पैग़ंबर मुहम्मद (स०) और उनके साथियों का पहला रमज़ान

इबादत और रोज़ा का मतलब दैनिक जीवन के कामों और अन्य अभ्यासों को छोड़ देना नहीं है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) रमज़ान में अपने दैनिक जीवन को बाधित न करने की कोशिश करते थे, और अगर उन्हें रोज़े के दौरान कुछ करना होता, तो वह करते थे। अपने कामों में वह रोज़े के नाम पर देरी नहीं करते थे।

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पैग़ंबर मुहम्मद (स०) और उनके साथियों का पहला रमज़ान

मूरत सोफ़ूग्लू

रेगिस्तान और आसपास के क्षेत्र में, जहां भोजन और पानी के स्रोत दुर्लभ थे, मदीना के पहले मुसलमानों ने पैग़ंबर मुहम्मद (सल्ल०) के मार्गदर्शन में पूरे दिन का रोज़ा रखना सीखा।

दुनिया भर के मुसलमान रमज़ान की तैयारी कर रहे हैं, जो इस्लाम में उपवास का महीना है। यह इस साल पहले पवित्र महीने की 1,399वीं वर्षगांठ होगी।

ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 624 ई० में, आज के सऊदी अरब के मदीना शहर में पहली बार रमज़ान मनाया गया था।

यह हिजरत का दूसरा वर्ष था, जिसकी इस्लामी इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका है। मक्का के बुतपरस्तों के दबाव में, मुसलमानों के इस छोटे से समुदाय को 622 ई० में शहर छोड़ कर, शरण के लिए मदीना जाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

पैग़ंबर मुहम्मद (सल्ल०) के निर्देशों के अनुसार, उनके साथियों, यानि पहले मुसलमानों ने हिजरत की शुरुआत की तारीख़ के साथ अपना कैलेंडर शुरू करने का फ़ैसला किया। यह एक बड़े परिवर्तन की शुरुआत को चिह्नित करता है।

मुसलमानों का पहला रमज़ान मार्च में पड़ा। यह वसंत का महीना था, जिसमें मदीना सहित पूरे अरब प्रायद्वीप में तापमान गर्मियों की तुलना में हल्का था। गर्मियों में तेज़ गर्म मौसम, रेगिस्तान और शहरी क्षेत्रों, दोनों को बुरी तरह प्रभावित करता था।

क़ुरआन कहता है, “ऐ ईमान वालों! रोज़ा तुम पर फ़र्ज़ किया गया है – जैसा कि तुमसे पहले के लोगों के लिए था – तो शायद तुम [अल्लाह के प्रति] सावधान हो जाओ”, मुसलमानों को निर्देश दिया गया कि उनसे पहले गुज़रे अन्य ईमान वालों की तरह वे भी रोज़ा रखें।

Hitit University में Islamic Divinity के प्रोफ़ेसर कासिफ हम्दी ओकुर के अनुसार, पैग़ंबर मुहम्मद (सल्ल०) को फ़रवरी 624 ई० में, या हिजरत के दूसरे वर्ष में शव्वाल के महीने में क़ुरआन की ये आयतें अवतरित की गईं थीं।

ओकुर टीआरटी वर्ल्ड को बताते हैं कि पैग़ंबर मुहम्मद (सल्ल०) और कुछ मुसलमान क़ुरआन की रमज़ान वाली आयतों से पहले भी मक्का में, विशेष महीनों में कुछ दिनों का उपवास करते थे, परंतु 30 या 29 दिनों तक बिना रुके रोज़ा रखना उन पहले मुसलमानों के लिए एक असाधारण अनुभव था।

वे कहते हैं, “पैग़ंबर मुहम्मद (सल्ल०) के समय के कुछ रिकॉर्ड बताते हैं कि पहले मुसलमानों को भी पहले वर्ष में रमज़ान के रोज़ों की आदत डालना कुछ कठिन था।” यह आध्यात्मिक रूप से अनुशासित एक मुस्लिम समाज (उम्मत), जो मानसिक और शारीरिक दोनों तरह की मुश्किलों से निपट सके, बनाने के लिए क़ुरआन के उपायों में से एक है।

रमज़ान वाली आयतों के अवतरण से कुछ पहले, मुसलमानों ने अपनी प्रार्थना करने की दिशा (क़िब्ला) को यरूशलेम (क़ुरआन में क़ुद्स) से मक्का के काबा की ओर बदल दिया। यह एक चौकोर संरचना है और इसका निर्माण, मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार, पैग़ंबर इब्राहीम द्वारा एक ईश्वर की इबादत के लिए किया गया था। ये सभी परिवर्तन पैग़ंबर मुहम्मद (सल्ल०) के अनुयायियों द्वारा मदीना में एक मज़बूत आधार स्थापित करने के बाद हुए।

प्रार्थना की दिशा बदलने और एक महीने के लिए निर्बाध रूप से रोज़ा रखकर, पहले मुसलमानों ने गहराई से महसूस किया कि वे उनके साथ मदीना में रह रहे अन्य एकेश्वरवादी समूहों, ईसाइयों और यहूदियों से अलग धार्मिक समुदाय थे। ओकुर के अनुसार, मुसलमानों को इस प्रकार स्वयं की पहचान के बारे में चेतना व एक मज़बूत आत्म-विश्वास प्राप्त हुआ।

