राजनीतिक प्रतिरोध और कविता : कल और आज के संदर्भ में

यह ऐसा दौर है जब बाज़ारवाद एक ख़तरनाक स्तर तक हावी है। जीवन के सब मूल्य पुराने पड़ चुके हैं। अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सत्तारूढ़ ताक़तों का ज़ोरदार प्रहार है। सभी लोकतांत्रिक संस्थाएँ अपने स्खलन काल से गुज़र रही हैं और ज्ञान के लगभग सभी महत्वपूर्ण अनुशासन चाहे वो इतिहास हो, समाजशास्त्र हो या अर्थशास्त्र - सत्ता की जी हुज़ूरी में लिप्त हैं। इस दौर में कविता ही है जिसने अपनी आवाज़ नहीं खोई है और अपने पूरे दम से प्रतिरोध के स्वर को बुलंद किये है। यह तमाम जागरूक एवं संवेदनशील लोगों की एक सामूहिक लय है जिसे चाहे कितना भी अप्रासंगिक क़रार देने की कोशिश की जाए - यह सत्ता में विराजमान सबसे ऊँची कुर्सी को उखाड़ फेंकने का बल रखती है।

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हिंदी साहित्य में ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ की एक लंबी परंपरा रही है। यह प्रतिरोध कभी प्रत्यक्ष रहा तो कभी परोक्ष। लेखकों ने हमेशा से अपनी क़लम का इस्तेमाल अपने समय को दर्ज करने और अपनी पक्षधरता सुनिश्चित करने के लिए किया है। और चूंकि कविता साहित्य की सभी विधाओं में बेहद सशक्त विधा मानी जाती है, शायद इसीलिए कविता की समाज में हो रहे निरंतर परिवर्तन के साथ-साथ आने वाली चुनौतियों तथा समस्याओं से जूझने के लिए ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ के निर्माण में अहम भूमिका रही है। फिर चाहे ये समस्याएँ सामाजिक हों, आर्थिक हों या राजनीतिक – कविता ने अपना दायित्वबोध कभी नहीं छोड़ा। इस परंपरा ने हर समय में समाज को अनेक बड़े कवि दिए हैं। हमारे यहाँ कविता में न्याय की आदिम आकांक्षा लिए कबीर की परंपरा से लेकर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, वीरेन डंगवाल, भवानीप्रसाद मिश्र, अदम गोंडवी, दुष्यंत कुमार, अवतार सिंह पाश, रमाशंकर यादव विद्रोही से होते हुए आज की युवा पीढ़ी तक यह परंपरा चली आ रही है। विद्रोही अपनी कविता में ये आह्वान करते हैं –

मेरा सर फोड़ दो / मेरी कमर तोड़ दो / मगर ये न कहो कि अपना हक़ छोड़ दो

समकालीन यथार्थ में राजनीति की सर्वव्यापी उपस्थिति से इंकार करना लगभग मूर्खतापूर्ण है। इस समय में किसी भी तरह के सत्य की पक्षधरता करते वक़्त राजनीति से बच निकलना संभव ही नहीं है। इसलिए आज की कविता का दायित्व और भी बढ़ जाता है। इसे अपने समाज-बोध में राजनीतिक संवेदना को आत्मसात कर एक व्यापक मानवीय पक्षधरता को चरितार्थ करना है। हिंदी कविता को अगर बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में देखें तो यह बिल्कुल स्पष्ट नज़र आता है कि कविता सत्ता का वह प्रतिपक्ष बनाती है जो जनता की भावनाओं एवं मानवीय मूल्यों के साथ हो। कुछ उल्लेखनीय तारीखों की बात करें तो 1975, 1984, 1992, 2002, 2015 से लेकर 2019 तक काव्यात्मक प्रतिरोध की सूची इतनी लंबी है कि एक-एक कवि अथवा कवयित्री को शोध का विषय बनाया जा सकता है और बनाया जाता रहा है।

यह ऐसा दौर है जब बाज़ारवाद एक ख़तरनाक स्तर तक हावी है। जीवन के सब मूल्य पुराने पड़ चुके हैं। अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सत्तारूढ़ ताक़तों का ज़ोरदार प्रहार है। सभी लोकतांत्रिक संस्थाएँ अपने स्खलन काल से गुज़र रही हैं और ज्ञान के लगभग सभी महत्वपूर्ण अनुशासन चाहे वो इतिहास हो, समाजशास्त्र हो या अर्थशास्त्र – सत्ता की जी हुज़ूरी में लिप्त हैं। इस दौर में कविता ही है जिसने अपनी आवाज़ नहीं खोई है और अपने पूरे दम से प्रतिरोध के स्वर को बुलंद किये है। यह तमाम जागरूक एवं संवेदनशील लोगों की एक सामूहिक लय है जिसे चाहे कितना भी अप्रासंगिक क़रार देने की कोशिश की जाए – यह सत्ता में विराजमान सबसे ऊँची कुर्सी को उखाड़ फेंकने का बल रखती है। जयपुर में आयोजित समानांतर साहित्य उत्सव (2018) के रचना पाठ कार्यक्रम में प्रतिष्ठित कवि नरेश सक्सेना ने कहा था कि प्रतिरोध की कविता बहुत दूर तक जाती है। प्रतिरोध की कविता एक गुलाब के फूल से भी प्रकट की जा सकती है। प्रतिरोध की कविता आपको मनुष्य बना देती है।

