लॉकडाउन की त्रासदी को दर्ज करती है ‘भीड़’

फ़िल्म में यह भी बहुत दिलचस्प तरीक़े से दिखाया गया है कि कैसे कोविड की महामारी के दौरान मीडिया की ग़ैर-ज़िम्मेदाराना कवरेज ने इस्लामोफ़ोबिया को आम किया और मुसलमानों की छवि को समाज में बदतर बना दिया। अचानक और अनियोजित तरीक़े से लगे लॉकडाउन से देश में जो कुछ घटा उसे बहुत-ही शानदार तरीक़े से इस फ़िल्म में दिखाया गया है। कहा जा सकता है कि ‘भीड़’ लॉकडाउन का दस्तावेज़ है।

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लॉकडाउन की त्रासदी को दर्ज करती है ‘भीड़’

सहीफ़ा ख़ान

कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए, 24 मार्च 2020 को, जब पहली बार देश में लॉकडाउन लगाने का ऐलान हुआ तब मैं अपने शहर से 400 किलोमीटर दूर अपने गृहनगर में अपने अम्मी-पापा के साथ मौजूद थी। दो दिन बाद हमारा वापसी का रिज़र्वेशन था लेकिन सभी ट्रेनें रद्द कर दी गई थीं। रोडवेज़ बसें भी बंद हो गयी थीं। घर वापस जाने का कोई रास्ता नज़र ना आने के कारण हम सब की रातों की नींद उड़ चुकी थी। बस एक ही धुन सवार थी कि किसी तरह अपने घर पहुंच जाएं। टी.वी. और इंटरनेट पर प्रवासी मज़दूरों की दिल दहला देने वाली घटनाएं लगातार सामने आ रहीं थीं जिन्हें देखकर घबराहट में मज़ीद इज़ाफ़ा होता जा रहा था।

आख़िरकार एक हफ़्ते के प्रयास के बाद हम लोग गाड़ी बुक कर घर आने में सफल हो गए। रास्ते भर प्रवासी मज़दूरों और दूसरे लोगों की क़तारें दिखाई देती रहीं। कोई पैदल चला जा रहा था, कोई किसी सवारी से, तो कोई ट्रक या लोडर जैसी गाड़ियों पर। रास्ते में जिसे जो सवारी दिखाई दे रही थी, वह उसे रोक कर थोड़ी दूर तक छोड़ने की मिन्नतें कर रहा था। दूसरी ओर ड्यूटी पर लगे पुलिसकर्मियों की भी दशा कुछ ठीक नहीं थी। कोरोना का ख़ौफ़ और ऊपर से आला अधिकारियों के निर्देश, दोनों की चिंता उनके चेहरों पर साफ़ झलक रही थी।

मेरे पापा के साथ मेरा वह आख़िरी सफ़र था। उसके छह महीने बाद वह हम सबको छोड़कर दुनिया से चल बसे। यह मेरी एक दुःख भरी और भावुक यात्रा थी, जिसे हम दोबारा कभी याद करने की और न ही अपनी भावनाओं को शब्दों में बयान करने की हिम्मत कर पाएं। लेकिन जब हमने तीन साल बाद अनुभव सिन्हा की फ़िल्म ‘भीड़’ देखी तो ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे उस सफ़र को रुपहले पर्दे पर उकेर दिया हो, पुरानी यादों को कुरेद दिया हो। इसमें दिखाए हर मंज़र और दुःख को हमने ख़ुद महसूस किया है।

अनुभव सिन्हा की यह प्रतिभा है कि वह आम जीवन की भावनाओं को बिल्कुल उसी तरह पर्दे पर उकेर देते हैं। फ़िल्म की पृष्ठभूमि में कोविड का लॉकडाउन है। सामान्तर रुप से एक ओर कई कहानियां साथ चलती हैं लेकिन सबका एक ही उद्देश्य है कि किसी तरह अपने घर वापस पहुंच जाएं। दूसरी ओर पुलिस तंत्र और कुछ चौकीदारों की कहानी है जो सिस्टम की भड़ास बेबस लोगों पर निकालने को मजबूर हैं।

एक मां है, जो अपनी बेटी को लेकर चिंतित है। एक बेटी है, जो अपने पिता को लिए घूम रही है। एक पुलिस वाला है, एक महिला जूनियर डॉक्टर है, जो इन सबको जोड़ने वाली कड़ी है। इन कहानियों के सहारे फ़िल्म कई मुद्दे उठाती है। वर्ग, जाति, धर्म के आधार पर भेदभाव और साथ में सरकारी पॉवर के रौब को कोरोना की पीठ पर लादकर बड़े ही मार्मिक अंदाज़ मे दिखाया गया है।

