिया चुनावों के दौरान फ़्रांस में दक्षिणपंथ का शानदार प्रदर्शन आने वाले वर्षों में वहां के लिए बड़े सिरदर्द का कारण बनेगा।

Emmanuel Macron को पिछले चुनाव में जहां 58.55% वोट मिले, वहीं दक्षिणपंथी नेता Marine Le Pen ने भी 41.45% वोट अपने पाले में किए थे। Marine Le Pen का प्रदर्शन ख़ास इसलिए भी था क्योंकि Emmanuel Macron की इस जीत का अंतर 2017 की तुलना में बहुत कम था, तब Emmanuel Macron ने 66.1% वोट अपने नाम किये थे जबकि Marine Le Pen को 33.9% हिस्सा मिला था।

फ़्रांस में तेज़ी से बढ़ती हुई मुस्लिम विरोधी भावना को साफ़ तौर पर देखा जा सकता है, जहां इस्लाम और मुसलमानों को लेकर आए दिन दक्षिणपंथी नेताओं द्वारा भ्रामक बयान दिए जाते हैं।

डेनमार्क

डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में 6 माह पूर्व एक दक्षिणपंथी नेता ने तुर्किये के दूतावास के बाहर और एक मस्जिद के पास क़ुरआन की प्रतियां जलाईं। आरोपी व्यक्ति का नाम Rasmus Paludan है और वह इस्लाम विरोधी बयानों के लिए जाना जाता है। इससे पहले वह 21 जनवरी को स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में भी तुर्किये के दूतावास के सामने पवित्र पुस्तक जला चुका है।

भारत

हाल ही में मध्य प्रदेश के सीधी ज़िले का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफ़ी वायरल हुआ था। इसमें बीजेपी कार्यकर्ता एक आदिवासी समाज के व्यक्ति पर पेशाब करता दिख रहा है। वीडियो वायरल होने के बाद मध्य प्रदेश के मुख्य्मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस घटना पर दुःख व्यक्त किया।

उन्होंने ट्वीट कर पुलिस को आरोपी प्रवेश शुक्ला के ख़िलाफ़ NSA के तहत कार्रवाई करने का आदेश दिया। जिसके बाद सीधी प्रशासन ने प्रवेश शुक्ला को गिरफ़्तार कर लिया। सीएम शिवराज सिंह चौहान ने पीड़ित आदिवासी से मुलाक़ात कर उसके पैर धोकर सम्मानित किया। इस मामले में प्रशासन ने आरोपी प्रवेश शुक्ला के घर के कुछ हिस्से को बुल्डोज़र से गिरा दिया।

अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज के नेताओं ने आरोपी प्रवेश शुक्ला के घर जाकर आश्वासन दिया कि उनका घर फिर से बनाया जाएगा। अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज मध्य प्रदेश इकाई के अध्यक्ष पंडित पुष्पेंद्र मिश्रा ने कहा कि उन्होंने आरोपी प्रवेश शुक्ला ने घर गिराए जाने का विरोध किया है, साथ ही अखिल भारतीय ब्राहण समाज के सीधी के ज़िलाध्यक्ष राकेश दुबे ने आरोपी शुक्ला के परिवार को 51 हज़ार रुपये की मदद भी पहुंचाई।

इटली

इटली में दक्षिणपंथी नेता Giorgia Meloni इटली की पहली महिला प्रधानमंत्री हैं जिन्हें मुसोलिनी का समर्थक माना जाता है। इटली में दक्षिणपंथी ब्रदर्स ऑफ़ इटली पार्टी की नई सरकार सत्ता में है। चार साल पहले चुनाव में मात्र 4.13% वोट पाने वाली Giorgia Meloni की पार्टी को इस बार 26% वोट मिले।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इटली में ये पहली बार है जब कोई दक्षिणपंथी नेता प्रधानमंत्री के पद पर है। Giorgia Meloni की पार्टी इटली के तानाशाह रहे मुसोलिनी की समर्थक है। अप्रवासियों को शरण नहीं देना Giorgia के चुनावी एजेंडे का हिस्सा था। वह यूरोपीय संघ पर इटली की एथनिसिटी (नस्ल) बदलने का भी आरोप लगा चुकी हैं।

Giorgia ने डोनाल्ड ट्रम्प की कंज़र्वेटिव पार्टी की तर्ज़ पर कहा था कि माइग्रेंट्स, ख़ासकर मुस्लिम माइग्रेंट्स ख़तरा साबित होते हैं। Giorgia की पार्टी का स्टैंड और उनके चुनावी वादे अति दक्षिणपंथी हैं। उन्होंने इटली में बाहर से आने वाले प्रवासियों-शरणार्थियों को रोकने की क़सम खाई है।

स्वीडन

स्वीडन में 59 वर्षीय नेता Ulf Kristersson प्रधानमंत्री हैं। वह चार दलों के दक्षिणपंथी गुट के नेता हैं। हंगरी, पोलैंड और इटली के बाद स्वीडन ऐसा चौथा यूरोपीय देश है जहां दक्षिणपंथी पार्टी की सरकार बनी है।

