[पुस्तक समीक्षा] यथार्थ से सामना कराता है “वैधानिक गल्प”

चन्दन पाण्डेय का यह उपन्यास इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि फ़ेक न्यूज़ के इस घातक युग में झूठ हमारे व्यक्तित्व पर हावी न हो जाए उससे पहले ही यथार्थ का सामना कर लेना ज़रूरी हो जाता है।

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पुस्तक का नाम – वैधानिक गल्प

लेखक – चंदन पाण्डेय

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2020

भाषा – हिन्दी

पृष्ठ – 142

मूल्य – 144/-

‘गल्प’ शब्द के अर्थ का ‘अहसास’ तो मुझे पहले से था परन्तु जब यह शब्द किसी उपन्यास के नाम का हिस्सा बन जाए तो इसके शाब्दिक अर्थ का जानना ज़रूरी हो जाता है। गूगल ने बताया कि इसका निकटम पर्यायवाची होता है ‘मिथ्या’। चंदन पाण्डेय का उपन्यास “वैधानिक गल्प” भारतीय समाज की हिंसक प्रवृत्ति को तो दिखाता ही है लेकिन उससे अधिक वह एक धर्म विशेष के शोषण की सामाजिक आम सहमति और उसमें शामिल सरकारी तंत्र और उनके साथ राजनीतिक जुगलबंदियों के काले यथार्थ को भी सामने लाता है।

उपन्यास लव-जिहाद और उससे पनपे पूर्वाग्रहों को एक कहानी में समेटता है। हो सकता है कि एक उपन्यास के तौर पर पाठकों को कथा अधूरी लगे परन्तु विषयवस्तु की दृष्टि से यह उपन्यास पूर्ण है। चंदन पाण्डेय एक जमे हुए कथाकार के तौर पर लव-जिहाद और उससे पनपे सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक द्वेष के घातक प्रपंचों का एक-एक धागा खोलने में सफल रहे हैं। उपन्यास पढ़ते हुए आपको ऐसा अहसास होगा जैसे आप ख़ुद इस कहानी का हिस्सा बन गए हों। लेखक के कहानी लिखने का अंदाज़ अंत तक बांधे रखता है।

दो लोगों को छोड़कर उपन्यास के सारे किरदार हिन्दू हैं और ये दो मुस्लिम पुरुष हैं। दोनों ही प्रेमी हैं और एक जो पति है, लापता हो गया है। कहानी का आरम्भ यहीं से होता है।‌ फिर सरकारी तंत्र कैसे बड़ी आसानी से पूरे मामले को लव-जिहाद का जामा पहना देता है उसका कसीला वर्णन है। इस सरकारी तंत्र में सब भागीदार हैं, राजनेता से लेकर मीडिया और कथित प्रबुद्धजनों तक।

उपन्यास को पढ़ते हुए एक बात और समझ में आती है कि गांव-देहातों में इस तरह के और सांप्रदायिक विचार बहुत तीव्रता से फैल रहे हैं। शायद उसका कारण अतिसुलभ इंटरनेट हो सकता है और उसके ऊपर अनपढ़ माहौल का होना। उपन्यास साथ-साथ समाज में एक महिला के अस्तित्व के संघर्ष पर भी रहम भरी निगाह डालता है।‌ लेखक द्वारा घटनाओं और लम्हों के मध्य लिखे गए संदर्भ दिमाग़ पर छाप छोड़ देते हैं! जैसे, “उसके कन्धे के स्पर्श से मेरे भीतर एक आकांक्षा ने जन्म लिया कि काश इस कातर स्पर्श के ज़रिए मैं उसकी त्वचा के भीतर समा जाता। ऐसी गुंजाइश होती कि हम अपनी त्वचा बदल लेते। काश ऐसा होता! ऐसा होता तो मैं उसके भीतर जा कर देख पाता की कौन-सा दुःख सर्वाधिक साल रहा। … लेकिन स्पर्श की सीमा है, वो कायांतरण में रत्ती भर भी मदद नहीं करती।”

चन्दन पाण्डेय का यह उपन्यास इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि फ़ेक न्यूज़ के इस घातक युग में झूठ हमारे व्यक्तित्व पर हावी न हो जाए उससे पहले ही यथार्थ का सामना कर लेना ज़रूरी हो जाता है। यह उपन्यास उसकी विषयवस्तु को उसकी जड़ों की हद तक न सिर्फ़ समझाता है बल्कि यह भी बताता है कि “लव-जिहाद” जैसे आख्यान घिनौने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए गढ़े गए झूठ हैं जिन्हें “वैधानिक गल्प” कहा जाए तो बेहतर है।

समीक्षक : ख़ान इक़बाल

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