इतने कमज़र्फ़ हो क्यों तुम जो बहकते जाओ!

इन चुनावों ने राजनेताओं के नैतिक पतन को खोलकर सबके सामने रख दिया। ये लोग आगे चलकर जब सत्ता के मद में चूर हो जाएंगे तो क्या गुल खिलाएंगे, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। एन.डी.ए. के नैतिक पतन पर प्रधानमंत्री रोक लगा सकते हैं, परन्तु वे भी हार के डर से इस बुराई में लिप्त हैं।

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नरेन्द्र मोदी (फाइल फोटो)

लोकतंत्र की मिसाल बेरंग पानी की सी है कि उसको जिस शराब में डालो, घुल-मिल जाता है। अमेरिका के अन्दर उसे पूंजीपतियों ने नीली शराब में मिला लिया, तो जापान में यह पीला शराब में मिल गयी। चीन के अन्दर उसको लाल शराब के अन्दर मिला दिया गया और मिस्र में यह हरे जाम में घुल गयी। इस्राईल में इसका रंग गुलाबी है और भारत के अन्दर फ़िलहाल केसरिया हो गया है। भारतीय संस्कृति के महान दार्शनिक मनु महाराज जब लोकतांत्रिक चोला पहन लेते हैं तो क्या कुछ होता है इसको चुनाव अभियान के दौरान देश की जनता देख रही है। भाजपा चूंकि सत्ता के मद में चूर है, इसलिए विभिन्न अवसरों पर इसका प्रदर्शन होता रहता है। गुजरात में जल संसाधन मंत्री कुंवर जी बावलिया इसकी अनोखी मिसाल हैं। कांग्रेस के विधायक के रूप में चुने जाने के बाद भाजपा में प्रविष्ट होने पर मंत्री बनाए जाने वाले बावलिया ने एक दिलचस्प बयान देकर साबित कर दिया कि सत्ता का नशा किस प्रकार सिर चढ़कर बोलता है।

महाशय जब कैंसर प्रभावित गांव में भाजपा प्रत्याशी का प्रचार करने के लिए पहुंचे तो गांव की महिलाओं ने शिकायत की कि केवल आधे गांव ही को पीने का पानी मिल पाता है। इसपर मंत्री महोदय ने इसका औचित्य यह बताया कि ऐसा इसलिए हो रहा है कि पिछली बार केवल 55 प्रतिशत गांववालों ने उन्हें वोट दिया था। अर्थात् जिसने वोट नहीं दिया, उसका पानी तक रोक दिया जाएगा। मंत्री महोदय ने ढिठाई से कहा, ‘‘मैं सरकार में हूं। मेरे पास जल संसाधनों का मंत्रालय है। अगर आवश्यकता पड़ी तो मैं गांव में पानी की सप्लाई के लिए करोड़ों रुपये पास कर सकता हूं। आप सब लोगों ने मुझे वोट क्यों नहीं दिया?’’ देश में लोकतंत्र के ध्वजावाहकों ने फ़िलहाल क्रूरतम राजाओं को शर्मिन्दा कर दिया है, क्योंकि वे भी ऐसे अत्याचारपूर्ण कृत्य नहीं करते थे। इस रवैये को हार्दिक पटेल ने ‘बदले की राजनीति’ कहा है, तो बिलकुल सही कहा है।

कुंवर जी बावलिया के मूर्खतापूर्ण बयान के परिप्रेक्ष्य में सबसे पहली बात तो यह है कि जब कोई प्रत्याशी चुन लिया जाए तो वह किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे चुनाव क्षेत्र के लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। वे ख़ुद कांग्रेस का हाथ थामकर चुने गये थे, उसके बाद गुलाटी मारकर कमल थाम लिया। इसके बावजूद राज्य सभा में सदस्यता बनी रही, क्योंकि अपने चुनाव क्षेत्र के प्रतिनिधि हैं। 2014 में भाजपा को औसत रूप से 56 प्रतिशत वोट का इस्तेमाल करनेवालों में से 31 प्रतिशत का समर्थन प्राप्त है। यह कुल मतदाताओं का 18 प्रतिशत बनता है। इसके बावजूद इस अल्पसंख्या के द्वारा गठित सरकार भारत सरकार कहलाती है। दूसरी बात यह है कि सरकार दरबार चलाने के लिए टैक्स सारे लोगों से वुसूल किया जाता है। इसमें भेद नहीं किया जाता कि आपने हमें वोट नहीं दिया तो आप टैक्स भी न दें। उन गांववालों को अगर पानी दिया जाता तो सरकार उसकी क़ीमत वुसूल करती और जो छिछला एवं तंगदिल जनता की मौलिक आवश्यकताओं के बारे में सौदेबाज़ी करे, उसको सत्ता में रहने का अधिकार नहीं है।