स्वीडन में दक्षिणपंथी सरकार बनने से देश में राजनीति गर्म है। यह एक मुस्लिम विरोधी पार्टी मानी जाती है और उनका लक्ष्य ग़ैर-यूरोपीय देशों से अप्रवासन को रोकना है। बीते चुनाव में यह मुद्दा पार्टी की राजनीति का एक केंद्रीय मुद्दा था। स्वीडन में क़ुरआन जलाने का मामला सामने आया था जिसका दुनिया भर में विरोध हुआ था।

हंगरी

हंगरी के प्रधानमंत्री के रूप में Viktor Orbán ने देश के आम चुनावों में लगातार चौथी बार जीत हासिल की है। वह दक्षिणपंथी विचारधारा के नेता हैं और उनकी दक्षिणपंथी फ़ाइड्ज़ पार्टी ने चुनाव में कुल 53.1% वोट हासिल किया।

वह अपने दक्षिणपंथी बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। प्रवासियों के मुद्दे पर उन्होंने सरकारी टेलीविज़न से कहा था, “हमें आर्थिक आप्रवासन को ऐसे नहीं देखना चाहिए जैसे कि इसका कोई उपयोग है, क्योंकि यह केवल यूरोपीय लोगों के लिए परेशानी और ख़तरा लाता है। इसलिए, प्रवासियों को रोका जाना चाहिए।” उन्होंने कहा था, “हम अपने बीच अल्पसंख्यक नहीं देखना चाहते जिसकी सांस्कृतिक विशेषताएं और पृष्ठभूमि अलग-अलग हों। हम हंगरी को हंगरी ही बनाये रखना चाहेंगे।”

जर्मनी

पूर्वी जर्मनी में धुर दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फ़ॉर डॉयचलैंड (एएफ़डी) की दो स्थानीय चुनावों में जीत के बाद नेताओं और मीडिया के बीच इस बात की चर्चा हो रही है कि आख़िर धुर-दक्षिणपंथी विचारधारा आम जनमानस में कैसे जगह बना रही है! रिपोर्ट के अनुसार, जर्मनी की सारी पार्टियां मिल कर भी एएफ़डी को नहीं रोक सकीं।

DW न्यूज़ के अनुसार, टुटजिंग एकेडमी फ़ॉर पॉलिटिकल एजुकेशन की निदेशक Ursula Münch का कहना है सरकार की राजनीति लोगों को बेचैन कर रही है। लाइपजिश विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, बहुत से जर्मन वोटर, ख़ासकर जर्मनी के पूर्वी हिस्से में लोग, नस्लवादी विचारधारा रखते हैं। 29 जून को छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि एएफ़डी का समर्थन जर्मनी के मध्यम-वर्गीय परिवारों में बढ़ता जा रहा है। जीनुस इंस्टीट्यूट फ़ॉर सोशल रिसर्च के इस शोध में ये पाया गया है कि एएफ़डी के मध्यम-वर्गीय वोटरों की संख्या दो साल के भीतर 43 फ़ीसदी से 56 फ़ीसदी हो गई है और ये बढ़ती जा रही है।

क्या कहते हैं बुद्धजीवी?

दुनिया भर में बढ़ते दक्षिणपंथी रुझान पर बुद्धजीवियों ने चिंता जताई है और इसे लोकतांत्रिक संरचना के लिए ख़तरा बताया है। Université Libre de Bruxelles के एसोसिएट प्रोफ़ेसर Pietro Castelli Gattinara ने वॉक्स से बात करते हुए कहा कि दक्षिणपंथ का उदय लोकतंत्र के भीतर एक वैश्विक घटना है, न कि केवल यूरोप में ऐसा हो रहा है। उन्होंने कहा कि “यूरोप में निश्चित रूप से दिख रहा है, लेकिन यह उससे अलग नहीं है जो हम अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी, भारत में पीएम मोदी और ब्राज़ील में बोल्सोनारो के रूप में देखने को मिल रहा है। यह बस कुछ उदाहरण हैं।”

भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में दक्षिणपंथी पार्टी का वर्चस्व लोकतंत्र के लिए ख़तरा माना जा रहा है, जहां देश की विभिन्नता पर कुठाराघात करते हुऐ समान नागरिक संहिता जैसा क़ानून लाने की चर्चा चल रही है। देश के अल्पसंख्यकों को लेकर पार्टी के नज़रिए का देश और दुनिया भर में विरोध हो रहा है। भारत में ख़ासकर दलितों, मुसलमानों और आदिवासियों पर दक्षिणपंथी पार्टी के सत्ता में आने के बाद अत्याचार और हमले बढ़े हैं। राष्ट्रवाद की आड़ में दक्षिणपंथी विचाराधारा भारत की एकता, अखंडता और यहां के समावेशी समाज और संरचना को नुक़सान पहुंचा रही है। दुनिया भर में जिस प्रकार दक्षिणपंथी विचाराधारा वहां के समाज के लिए ख़तरा बनी हुई है, उसी प्रकार भारत के लिए भी यह चिंताजनक स्थिति है।

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