इलेक्टोरल बॉन्ड पर “सुप्रीम” प्रतिबंध

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अल्तमश

भारतीय राजनीततक परिदृश्य में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने‌ ऐतिहासिक फैसले में चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक क़रार दे दिया है। 15 फरर्वरी, 2024 को आए इस फैसले से पार्टी फंडिंग एक बार फिर से चर्चा का विषय तब बन गया है जब देश आगामी लोकसभा चुनावों से कुछ ही सप्ताह दूर है। राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा 2017 के बजट में पेश की गई चुनावी बॉन्ड योजना एक विवादास्पद विषय बन रहा है। योजना की अस्पष्टता और गोपनीयता को लेकर शुरू से ही सवाल उठ रहे थे।

क्या है इलेक्टोरल बॉन्ड?

केंद्र सरकार द्वारा जनवरी 2018 से क़ानूनी रूप से लागू इलेक्र्टोरल बॉन्ड एक र्वचन पत्र के समान होता है, जिन्हें निर्दिष्ट राशि (1000 रुपये से 1 करोड़ रुपये तक) में भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से ख़रीदा जा सकता है। ये बॉन्ड अपने किसी भी पसंदीदा राजनीतिक दल को दान किए जा सकते हैं और दानकर्ता की पहचान गुप्त रहती है। केंद्र की भाजपा सरकार ने दावा किया था कि इसका उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ना है जिससे राजनीतिक फंडिंग में काले धन के उपयोग पर रोक लगेगी और बेहद साफ़-सुथरे और पारदर्शी तरीक़े से राजनीतिक दलों को फंडिंग मिलेगी।

विवादों का सिलसिला

योजना के शुरू होने के बाद से ही यह लगातर सवालों के घेरे में रही है। योजना के ख़िलाफ़ याचिकाकर्ताओं एवं आलोचकों का तर्क था कि गुमनामी की सहूलियत से काले धन को सफ़ेद करने का चोर दरर्वाज़ा खुल जाएगा। इसके अलावा यह भी तर्क दिया गया कि बड़े दलों के लिए धन जुटाना आसान होगा, जिससे क्षेत्रीय दलों और स्वतंत्र उम्मीदवारों के लिए चुनाव लड़ना कठिन हो जाएगा। इस योजना के खतरे को समझते हुए चुनाव आयोग ने 26 मई 2017 को विधि मंत्रालय को पत्र लिखकर चिंता जताई थी कि चुनावी बॉन्ड के लिए किए गए संशोधनों से राजनीतिक दलों की फंडिंग में पारदर्शिता पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

2017 में इस योजना को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थीं। इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को लाते समय सरकार ने कई संशोधन किए जिसमें कॉरपोरेट द्वारा अपने शुद्ध लाभ दिए गए चंदे की 7.5 प्रतिशत की सीमा को समाप्त कर इसे असीमित रूप से बढ़ा दिया। यहां तक कि घाटे में चल रही कंपनियों से भी चंदे लेने की अनुमति दे दी। इसके अलावा विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA) में संशोधन कर विदेशी कंपनियों को भारत में अपने सब्सिडियरी कंपनी स्थापित कर भारत के राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने का रास्ता खोल दिया गया जो राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर विषय है। इसके अतरिक्त चुनावी बॉन्ड खरीदने की प्रक्रिया सिर्फ़ आम नागरिक एवं विपक्ष में बैठी पार्टियों के लिए लए गोपनीय है। केंद्र सरकार बॉन्ड जारी करने वाली स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से डोनर्स की जानकारी प्राप्त कर सकती है जो बिल्बकुल भी पारदर्शी नहीं है। एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के आंकड़ों के अनुसार बीते 6 साल में बीजेपी को इलेक्टोरल बॉन्ड से 6,566 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई।

इस मामले पर निर्णय देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि क यह इलेक्टोरल बॉन्ड चुनिंदा लोगों के लिए ही गोपनीयता प्रदान करते हैं जिससे लोकतंत्र में एक पक्षपातपूर्ण व्यवस्था का निर्माण होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस योजना से मौलिक अधिकार अनुच्छेद 19 (1)(a) का उल्लंघन होता है। यह अनुच्छेद देश के हर नागरिक को बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा करता है। इलेक्टोरल बॉन्ड योजना के तहत योगदानकर्ताओं को गुमनाम रखा गया था, जिससे सुप्रीम
कोर्ट ने सूचना के अधिकार का उल्लंघन बताया। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले से यह पानी की तरह साफ़ कर दिया कि देश के नागरिकों और मतदाताओं को यह जानने का संपूर्ण अधिकार है कि बॉन्ड द्वारा कौन व्यक्ति या कंपनी किस राजनीतिक दल को कितना चंदा दे रहा था और जिसके बदले में उस राजनीतिक दल ने किस प्रकार का लाभ उस व्यक्ति या कंपनी को पहुंचाया। न्यायलय ने चुनावी बॉन्ड पर तत्काल रोक लगाते हुए निर्देश जारी किया है कि स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (एसबीआई) को 31 मार्च तक चुनाव आयोग को चुनावी बॉन्ड के माध्यम से किए गए सभी योगदानों का विवरण देना होगा। साथ ही अदालत ने चुनाव आयोग को भी निर्देश दिया है कि उसे 13 अप्रैल तक अपनी वेबसाइट पर यह जानकारी साझा करनी होगी।

आशा की किरण

राजनीतिक जवाबदेही से जुड़े इस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपना “सुप्रीम” फैसला सुना दिया है जो कई मायनों में ऐतिहासिक है। इस मामले पर सुनवाई के दौरान सरकार द्वारा यह कहना कि नागरिकों को राजनीतिक दलों की फंडिंग के बारे में जानने का हक़ नहीं है, ये दर्शाता है कि सरकार नागरिकों को कमतर समझती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका के महत्व को पुनः स्थापित कर दिया है।

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