महिलाओं के बाज़ारीकरण के ख़िलाफ़ कब बोलेंगे नारीवाद के ध्वजवाहक?

यह कहना एकदम ठीक है कि आज की महिलाएं उस दौर की महिलाओं से बढ़कर इसलिए हैं कि समाज मे उन्हें कई अधिकार प्राप्त हुए हैं। शिक्षा के अधिकार पर अगर बात की जाए तो महिलाओं ने इस क्षेत्र में समाज को काफ़ी प्रभावित किया है या भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की स्थिति पर अगर ग़ौर किया जाए तो भी कई बिंदु हमारे सामने हैं जो कि एक सुनहरा भविष्य हमारे समक्ष रखते हैं परंतु फिर भी मुझे इस लेख को लिखने की आवयश्कता क्यों पड़ी? और क्यों महिलाओं की स्थिति आज भी दयनीय है? तब कारण जानने के लिए हमें यह समझना ज़रूरी होगा कि शैक्षिक स्थिति ठीक हो जाने के बाद भी हम क्यों बाज़ार के चलने का साधन बन रहे हैं?

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जब हम महिलाओं के अधिकार, उनकी स्वतंत्रता और उनके समक्ष मौजूद चुनौतियों पर बात करते हैं तब हमें हमारे अतीत का विस्तारपूर्वक विश्लेषण करने की आवश्यकता पड़ती है, और यह ज़रूरी भी है, इसलिए कि वर्तमान भारत की संस्कृति और परम्परा की नींव प्राचीन भारत के इतिहास से झलकती है और भारत का यह अतीत ही यहां का परिचय रहा है।

प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति और उनके दैनिक जीवन को जानने का जब हम प्रयास करते हैं तब साफ़ शब्दों में यह समझ पाते हैं कि उस समाज में महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को अपनी इच्छाओं के अनुसार उपयोग में लिए जाने तक सीमित रखा जाता था। भारत के कुछ समुदायों में सती प्रथा, बाल विवाह और विधवा पुनर्विवाह पर रोक, उस समय के सामाजिक जीवन का एक हिस्सा बन गयी थी।

सती प्रथा एक ऐसी विवादास्पद समाजिक प्रथा रही जिसने भारत के सामाजिक जीवन का साथ बहुत बाद तक नहीं छोड़ा। इस प्रथा के अनुसार विधवा को अपने पति की चिता में अपनी जीवित आहुति देनी होती थी। हालांकि यह कृत्य विधवा की ओर से स्वैच्छिक रूप से किये जाने की उम्मीद की जाती थी। कई बार इसके लिये विधवा को मजबूर भी किया जाता था। 1829 में अंग्रेज़ों ने इसे समाप्त कर दिया।

यहां सती प्रथा का परिचय कराना मैंने इसलिए ज़रूरी समझा ताकि हम वर्तमान भारतीय समाज के बनने की पृष्ठभूमि को समझ सकें कि यदि आज के भारत में महिलाओं की स्थिति पर बात करने का प्रयास हम कर रहे हैं तो यह वही समाज है जिसने सती होने जैसी भयावह प्रथा को कभी झेला है। यह काम किसी दूसरे ग्रह से आए हुए लोगों का नहीं था बल्कि यह हमारे ही समाज की एक समस्या थी जिसे बनाए रखने तक की लड़ाई हमारे यहां लड़ी गयी।

यदि वर्तमान भारत में महिलाओं की स्थिति को हम प्राचीन भारत या बीती कुछ सदियों के ऐतिहासिक पन्नों से मिलाकर देखते हैं तो पाते हैं कि बदलाव सिर्फ़ कुछ ही बिंदुओं पर हुआ है। प्राचीन भारत मे महिलाओं की इस स्थिति का कारण पुरुष मानसिकता थी लेकिन वर्तमान भारत में महिलाएं स्वयं भी इसकी ज़िम्मेदार हैं। यदि मुझसे कोई प्रश्न करता है कि आख़िर महिलाएं ख़ुद क्यों चाहेंगी कि उनके साथ अन्याय हो, समाज में उन्हें सम्मान न मिले या उन्हें प्रताड़ित किया जाए , तब मेरा मत होगा कि यह कहना एकदम ठीक है कि आज की महिलाएं उस दौर की महिलाओं से बढ़कर इसलिए हैं कि समाज मे उन्हें कई अधिकार प्राप्त हुए हैं। शिक्षा के अधिकार पर अगर बात की जाए तो महिलाओं ने इस क्षेत्र में समाज को काफ़ी प्रभावित किया है या भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की स्थिति पर अगर ग़ौर किया जाए तो भी कई बिंदु हमारे सामने हैं जो कि एक सुनहरा भविष्य हमारे समक्ष रखते हैं परंतु फिर भी मुझे इस लेख को लिखने की आवयश्कता क्यों पड़ी? और क्यों महिलाओं की स्थिति आज भी दयनीय है? तब कारण जानने के लिए हमें यह समझना ज़रूरी होगा कि शैक्षिक स्थिति ठीक हो जाने के बाद भी हम क्यों बाज़ार के चलने का साधन बन रहे हैं?

नारीवादी संगठन अपने विचारों का बखान करते हुए बाज़ार में बिक रही महिला के सवाल पर आख़िर ख़ामोश क्यों रहते हैं? उदहारण के तौर पर आज किसी फ़िल्म के फ्लॉप हो जाने का एक बड़ा कारण फ़िल्म में अश्लीलता और देह प्रदर्शन का ना होना होता है। जनता के सामने ऐसा सिनेमा परोसा जाता है जिसमें नग्नता ओर अश्लीलता की हदें पार होती हैं तब सवाल यही उठता है कि आख़िर महिला के शरीर को पैसा कमाने के लिए क्यों उपयोग में लिया जा रहा है? दुःख की बात यह भी है कि आख़िर इस पर ख़ुद महिलाएं क्यों ख़ामोश हैं?‌ दरअसल मुद्दा नारी की स्वतंत्रता का है, जिसे नग्नता को सामाजिक स्वीकृति देकर नहीं बल्कि नारी को सही रूप में स्वतंत्रता देकर पूरा करना होगा। इसके कई और भी कारण हैं चाहे “पॉर्न इंडस्ट्री” के व्यापक रूप में पनपने से हो या समाज में तथाकथित मॉडर्निटी के आ जाने से हो।

समाज में महिलाओं की स्थिति पर बात करते हुए “निर्भया कांड” जैसी वीभत्स घटना को कैसे भूला जा सकता है! देश मे माहौल बनता है कि अब बलात्कार की घटनाएं कभी ना हो सकेंगी परन्तु सोचने की बात है कि 2012 के बाद ऐसी घटनाओं का आंकड़ा हमारे यहां बढ़ा ही है। कुछ समय पहले एक घटना राबिया के साथ हुई थी जहां उसे 5 युवकों द्वारा बलात्कार की कोशिश में विफल होने पर काट कर मार दिया गया और न जाने कितनी ही बच्चियां है जिनके नाम शायद आप और मैं भूल गए होंगे लेकिन उनके साथ ज़्यादती की बात आती है तो रूह कांप उठती है।

प्रश्न सरकार और समाज के बुद्धिजीवी वर्ग के साथ ख़ुद नारीवादी विचारकों की मंशा पर भी उठता है कि क्या राजनीतिक पेचीदगियों के साए में ही हम नाचते रहेंगे या इसके विपरीत हम समाज में महिलाओं को जिस तरह बेचा जा रहा है उस बिंदु पर भी विचार करेंगे।

ख़ान शाहीन

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