इसके अलावा, पहला रमज़ान मदीना के मुसलमानों और मक्का के बुतपरस्तों के बीच पहले महत्वपूर्ण सैन्य संघर्ष यानि “बद्र की जंग” के साथ भी उल्लेखनीय रूप से जुड़ा हुआ है। हालांकि दोनों पक्षों में मिलाकर लड़ाई के कुल प्रतिभागी 1,200 सेनानियों से अधिक नहीं थे। मुसलमानों के पक्ष में इसके अंतिम परिणाम ने इस्लाम के ऐतिहासिक अस्तित्व को सुनिश्चित कर दिया, जिससे यह सदियों तक दुनिया भर में फलता-फूलता रहा।

लेकिन रोज़ा बिना अपवाद, सभी पर थोपा नहीं गया। प्रोफ़ेसर का कहना है कि क़ुरआन, जो हमेशा ईमान वालों के लिए उनके जीवन को सीधा और निष्पक्ष बनाने के लिए एक मध्यम मार्ग बनाए रखने का वादा करता है, बहुत बूढ़े, बीमार, गर्भवती महिलाओं और बच्चों आदि लोगों को रोज़े से छूट देने के लिए अपवाद रखता है।

क़ुरआन के अनुसार, यदि किसी मुस्लिम वयस्क के पास उपवास न करने के वैध कारण हैं, तो उसे हर एक दिन के लिए जिस दिन वह रोज़ा न रख सके, एक ग़रीब व्यक्ति को खाना खिलाना चाहिए। 

रमज़ान: एक नैतिक मैराथन

रोज़े की कठिनाइयों के बावजूद, यह एक मुसलमान की शारीरिक सहनशक्ति के साथ-साथ उसकी मनोवैज्ञानिक शक्ति का परीक्षण करता है, वैसे ही जैसे बड़ी मैराथन दौड़ को पूरा करने के बाद राहत की भावना। पैग़ंबर मुहम्मद ने वादा किया है कि रमज़ान ख़ुदा की ओर से बहुत सी बरकतें और माफ़ी लाता है।

ओकुर कहते हैं, “’उन बंदों पर हाय! जो रमज़ान के इस महीने में पहुंच गए और उन्हें माफ़ नहीं किया जा सका।”

रमज़ान और रोज़े के बारे में व्यापक रूप से लिखने वाले Dumlupinar University के Divinity Faculty के डीन अली सेलिक कहते हैं कि इस्लामी मान्यता में रोज़ा केवल खाने और पीने से ख़ुद को प्रतिबंधित करना नहीं है बल्कि ग़लत कामों से ख़ुद को रोकने का प्रयास करना है।

सेलिक टीआरटी वर्ल्ड को बताते हैं कि, “पैग़ंबर की सुन्नत में रोज़ा केवल भूख-युक्त इबादत का एक रूप नहीं है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) उपवास को एक ढाल के रूप में देखते हैं जो मुसलमानों को बुराई से बचाता है। लोगों के साथ संबंधों में अधिक धैर्य रखना, अपशब्दों से बचना आदि रोज़ा रखने वाले व्यक्ति की बुनियादी विशेषताओं में से एक है।” 

महान् मुस्लिम विद्वान मोहम्मद अल बुख़ारी द्वारा रिकॉर्ड की गई एक हदीस में रमज़ान के रोज़े के आध्यात्मिक पक्ष पर ज़ोर देते हुए कहा गया है, “अल्लाह को ऐसे आदमी की ज़रूरत नहीं है जो बुरे शब्दों और बुरे कार्यों को नहीं छोड़ता है, कि वह खाने और पीने को छोड़ दे।” – हदीस (पैग़ंबर मुहम्मद (सल्ल०) की कही हुई बातें)

नतीजतन, पैग़ंबर और उनके साथी रमज़ान में अन्य इबादतें बढ़ा देते थे। “विशेष रूप से, रमज़ान के आख़िरी 10 दिनों में, वे मस्जिद में एतिकाफ़ में करके इबादत में शामिल होना पसंद करते,” सेलिक कहते हैं। एतिकाफ़ का अर्थ है अपने आप को दूसरों से अलग करना, अपने जीवन की दिशा को बेहतर ढंग से समझने के लिए सांसारिक मामलों के बजाय इबादत करने के लिए अपना समय समर्पित करना।

ओकुर कहते हैं, प्रत्येक मानव गतिविधि को रमज़ान के कार्यों के अनुसार व्यवस्थित किया गया था क्योंकि शुरुआती मुसलमान रमज़ान को अपने आध्यात्मिक जीवन के लिए “केंद्रित” अवधि के रूप में देखते थे। “जब तुर्की में लोग पुराने रमज़ान के लिए अपने प्यार का इज़हार करते हैं, तो यह आमतौर पर पूर्व-आधुनिक समय को संदर्भित करता है, जहां रोज़े के महीने के अमल के अनुसार काम के घंटे भी व्यवस्थित किए जाते थे।”

