6 दिसम्बर: रामजन्म भूमि की असलियत

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मेरी नानी कट्टर हिंदू थीं. साल में कोई तीज-त्योहार-व्रत नहीं होगा जिसे उन्होंने अपनी चौरानबे साल की उमर तक निभाया न हो. बारह साल में एक बार आने वाला कुंभ मेला तो क्या, हर साल लगने वाले माघ मेले में भी नानी इलाहाबाद में गंगाजी के किनारे महीना भर कल्पवास करती थीं. साल में कई बार सुबह चार बजे उठ कर पैदल कई किलोमीटर दूर गंगाजी नहाने जाती थीं. एक नहीं दो बार चारों धाम जा चुकी थीं. भगवान राम की उपासक थीं. उनकी पूजा चौकी में राम-सीता की फ़ोटो टॉप पर थी. मरते दम तक हर दिन घंटों श्रीराम की पूजा करती थीं. रामनवमी, दशहरा, दीवाली नानी के महापर्व होते थे.

लेकिन मैंने अपने पूरे बचपन में नानी की ज़बान से बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि का एक ज़िक्र तक नहीं सुना था. ऐसा कैसे हो सकता है कि नानी को सालों तक इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं था कि रामजन्मभूमि पर मंदिर को तोड़ कर बाबर ने मस्जिद बनाई थी? मैं मान नहीं नहीं सकता कि विश्वहिंदू परिषद के क़ायम होने से पहले मेरी नानी सोई हुई हिंदू थीं. हज़ारों साल पुराने सनातन हिंदू धर्म के एक-एक ज़र्रे की उनको जानकारी थी. एक-एक मंत्र कंठस्थ था. फिर ये जानकारी उनसे कैसे छूटी रह गई?

बल्कि मुझे अपने पूरे बचपन में माता और पिता दोनों ओर के ख़ानदानों में एक आदमी नहीं याद पड़ता है जिसने कभी इसका ज़िक्र भी किया हो कि, अरे, अयोध्या में राजन्मभूमि का मंदिर तोड़ कर बाबर ने मस्जिद बनाई थी और जब तक हमारा मंदिर वापस नहीं मिलेगा हम चैन से नहीं बैठ सकेंगे. तीन दर्जन बुआ-फूफा-चाचा-चाची-ताऊ-ताई-मामा-मामी-मौसी-मौसा में एक आदमी नहीं, एक औरत नहीं. साठ-सत्तर चचेरे-ममेरे-फुफेरे-मौसेरे भाई-भाभियों, बहनों-बहनोइयों में से एक ने इस बाबत कभी कोई एक वाक्य तक नहीं बोला. अड़ोस-पड़ोस, मुहल्ले वाले — क्या सब सोए थे?

इलाहाबाद में दशहरा का जश्न ज़बरदस्त होता था. अलग अलग मुहल्लों में रात भर पौ फटने तक दर्जनों चौकियाँ निकलती थीं जिन पर सजधज कर राम, सीता, लक्ष्मण बैठे होते थे. उन्हें देखने लाखों लोग बालकनियों से लटक रहे होते थे. सड़क पर तिल रखने की जगह नहीं होती थी. लाइटें इतनी होतीं थीं कि लगता था भरी दोपहर है. हर पाँच घर बाद लाउडस्पीकर पर गला फाड़ कमेंट्री हो रही होती थी. पूरे शहर में रामलीला खेली जाती थी. दशहरे पर सैकड़ों लोकेशन पर रावण जलता था. पूरे बचपन किसी साल भी एक चौकी पर, एक बालकनी पर, एक लाउडस्पीकर पर, एक रामलीला में एक बैनर तक नहीं देखा या पढ़ा बाबरी मस्जिद के बारे में. क्या इलाहाबाद के लाखों हिंदू सोए हुए थे? कभी रावण के साथ बाबर का पुतला नहीं जलते देखा. ऐसा कैसे हो सकता है? इतनी बड़ी घटना हुई कि बाबर ने रामजन्मभूमि पर मस्जिद बना दी और सैंकड़ों करोड़ों हिंदू साढ़े चार सौ साल तक सोते रहे? ये कैसे हिंदू थे कि दिनरात राम का नाम लेते थे लेकिन इस बात को भूल चुके थे कि मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनी थी?

उन्नीस सौ पच्चासी में बाबरी मस्जिद का ताला खुलने से पहले किसी राम मंदिर में, किसी हनुमान मंदिर में, किसी गाने में, किसी फ़िल्म में, किसी नाटक में, किसी लोकगीत में, किसी कविता में, किसी महाकाव्य में, किसी उपन्यास में, किसी अख़बार में, किसी जलसे में, किसी स्कूल में, किसी क्लास में, किसी चौराहे पर, किसी दुकान पर, गंगाजी में संगम तक ले जाने वाले किसी मल्लाह से, मंदिर के बाहर बैठे किसी भिखारी से, यहाँ तक कि अपने तमाम संघी दोस्तों से भी कभी सुना ही नहीं कि रामजन्मभूमि पर किसी मंदिर को तोड़ कर बाबर ने मस्जिद बनाई थी.

ये तो छोड़िए. मस्जिद का ताला खुलने से पहले तो अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के मुँह से कभी नहीं सुना था कि बाबर ने मंदिर तोड़ा था और मस्जिद बनाई थी.

और सुनिए. उन्नीस सौ उन्चास में बाबरी मस्जिद में रातों रात अपराधियों ने घुस कर श्रीराम की मूर्ति रखी. उसके पहले दशकों तक तो हिंदू महासभा और आरएसएस ने भी दावा नहीं किया था कि बाबरी मस्जिद के नीचे रामजन्मभूमि है.

इससे भी बड़ी बात. छत्रपति शिवाजी महाराज ने क्यों नहीं इस पर कभी कोई टिप्पणी की? इतने सारे शंकराचार्य हुए बाबर के बाद. कभी कोई क्यों नहीं बोला? स्वामी विवेकानंद क्यों नहीं बोले? जब से बाबर ने मंदिर तोड़ा और जब तक बाबरी मस्जिद में ग़ैरक़ानूनी तरह से घुस कर मूर्ति रखी गई, उन चार सौ पच्चीस सालों में किसी एक हिंदू संत-महात्मा-नेता-राजा-महाराजा ने क्यों नहीं इस बारे में बोला या लिखा या दावा किया?

-Ajit Shahi

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