मौलाना मौदूदी के अनुसार इस्लाम राष्ट्रवाद के बारे में क्या कहता है ?

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25 सितंबर 1903 को औरंगाबाद में जन्मे मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी बीसवीं सदी ईस्वी में इस्लाम के सबसे बड़े अलंबरदारों में से एक थे। उन्होंने अपनी पुस्तकों, लेखों और भाषणों में दुनिया भर के तमाम विचारों व विचारधाराओं का भरपूर विश्लेषण किया है।

राष्ट्रवाद के विषय पर उन्होंने अपनी पुस्तक ‘मसअला-ए-क़ौमिय्यत’ और ‘मुसलमान और मौजूदा सियासी कशमकश’ में विस्तृत विश्लेषण किया है। इसीलिए यह बेहतर होगा कि राष्ट्रवाद से संबंधित जो बहस मौलाना मौदूदी ने की है, उसका संक्षिप्त रूप पाठकों के सामने आ जाए।

  • इख़्तिलाफ़ात (मतभेदों) के बावजूद एकता का आधार ढूंढना और समान लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए मिल-जुलकर, संगठित संघर्ष करना मानव की प्रकृति में समाहित है। अतः राष्ट्रवाद मानवीय दुनिया के लिए अपने आप में कोई नई चीज़ नहीं है। इतिहास में कभी मिस्र, रूम, यूनान व ईरान बिल्कुल उसी प्रकार के राष्ट्रवादी थे जैसे आज ब्रिटेन, फ़्रांस, जापान, जर्मनी या इटली हैं।
  • राष्ट्रवाद का आरंभ बिना किसी को हानि पहुंचाए, लाभप्रद लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए होता है। लेकिन अधिक समय नहीं गुज़रता है कि जब क़ौम की भलाई व विकास की यह भावना संकीर्ण जाहिलियत में परिवर्तित हो जाती है।
  • पहचान की समानता (Commonality of Identity) राष्ट्रवाद का आधार है। नस्ल, जन्म-स्थान, भाषा, रंग, आर्थिक लाभ, एक सरकार के तहत रहना, इनमें से प्रत्येक ‘पहचान वाले तत्व’ का मौलाना मौदूदी ने विस्तृत विश्लेषण किया है।
  • वे आपत्तियां जो राष्ट्रवाद के हर रूप पर उठाई जाती हैं, वे यह हैं – राष्ट्रवाद इंसानों के बीच बड़ी दीवारें खड़ी कर देता है। कोई भी आदमी अपनी नस्ल, मातृभाषा, जन्म-स्थान और रंग को तो नहीं बदल सकता। इस प्रकार विभिन्न राष्ट्रीयताओं के बीच नफ़रत व दुश्मनी बिल्कुल प्राकृतिक है और आपसी बचाव एक आपदात्मक दशा। फिर यह कि राष्ट्रवाद एक zero sum game है जहां एक की विजय, दूसरे की पराजय है। ऐसे में ख़ुद को बर्बादी से बचाने के लिए दूसरों को बर्बाद करना आवश्यक हो जाता है। इस संकीर्ण भावना की वजह से किसी व्यक्ति का दूसरी क़ौम से संबद्ध होना इस बात के लिए काफ़ी है कि मुझे उससे नफ़रत हो और मैं उसे बर्बाद करने में ही अपना हित समझने लगूं। इसके पश्चात मौलाना मौदूदी ने राष्ट्रवाद की प्रत्येक बुनियाद पर अलग-अलग विस्तृत चर्चा की है।
  • नस्लवाद समान ख़ून के आधार पर क़ायम होता है। एक नस्ल की शुरुआत एक मां-बाप से होती है। फिर ख़ानदान और क़बीला बनता है, अंत में नस्ल। नस्ल कभी भी शत-प्रतिशत शुद्ध नहीं होती बल्कि उसमें विभिन्न साधनों से दूसरे ख़ून सम्मिलित होते रहते है। इन अशुद्धताओं के बावजूद अगर ‘साझे ख़ून’ के आधार पर एकत्रित हुआ जा सकता है तो क्यों न उस साझा ख़ून के आधार पर जमा हुआ जाए जो ‘आदम’ और ‘हव्वा’ के माध्यम से सभी इंसानों में पाया जाता है। जैसे-जैसे हम इस वंशावली में ऊपर जाते जाएंगे, तमाम नस्लें आपस में मिलती चली जाएंगी और अंत में केवल एक मां-बाप बचते हैं। ऐसे में नस्ली ऊंच-नीच की गुंजाईश तो तार्किक तौर पर भी शेष नहीं रह जाती।
  • जन्म-स्थान की समानता एक निरर्थक और अनावश्यक बात है, क्योंकि इंसान जिस स्थान पर पैदा होता है वह तो एक-दो फ़ीट से अधिक नहीं होती मगर उस एक फ़ीट को बढ़ा-चढ़ाकर सम्पूर्ण देश पर आरोपित करना और कहना कि उसके अन्दर रहने वाले मेरे अपने और इस लकीर के बाहर के निवासी पराये हैं तो यह सीमित और अत्यंत संकीर्ण दृष्टिकोण है। यदि एक वर्ग मीटर जगह जन्मभूमि होने से पूरा देश एक व्यक्ति का राष्ट्र हो सकता है तो पूरा संसार क्यों नहीं?
  • भाषाई समानता का एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि लोग एक-दूसरे को समझ सकते हैं लेकिन भाषाई समानता और विचारों की समानता में अंतर है। भाषा विचारों की अभिव्यक्ति का एक माध्यम मात्र है। एक विचार या विचारधारा की अभिव्यक्ति दस भाषाओं में की जा सकती है, वहीं एक भाषा में अनेकों विचारों को प्रकट करना संभव है। लोगों की सोच व विचारधाराओं को छोड़कर उनके अभिव्यक्ति के माध्यम की बुनियाद पर उनमें ऊंच-नीच करना हास्यास्पद है।
  • राष्ट्रवाद के जितने घटक तत्व हैं उनमें सबसे अधिक बाहरी त्वचा के रंग की बुनियाद पर मानव जाति का वर्गीकरण है। रंग एक भौतिक विशेषण है। इंसान अपने शरीर के कारण इंसान नहीं है बल्कि अपनी आत्मा के कारण है। गाय अपने काले या गोरे होने के कारण बेहतर नहीं होती बल्कि अपने दूध की गुणवत्ता के आधार पर होती है। इंसानों को भी उनके रंगों के बजाए उनके विचारों के आधार पर तौला जाना चाहिए।
  • आर्थिक हितों के आधार पर जो राष्ट्रीयताएं अस्तित्व में आती हैं, वे क़ौम के लोगों में ख़तरनाक हद तक स्वार्थ और भौतिकवाद पैदा करती हैं। ऐसा अर्थशास्त्र वास्तव में स्वतंत्र नहीं होता जिसमें इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता हो कि इस में ‘दूसरों’ को आर्थिक अवसर कम-से-कम प्राप्त होने चाहिए। जब ऐसी कई शक्तिशाली क़ौमें दुर्बल क़ौमों पर टूट पड़ती हैं तो कमज़ोर क़ौमें तो बर्बाद होती ही हैं, साथ-ही-साथ अंत में ताक़तें भी एक-दूसरे से टकराकर बर्बाद हो जाती हैं।
  • एक क्षेत्र या देश में रहने की बुनियाद पर जो राष्ट्रीयता अस्तित्व में आती है, इतिहास बताता है कि वह ज़्यादा समय तक नहीं टिकती है। ऐसी राष्ट्रीयताएं उसी समय तक मज़बूत रहती हैं जब तक उन क्षेत्रों में केंद्रीय सरकार की पकड़ मज़बूत रहे, जैसे ही केंद्रीय सरकार की गिरफ़्त ढीली हुई, विभिन्न प्रकार की छोटी-छोटी राष्ट्रीयताएं सर उठाना शुरू कर देती हैं।