राजनीति और कविता का उल्लेख चल रहा हो तो सांप्रदायिकता, पूँजीवाद एवं मानवता विरोधी फासीवादी ताक़तों का ज़िक्र बेहद आवश्यक हो जाता है। देश में बढ़ रही मॉब लिंचिंग यानी भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर देना, असहमति का स्पेस लगभग नदारद होना, व्यापक जनसमर्थन जुटाने की आक्रामक युक्तियाँ और अल्पसंख्यकों के दमन की पुरज़ोर कोशिशों के बीच प्रतिरोध की कविताओं का निरंतर सृजन होते रहना यह दर्शाता है कि कविता ने अपना राष्ट्रधर्म क़ायम रखा है। बल्कि आज के कवि अपना प्रतिरोध और भी मुखरता से दर्ज कर रहे हैं। युवा कवि विहाग वैभव अपनी हाल की कविता ‘देश का मौजूदा नक्शा बनाता हूँ’ में लिखते हैं –

इतने बीहड़ अंधेरे का ओट लेकर किसी ने चुरा लिए हैं मेरे बाक़ी के रंग / भगवा बचा है / मजबूरन इसी से बनाता हूँ / हथकरघा, हथौड़ी, किताब, कहानी, विचार और संविधान / सबको भगवा से रंगता हूँ / हर किसी को भगवा पानी पिलाता हूँ / भगवा खाना खिलाता हूँ / सबकी रगों में भगवा ख़ून दौड़ाता हूँ / मेरी नींद का चौथा पहर है / देश का नक्शा बनाता हूँ

कवियों की युवा पीढ़ी में शैलेन्द्र शुक्ल, कर्मानंद आर्य, कुँवर रविंद्र, रश्मि भारद्वाज, मृदुला शुक्ल, मनीषा जैन, शिवानंद मिश्र, सोनी पाण्डेय, अच्युतानंद मिश्र, अनुज लुगुन, अदनान कफ़ील ‘दरवेश’, वीरू सोनकर, पराग पावन आदि अनगिनत नाम हैं जो बेहद सक्रिय रूप से आज के यथार्थ के सामने डटकर अपनी राजनीतिक संवेदना का परिचय दे रहे हैं। हिंदी कविता में धर्म को अस्मिता की राजनीति के लिए इस्तेमाल होने के विरोध की भी एक परंपरा बन चुकी है। इसलिए ही हिन्दू अस्मिता का राजनीतिक दबाव कविता पर कभी भी चल नहीं पाया है। इस परंपरा की शुरूआत को याद करें तो भक्ति काव्य भी अंततः धर्म की राजनीति के निषेध की कोशिशों में विकसित हुआ है। वह साम्प्रदायिक सौहार्द पर भी बल देता है और सामाज में निचले पायदान पर रखे गये दलित, वंचित एवं शोषित वर्ग की आकांक्षाओं को भी स्वर देता है। यही उसकी राजनीति थी और इसी अघोषित राजनीति के तहत मीरा और अंडाल ने भारतीय स्त्री-जीवन में पितृसत्ता और उससे प्रेरित सांस्कृतिक जगत की अनुभव-संरचनाओं की पुनर्रचना भी की।

वरिष्ठ कवियों की ओर पुनः रुख़ करें तो केदारनाथ सिंह, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, कृष्ण कल्पित, कुंवरनारायण, विष्णु खरे, असद ज़ैदी, अरुण कमल, ज्ञानेन्द्रपति से होते हुए आलोक धन्वा, उदय प्रकाश, विजय कुमार से लेकर कुमार अम्बुज, देवीप्रसाद मिश्र, अष्टभुजा शुक्ल, निर्मला गर्ग, अनामिका आदि ने अपनी कविताओं में सामाजिक यथार्थ को प्रतिफलित किया है। इमरजेंसी का समय हो, गुजरात नरसंहार हो, नंदीग्राम की हिंसा हो, मुज़फ्फरनगर दंगा, गोरखपुर त्रासदी, कश्मीर समस्या, बाबरी मस्जिद विध्वंस, आदिवासी आंदोलन या स्त्री-संवेदना की बात हो – कविता ने हर बार चुनौतियों के काले आकाश को अपने सम्मिलित स्वर से भेदने का काम किया है। अवतार सिंह पाश जैसे क्रांतिकारी कवि जिन्हें कविता पढ़ते समय आतंकवादियों द्वारा गोली मार दी गयी, अपनी दृढ़ता और सत्य की अटलता को बयान करते हुए कहते हैं –

मैं घास हूँ / मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊँगा / बम फेंक दो चाहे विश्वविद्यालय पर / बना दो हॉस्टल को मलबे का ढेर / सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर / मेरा क्या करोगे / मैं तो घास हूँ हर चीज़ पर उग आऊँगा

नयी सदी की कविता में संघर्ष के स्वर के साथ-साथ राजनैतिक प्रतिबद्धता की गूँज साफ़ सुनाई देती है। युवा पीढ़ी ने भी प्रतिरोध की इस मशाल को हाथों-हाथ लिया है और मानवता के पक्ष में अपनी पक्षधरता को स्पष्ट रखा है। अब कविता हमारे समय में प्रतिरोध का एक अभिन्न अंग बन चुकी है।

 

उज़्मा सरवत

छात्रा,आई आई टी गाँधीनगर

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