लेकिन इबादत और रोज़ा का मतलब दैनिक जीवन के कामों और अन्य अभ्यासों को छोड़ देना नहीं है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) रमज़ान में अपने दैनिक जीवन को बाधित न करने की कोशिश करते थे, और अगर उन्हें रोज़े के दौरान कुछ करना होता, तो वह करते थे। अपने कामों में वह रोज़े के नाम पर देरी नहीं करते थे,” सेलिक कहते हैं।

प्रोफ़ेसर कहते हैं, दिलचस्प बात यह है कि बद्र की लड़ाई के लिए कूच के दौरान भी, जो रमज़ान के महीने में था, पैग़ंबर, जो मुसलमानों के सैन्य कमांडर भी थे, रोज़े से थे। इस्लाम में, उचित कारण के लिए जंग भी रमज़ान के दौरान रोज़े की तरह एक धार्मिक कर्तव्य माना जाता है।

सेलिक बताते हैं, मक्का की ओर मुसलमानों का ऐतिहासिक कूच (फ़तह मक्का), जब पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल०) और मुसलमानों के मूल शहर को बुतपरस्तों से जीता गया था, रमजान के दौरान ही हुआ, और यह रोज़े के महीने के दौरान भी पैग़ंबर के कड़े मेहनती रवैये को दर्शाता है।

उनका खाना क्या था?

आज के मुसलमानों और पहले मुसलमानों के बीच आज न केवल नैतिकता बल्कि उनके रोज़ा खोलने के रवैये के मामले में भी गंभीर दूरी है।

“रमज़ान के भोजन के मामले में हमारे और पैग़ंबर के साथियों के बीच गंभीर भिन्नता है। पहले मुसलमानों के पास भोजन करने का ऐसा अवसर नहीं था जैसा कि अब हमारे पास इसकी विविधता और मात्रा के मामले में है,” ओकुर कहते हैं।

मुसलमान अपने रोज़ा खोलने को इफ़्तार और भोर से पहले के भोजन को सुहूर कहते हैं। “अपने सहर के दौरान, वे शायद थोड़े से पानी के साथ कुछ खजूर खा लेते थे। यह बस इतना ही था,” प्रोफ़ेसर उस समय के सुहूर का वर्णन करते हुए कहते हैं, जो आज के मुस्लिम परिवारों के लिए लगभग अकल्पनीय है।

सेलिक कहते हैं, “हमारे पैग़ंबर का इफ़्तार का भोजन आजकल की विलासिता और बर्बादी से बहुत ही सरल था।” ओकुर कहते हैं, अगर उन्हें एक तरह का खाना मिल जाता है, तो वे इसे अपने इफ़्तार में पाकर ख़ुश होते। आज के इफ़्तार के दौरान तो नाना प्रकार के भोजन, जैसे सूप से लेकर चावल और अन्य व्यंजन जैसे कि फल और मिठाइयां शामिल होती हैं।

“उनके इफ़्तार और सुहुर बहुत ही सरल थे। वे अपना भोजन बनाने के लिए खजूर को आटे या पानी में मिलाकर पीस लेते थे। या वे एक दूसरा व्यंजन बनाने के लिए कुछ ज़ैतून के तेल के साथ भुना हुआ आटा मिला लेते थे,” वह कहते हैं।

लेकिन ऐसे लोग भी थे जिनके पास 624 ई० में मदीना में ऐसा भोजन भी नहीं था। परिणामस्वरूप, पैग़ंबर मुहम्मद (सल्ल०) ने आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति वाले मुसलमानों से आग्रह किया कि वे अन्य ग़रीब मुसलमानों को इफ़्तार पर आमंत्रित करें। इस आदेश ने, दोस्तों, रिश्तेदारों और ग़रीबों को आम इफ़्तार पर अपने भोजन को साझा करने के लिए आमंत्रित करने की मुस्लिम परंपरा के मज़बूत विकास का मार्ग प्रशस्त किया।

विशेष रूप से सुफ़्फ़ा जैसे लोग, जो पैग़ंबर के बेघर और अविवाहित साथी थे, जो मक्का से मदीना गए थे और पैग़ंबर से इस्लाम की शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया, वे इस तरह के भोजन का ख़र्च उठाने में असमर्थ थे। ओकुर कहते हैं, “पैग़ंबर ने अन्य मुसलमानों को सुफ़्फ़ा के लोगों की मेज़बानी करने और उन्हें अपने इफ़्तार पर पीछे न छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया।”

सेलिक कहते हैं, पैग़ंबर, जो रमज़ान में अन्य समय की तुलना में अधिक उदार होते थे, इफ़्तार के साथ-साथ सहर में भी ईमान वालों को अपनी मेज़ पर आमंत्रित करते थे और उन्हें दावत देते थे।

ओकुर निष्कर्ष के तौर पर कहते हैं, “लेकिन अंततः, सादगी के बावजूद, उनके इफ़्तार और सुहूर आज की तुलना में स्वस्थ और अधिक विनम्र थे।”

अंग्रेज़ी से अनुवाद: उसामा हमीद

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