मौलाना मौदूदी के अनुसार राष्ट्रों के बनने के यह सारे आधार खोखले एवं एकतरफ़ा हैं। वह लिखते हैं,

“क्या इंसान के लिए इससे अधिक अतार्किक मानसिकता और कोई हो सकती है कि वह बुरे, ख़राब और शक्तिहीन आदमी को एक योग्य, सच्चे और शरीफ़ आदमी पर मात्र इसीलिए प्राथमिकता दे कि पहला आदमी एक नस्ल में जन्मा है, और दूसरा किसी अन्य में? पहला सफ़ेद है और दूसरा काला? पहला पश्चिम में पैदा हुआ तो दूसरा पूरब में? पहला एक भाषा बोलता है तो दूसरा कोई और? पहला एक देश की जनता है और दूसरा किसी और देश की जनता? क्या त्वचा के रंग को आत्मा की पवित्रता व गंदगी में भी कोई हस्तक्षेप है? क्या बुद्धि इसको मानती है कि नैतिकता व मानवीय मूल्यों के सुधार व बिगाड़ से पहाड़ों व नदियों का भी कोई संबंध है? क्या कोई सूझ-बूझ रखने वाला व्यक्ति यह मान सकता है कि पूरब में जो चीज़ सत्य है वो पश्चिम में झूठी हो जाए? क्या कोई साफ़ दिल इस चीज़ की कल्पना कर सकता है कि नेकी, शराफ़त व जौहर-ए-इन्सानियत को रंगों के ख़ून, बोली, जन्म-स्थान की मिट्टी के स्तर से जांचा जाए? वास्तव में बुद्धि इन प्रश्नों का उत्तर ना में देगी।

मगर राष्ट्रवाद और उसके घटक, बड़ी निर्भीकता के साथ कहते है कि हां ऐसा ही है। राष्ट्रीयता के इन सभी घटक तत्वों की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह घटनाओं के आधार पर इंसानों के वर्गीकरण के प्रेरक हैं। यह आधार किसी इंसान को उसी समय तक संतुष्ट कर सकते हैं जब तक वह सरासर अंधेरे में हो, जैसे ही वे चिंतन-मंथन करेंगे, इन तमाम आधारों की आधारहीनता व ढकोसलेबाजी उन्हें मालूम हो जाएगी। इस्लाम की विशिष्टता यह है कि यहां राष्ट्रीयता के वास्तविक आधार ‘आकस्मिक’ नहीं हैं। विभिन्न नस्लों में विभिन्न जगहों पर पैदा होकर, अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोग अगर इस्लामी फ़िक्र के मानने वाले हों तो वे सब एक राष्ट्र हैं, और एक व्यक्ति मुस्लिम घराने में जन्म ले लेकिन ख़ुदा व उसके रसूल पर दिल से ईमान न लाए, उसका इस्लामी राष्ट्र से कोई सम्बन्ध नहीं। इंसानों को जाति एवं वर्गों में बांटने का उद्देश्य उन्हें श्रेष्ठता का दर्जा देना नहीं था बल्कि मात्र परिचय कराना था। इस्लाम में श्रेष्ठता का मानक ‘घटनाएं’ नहीं बल्कि ईशप्रेम व ईशभय का संगम (तक़वा) है।”

– ख़ान यासिर

(लेखक इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इस्लामिक स्टडीज़, नई दिल्ली के डायरेक्टर हैं।)

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