2024 की राजनीतिक चुनौती किशन पटनायक के लेख के संदर्भ में

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साभार : द टाइम्स ऑफ इंडिया

डॉक्टर हसन रज़ा

भाजपा के बढ़ते इरादों और क़दमों को देखकर मुझे किशन पटनायक की बात याद आ रही है। उन्होंने हिंदुत्व की राजनीति पुस्तक में “भाजपा के विरोधी” शीर्षक से एक लेख में लिखा था कि भाजपा जिस तरह की वैचारिक, राजनीतिक और आर्थिक मॉडल की समर्थक है, उसका वास्तविक विरोध नहीं हो रहा है। केवल चुनावी राजनीति के क्षेत्र में सत्ता के लिए संघर्ष हो रहा है। फिर वे सवाल करते हैं कि क्या चुनावों में हेर-फेर करके ही बीजेपी को रोका जा सकता है? क्या केवल धर्म-निरपेक्षता की रक्षा के नाम पर किये गये इस अधूरे प्रयास से देश के सभी सामूहिक मुद्दे हल हो जायेंगे? तब वे स्वयं उत्तर देते हैं कि सांप्रदायिकता से लड़ना निश्चित रूप से सार्थक है, लेकिन इसे केवल वे ही सफलतापूर्वक लड़ सकते हैं जो सामूहिक जीवन के अन्य क्षेत्रों, जैसे समानता, सार्वजनिक विकास में सकारात्मक रचनात्मक मूल्यों को स्थापित करने में सक्षम हैं। समृद्धि, लोकतांत्रिक मूल्य, न्याय, मानव के प्रति सम्मान, पारदर्शिता इत्यादि। किशन पटनायक ने अपने लेख में यह भी स्पष्ट रूप से बताया है कि जो राजनीतिक ताक़तें इन उच्च मानवीय मूल्यों के लिए नहीं लड़ सकतीं वे भाजपा का मज़बूत और दीर्घकालिक विरोध कैसे कर सकतीं हैं?

फिर वे आगे लिखते हैं, बीजेपी सिर्फ़ चुनाव लड़ने वाली सामान्य राजनीतिक पार्टी नहीं है, बल्कि एक विशेष सांस्कृतिक और विचारधारा के वर्चस्व के लिए एक राजनीतिक हथियार है। इसलिए बीजेपी को रोकने के लिए व्यापक स्तर का एक क्रांतिकारी सांस्कृतिक आंदोलन चलाना होगा। यह आंदोलन ब्राह्मणवाद, जातिवाद और राष्ट्रवाद की सीमित अवधारणा और ग़ुलामी के कालखंड के दौरान भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों के ख़िलाफ़ होगा।

किशन पटनायक ने अपने लेख में स्पष्ट शब्दों में यह भी लिखा है कि आज के राजनीतिक दल भाजपा से पूरी तरह मुक़ाबला नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि उनके दिमाग़ में आदर्श भारतीय समाज का कोई स्पष्ट नक्शा और योजना नहीं है। हालाँकि, मुझे लगता है कि 2024 के संसदीय चुनाव की असली चुनौती यह है कि अगर बीजेपी इस बार भारी बहुमत के साथ केंद्र सरकार में आती है, तो वे जिस सांस्कृतिक क्रांति की बात करती है उसको पूरा करने के लिए आख़िरी सीमा तक जाएगी, किसी हद पर नहीं रुकेगी चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े। राजनीतिक प्रतिशोध और नफ़रत की राजनीति के जो बीज बोए गए हैं, उनका कड़वा फल चखने का समय होगा। इतना ही नहीं, अपनी सत्ता को स्थाई तौर पर बरक़रार रखने के लिए उन्हें जो भी क़दम उठाना पड़े, वह उठाएंगे। इतिहास हमें बताता है कि क्रांतिकारी दलों ने सत्ता पर कब्ज़ा करने के बाद हमेशा यही किया है। सभी राजनीतिक दल यही करते हैं, जिनका उद्देश्य केवल संविधान के अनुसार पांच साल तक सरकार चलाना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक क्रांति लाना होता है। लोकतंत्र में चुनाव इसीलिए होते हैं कि संविधान द्वारा जो लोकतांत्रिक व्यवस्था तय है उसे जनमत के समर्थन से चलाया जाए। और इसीलिए प्रत्येक निर्वाचित प्रतिनिधि संविधान का पालन करने की शपथ लेता है। लेकिन यदि किसी राजनीतिक पार्टी के राजनीतिक सिद्धांत एवं राष्ट्रीयता संविधान के असंगत हो तो वे संविधान की शपथ लेकर अपनी राजनीतिक शक्ति बढ़ाते रहेंगे और यह एक गंभीर परिणाम होगा कि वे अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए कोई भी अंतिम क़दम उठाएंगे।

2024 के संसदीय चुनाव की चुनौती यही है कि अब समय आ गया है की जब भाजपा, अगर यह चुनाव भारी बहुमत से जीत जाती है तो उसे अपनी लंबे समय से पोषित महत्वाकांक्षा का एहसास होगा और उसके मूल सपने को रंग देने के लिए सभी क़दम उठाए जाएंगे। भारत का हर नागरिक अपनी ऐतिहासिक चेतना और राजनीतिक अंतर्दृष्टि के प्रकाश में इन कार्यों की भविष्यवाणी कर सकता है। अज्ञानी लोगों को ये बातें पहले से नहीं सिखाई जा सकतीं। इसे एक संकेतक के रूप में मूल्यांकन करने के लिए, फरिश्तों के प्रश्न को याद किया जा सकता है कि जब अल्लाह ने आदम के सांसारिक अधिकार और सार्वजनिक अधिकार की घोषणा की तो फरिश्तों ने क्या पूछा था। यह बात सिर्फ सुनाने के लिए नहीं है, बल्कि यह सत्ता और सत्ता के खतरे और उसके शुद्धिकरण का रास्ता भी बताती है। बहरहाल, बात इधर-उधर न जाए, मुझे लगता है कि 2024 के चुनाव में 370 + 30 = 400 की जो बात कही जा रही है उसके धार और वार को लोग समझ नहीं पा रहे हैं। यह सिर्फ बयानबाज़ी नहीं है, बल्कि वे अपने कैडर को एक नई पहल करने की चुनौती दे रहे हैं और यह विपक्ष के साहस को कमज़ोर करने की एक मनोवैज्ञानिक रणनीति भी है। इस पहलू से भारत के सभी नागरिकों और सिविल सोसाइटी को अपनी भूमिका स्वयं तय करनी चाहिए। राजनीतिक दल अपनी राजनीतिक उपयोगिताओं और बाधाओं और कमज़ोरियों के मद्देनज़र अपने निर्णयों को विकृत करते रहेंगे। वास्तव में तो यह भारतीय समाज के जीवित विवेक और स्वतंत्रता की अवधारणा के साथ एक लोकतांत्रिक भूमिका की परीक्षा है। यह जो लोग देश के ठेकेदार हैं उनसे केवल एक अनुरोध है कि वे अपनी पुरानी आदत के अनुसार अपने व्यक्तिगत, संस्थागत या धार्मिक हितों या भावनाओं और संवेदनाओं का राजनीतिकरण न करें। केवल अपने जोखिम के लिए न उठें, संपूर्ण भारतीय जनता को संबोधित करने वाली लोकतांत्रिक भाषा सीखें।

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