सूर्य कुमार सिंह टिकस के रूप में राजकुमार राव, एक पुलिस वाले की भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें एक चेक पोस्ट का प्रभारी तब बनाया जाता है, जब लॉकडाउन में हज़ारों लोग घर लौटने के लिए तमाम राज्यों की सीमाओं को पार करने की कोशिश कर रहे हैं। भूमि पेडनेकर एक जूनियर डॉक्टर रेणु शर्मा की भूमिका में हैं जो नीची जाति के सूर्य कुमार सिंह टिकस से शादी करना चाहती है। राजकुमार राव अपने रोल में प्रभावशाली हैं और अपने किरदार की पेचीदगियों को शानदार ढंग से पकड़ते हैं। भूमि पेडनेकर या पंकज कपूर के साथ उनके दृश्यों में, दर्शक यह महसूस करने पर मजबूर हो जाते हैं कि दो बेहतरीन कलाकार एक-साथ आए हैं और वो काम कर रहे हैं जिसमें वो माहिर हैं। सूर्य की कहानी इस बात की पड़ताल करती है कि हमारे समाज में जातिगत भेदभाव कितना गहरा है। पुलिस में रैंक बढ़ने के बावजूद, सूर्य लगातार पुलिस के भीतर और बाहर इस भेदभाव से दो-चार होता है। आशुतोष राणा ने भी बहुत ही शानदार अभिनय किया है।

‘भीड़’ में सबसे प्रभावी किरदार जिसका है वह है बलराम त्रिवेदी के रुप में पंकज कपूर का। बलराम त्रिवेदी एक कट्टर राष्ट्रवादी सोच रखने वाला व्यक्ति है जिसे इस लॉकडाउन ने बिल्कुल बेबस और असहाय बना दिया है। फिर भी वह अपने लोगों की ज़रूरतों के सामने अपने पूर्वाग्रहों को तरजीह देता है। दिलचस्प यह है कि निर्देशक अनुभव सिन्हा उसे एक ऐसे किरदार के रूप में चित्रित नहीं करते हैं जिसका हृदय परिवर्तन अचानक हो गया हो।

दीया मिर्ज़ा ने एक ऐसी महिला का किरदार निभाया है जो अपनी बेटी को एक हॉस्टल से लेने के लिए जाती है। इस सफ़र में वह अपनी बड़ी गाड़ी में आराम से सब-कुछ देखती है और सहानुभूति दिखाने की कोशिश करती भी है तो केवल अपने विशेषाधिकार के दायरे में ही रहकर।

फ़िल्म में जैसे-जैसे लोग राज्य सीमाओं पर बने चेक पोस्ट के पास क़तारों में लगते जाते हैं, उसके साथ-साथ पुलिस का ग़ुस्सा भड़कता है और जातिगत संघर्ष, वर्ग संघर्ष, सांप्रदायिकता और बहुत-से मुद्दे खुलते जाते हैं। फ़िल्म में यह भी बहुत दिलचस्प तरीक़े से दिखाया गया है कि कैसे कोविड की महामारी के दौरान मीडिया की ग़ैर-ज़िम्मेदाराना कवरेज ने इस्लामोफ़ोबिया को आम किया और मुसलमानों की छवि को समाज में बदतर बना दिया।

अचानक और अनियोजित तरीक़े से लगे लॉकडाउन से देश में जो कुछ घटा उसे बहुत-ही शानदार तरीक़े से इस फ़िल्म में दिखाया गया है। कहा जा सकता है कि ‘भीड़’ लॉकडाउन का दस्तावेज़ है। लेकिन सधी हुई स्क्रिप्ट के बावजूद कुछ सीन बोरिंग और कमज़ोर दिखाई पड़ते हैं, जिन्हें और बेहतर बनाया जा सकता था। फ़िल्म को ब्लैक एंड व्हाइट रखने का प्रयोग करके बड़ा रिस्क लिया गया है। अगर आप हक़ीक़त पर आधारित फ़िल्मों के शौक़ीन हैं और समाज के प्रति गहरी संवेदना रखते हैं, तो आपको यह फ़िल्म ज़रुर पसंद आएगी। लेकिन अगर आप कहानी में सस्पेंस ढूंढने के आदी हैं तो ‘भीड़’ आपको बोर कर सकती है।

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