फ़िल्म समीक्षा : हेमोलिम्फ

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सुदर्शन गामारे द्वारा निर्देशित और रियाज अनवर की मुख्य भूमिका वाली बॉलीवुड फिल्म हेमोलिम्फ, भारत में मुसलमानों के सामाजिक जीवन को दर्शकों के सामने लाने की कोशिश करती है , जिसपर गंभीरता से ध्यान देने की ज़रूरत है। यह फिल्म पारंपरिक रूप से बॉलीवुड में दिखाए गए मुस्लिम किरदारों से बहुत अलग है।

यह फिल्म अब्दुल वाहिद शेख के जीवन के अनुभवों पर आधारित है, जिसे मुंबई सीरियल धमाकों के झूठे मुकदमे के अंतर्गत दोषी ठहराया गया था, जिसके कारण उन्हें 9 साल की कठिन कैद, यातना और कारावास झेलनी पड़ी । हालांकि हेमोलिम्फ को विभिन्न स्थानों पर रिलीज़ किया गया है, पर कुछ दिनों पहले ‘ एसआईओ संवेदना वेदी’ द्वारा कोझीकोड के आशीर्वाद थिएटर में प्रीमियर शो के माध्यम इसे पहली बार केरल में प्रदर्शित किया गया है। ऐसे समय जब देश में हर तरफ हिंदुत्व प्रोपेगेंडा फिल्म का प्रचार प्रसार जारी है , एसआईओ की ओर से हेमोलिंफ जैसी फिल्म को प्रदर्शित करना यकीनन एक साहसिक कदम है।

फिल्म में अब्दुल वाहिद शेख का किरदार इस अहसास को साझा करता है कि भारत में रहने वाला मुसलमान राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है और राज्य की नजर में निर्दोष साबित होने तक दोषी है। फिल्म का कहानी की शुरुआत ही इस सीन से होती है जब आतंकवाद विरोधी दस्ता (एटीएस) अब्दुल वाहिद की तलाश में स्कूल पहुंचता है, जो कि एक स्कूल शिक्षक है और अभी तक मुंबई के एक भीड़भाड़ वाले इलाके में सामान्य पारिवारिक जीवन जी रहा था और उसे हिरासत में ले लेती है।

इसके एटीएस अधिकारियों द्वारा उनसे लगातार पूछताछ की गई और इस दौरान उन्हें गंभीर शारीरिक और मानसिक यातना भी दी गई। फिर उस पर दो पाकिस्तानी आतंकवादियों को शरण देने के आरोप में मुकदमा चलाया जाता है, जो असल में 2006 के मुंबई ट्रेन ब्लास्ट को अंजाम देने के लिए आए थे। इस तरह शेख को बारह अन्य मुस्लिम युवकों के साथ झूठे मुकदमों में जेल में डाल दिया जाता है। जेल में बंद इन लोगों की जिंदगी और उनकी कानूनी लड़ाई ही फिल्म का सीक्वल का अहम हिस्सा है।

फिल्म का मुख्य विषय यह है कि मुसलमानों के लिए सामान्य जीवन जीना लगभग असंभव है, विशेष रूप से उनके लिए जिन्हें झूठे मुकदमों में जेल में बन्द किया गया हो।

भारत में एक मुसलमान का जीवन किसी भी अन्य भारतीय की तुलना में कहीं अधिक असुरक्षित है, जब तक ऐसी कानून प्रवर्तन एजेंसियों मौजूद हैं और जिनके ऊपर हर एक नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है। ऐसा लगता है की किसी का सिर्फ मुसलमान होना ही इन एजेंसियों के पूर्वाग्रह आधारित क्रोध और नफ़रत झेलने के लिए काफी है ।

फिल्म आलोचनात्मक ढंग से ये दिखाती है कि जब भी मुस्लिम मुद्दों की बात आती है तो भारत की कानूनी व्यवस्था केवल एक कठपुतली नजर आती है है या फिर ये उत्पीड़क का पक्ष लेती है, चाहे वह कितना भी पारदर्शी और मजबूत क्यों न हो।

‘ हेमोलिम्फ ‘ एक अंग्रेजी का शब्द है जिसका अर्थ होता है – अदृश्य रक्त । फिल्म भारत में मुस्लिम जीवन के खून और आंसू की उसी अदृश्यता को उजागर करती है।

अब्दुल वाहिद शेख अपने ऊपर होने वाले नौ साल के राजकीय आतंकवाद के खत्म होने और उनके जेल से रिहा होने के एक साल के भीतर, ‘ बेगुनाह कैदी ‘ (मासूम कैदी) नामक पुस्तक प्रकाशित कर अपने संघर्ष को एक नाम देते हैं।

बाद में इस पुस्तक का अंग्रेजी सहित तीन भाषाओं में अनुवाद किया गया और यह इस फिल्म का आधार बना। वाहिद शेख इस सवाल को दोहराते हुए बताते हैं कि इतने सालों के बाद भी ऐसे बेगुनाह मुस्लिम युवकों को न्याय दिलाने में क्या बाधाएं हैं जो इसी तरह के मामलों में गलत तरीके से दोषी ठहराए गए हैं और अभी भी जेल में हैं। वह राज्य द्वारा बर्बाद किए गए ऐसे निर्दोष युवाओं के लिए मुआवजे के भुगतान के लिए भी सवाल उठाते हैं।

-Ansar K

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