एस.आई.ओ. सहित जामिया व JNU के छात्रों ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों के ऊपर से राजद्रोह का मुकदमा हटाने की मांग की

एएमयू छात्रसंघ को प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए दिल्ली जाते हुए पुलिस ने रोका, छात्र दलों ने एएमयू के साथ एकजुटता व्यक्त की,‌ छात्रों के ऊपर से राजद्रोह का मुकदमा हटाने की मांग

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नई दिल्ली| एएमयू छात्रसंघ पदाधिकारियों को आज प्रेस क्लब ऑफ इंडिया नई दिल्ली में आयोजित एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने से रोक दिया गया। यह संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्रसंघ, स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ इंडिया और दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों ने बुलायी थी।

छात्र दलों ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के साथ एकजुटता व्यक्त की और एएमयू के 14 छात्रों के खिलाफ राजद्रोह के मामलों को रद्द करने का आह्वान किया। हालांकि, एएमयू छात्रसंघ के पदाधिकारियों को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई। हमज़ा सुफ़ियान (उपाध्यक्ष, एएमयू छात्रसंघ) और फ़िरदौस अहमद (कैबिनेट सदस्य, एएमयू छात्रसंघ) दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने जाते हुए टप्पल के पास रोक दिए गए और उन्हें जबरन वापस भेज दिया गया। इसके अलावा, एएमयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष मशकूर उस्मानी को भी लोधा में एक घंटे के लिए अलग से हिरासत में लिया गया था। मशकूर छात्रों को समर्थन देने अलीगढ़ जा रहे थे।

राजद्रोह का कानून  -जोकि अपने आप में एक कठोर कानून है – केवल उन मामलों में लगाया जा सकता है जहां भारतीय संघ की संप्रभुता और अखंडता को हिंसक कृत्यों से ख़तरा हो। यह समझ से परे है कि विश्वविद्यालय परिसर में हुई हाथापाई के मामले में यह क़ानून कैसे लागू किया गया, और यह भी दोषियों के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि पीड़ितों के ख़िलाफ़ लागू किया गया। विदित हो कि उन 14 छात्रों में से, जिनके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मुकदमा दायर किया गया है, कुछ उस समय अलीगढ़ में भी मौजूद नहीं थे। हाल की मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि पुलिस को एएमयू छात्रों के ख़िलाफ़ राजद्रोह का कोई सबूत नहीं मिला है। जिस लापरवाही और आकस्मिक तरीक़े से छात्रों पर राजद्रोह कानून लगाया गया, वह उत्तर प्रदेश पुलिस के नकारात्मक रवैये को दिखाता है, और हमें यह मानने पर विवश करता है कि यह केवल विवाद पैदा करने और विश्वविद्यालय की छवि ख़राब करने के लिए एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया।

यह पहली बार नहीं है जब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को ढाल बनाकर विवाद उत्पन्न करके सामाजिक धुर्वीकरण की राजनीति की जा रही है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सिर्फ़ नफ़रत और विभाजन के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए निर्दोष छात्रों के जीवन के साथ खिलवाड़ करते देखना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रेस कांफ्रेंस में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा की गई इस कार्रवाई की निंदा की गई और आयोजकों ने मांग की, कि एएमयू के 14 छात्रों के ख़िलाफ़ राजद्रोह का झूठा मुकदमा तुरंत रद्द किया जाना चाहिए। SIO के पदाधिकारियों ने कहा कि ABVP व भाजपा युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए जिन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में अशांति फैलाने का प्रयास किया।

इन घटनाओं में राष्ट्रीय मीडिया द्वारा निभाई गई भूमिका भी अत्यंत निराशाजनक है, जिसने एएमयू को “आतंकवादियों का विश्वविद्यालय” कहा और एक बार फिर एएमयू को लेकर एक अनावश्यक विवाद को भड़काने की कोशिश की। आयोजकों के अनुसार इस तरह की भड़काऊ और ध्रुवीकरण करने वाली पत्रकारिता पर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए और पत्रकारिता की ज़िम्मेदारी और मीडिया नैतिकता को बहाल किया जाना चाहिए। SIO व अन्य विश्वविद्यालयों के छात्र इस चुनौतीपूर्ण समय में एएमयू के साथ एकजुटता एवं मज़बूती से खड़े हैं और फासीवादी ताकतों और उनके सहयोगी मीडिया घरानों के बार-बार विश्वविद्यालय के नाम को बदनाम करने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए विश्वविद्यालय का इस्तेमाल करने के एक के बाद एक प्रयासों को ख़ारिज कर रहे हैं।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को सैयद अज़हरुद्दीन (महासचिव, एसआईओ), मीरान‌ हैदर (जामिया मिल्लिया इस्लामिया), नज़ील (दिल्ली विश्वविद्यालय) और आसिफ़ इदरीस (काउंसिलर, जेएनयूएसयू) ने सम्बोधित किया।

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