‘आदर्श गुजरात’ में फ़तेहपुरा के विधायक रमेश कटारा तो कुंवर जी बावलिया से दो हाथ आगे निकल गये और धमकी दे डाली कि ‘‘भाजपा के लिए वोटिंग में कोई ग़लती नहीं होनी चाहिए। ‘मोदी साहब’ ने पोलिंग बूथ पर निगरानी के लिए कैमरे लगवा रखे हैं। भाजपा को किसने वोट दिया, कांग्रेस को किसने वोट दिया, यह सब दिखायी देता है। आधार कार्ड और सभी कार्ड में आपका फ़ोटो है। अगर आपके बूथ से कम वोट पड़ते हैं तो उनको पता चल जाएगा कि किसने वोट नहीं डाला और फिर आपको काम नहीं मिलेगा।’’

कटारा ने तो ख़ैर मतदाताओं को मोदी से डराया, लेकिन रेलवे और आई.टी. के केन्द्रीय मंत्री मनोज सिन्हा ने इसकी भी आवश्यकता नहीं समझी। ग़ाज़ीपुर में डींग मारते हुए सिन्हा बोले, ‘‘जो भी व्यक्ति भाजपा कार्यकर्ता की ओर उंगली उठाएगा, उसको केवल ‘चार घण्टे’ में इसकी क़ीमत अदा करनी पड़ेगी। कोई भी भाजपा कार्यकर्ताओं को तिरछी निगाह से नहीं देख सकता, ऐसी मूर्खता करनेवाले की आंखें नहीं रहेंगी।’’

कहावत है कि ‘ख़रबूज़े को देखकर ख़रबूज़ा रंग बदलता है’। यह छूत की बीमारी भाजपा के साथ-साथ उसकी सहयोगी पार्टियों को भी लगने लगी है। बिहार के सुशासन बाबू नितीश कुमार ने एक रैली में महिलाओं से अपील कर दी कि ‘‘अपने पति से वोट देने के लिए कहें। अगर एन.डी.ए. को वोट देते हैं तो उनको भरपेट भोजन कराएं, परन्तु यदि वे एन.डी.ए. के लिए वोट नहीं करते हैं तो उनको पूरा दिन भूखा रखें।’’ राष्ट्रीय राजनीति इस हद तक गिर जाएगी यह किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि एक मुख्यमंत्री खुले आम पति-पत्नी में राजनैतिक मतभेद के आधार पर बिगाड़ पैदा करे। इन चुनावों ने राजनेताओं के नैतिक पतन को खोलकर सबके सामने रख दिया। ये लोग आगे चलकर जब सत्ता के मद में चूर हो जाएंगे तो क्या गुल खिलाएंगे, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। एन.डी.ए. के नैतिक पतन पर प्रधानमंत्री रोक लगा सकते हैं, परन्तु वे भी हार के डर से इस बुराई में लिप्त हैं।

राष्ट्रीय स्तर के इस चुनाव के दौरान चुनाव आयोग को आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में भाजपा नेताओं के ख़िलाफ़ सबसे अधिक 29 शिकायतें मिलीं। उसके बाद कांग्रेस के 13 लीडरों, समाजवादी पार्टी के 2 और एक-एक टी.आर.एस. एवं बी.एस.पी. के ख़िलाफ़ है। एक समय था जब दिवंगत अटल जी को गोविंदाचार्य ने ‘मुखौटा’ कह दिया था और फिर डरकर ‘मुकुट’ कह दिया। राजनैतिक समीक्षकों में इसपर मतभेद बना रहेगा कि वे मुकुट थे या मुखौटा, लेकिन अगर उन्होंने अपने चेहरे पर कोई मुखौटा चढ़ा रखा था, तो उसे ख़ूब निभाया। ऐसा नहीं कि उनपर राजनैतिक संकट नहीं आया। गृहमंत्री के पद पर आसीन होने के बाद पार्टी अध्यक्ष होते हुए ख़ुद लोकसभा चुनाव हार गये। सदन में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद 13 दिनों बाद उनकी सरकार गिर गयी। उसके 13 महीने बाद जयललिता ने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी और आख़िरकार सोनिया गांधी ने सरकार से बेदख़ल करके मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया। इसके बावजूद अटल जी ने अपनी गरिमा बनाए रखी। मोदी जी पहली बार प्रधानमंत्री बने और जैसे ही उन्हें लगा कि अब दोबारा चुनाव जीतना मुश्किल है, अपनी औक़ात पर आ गये। इसे कहते हैं उदारहृदयता और संकीर्ण मानसिकता का फ़र्क़। अटल जी कवि थे। अगर वे ज़िन्दा होते तो दुल्हन बेगम का एक शेर ज़रा से बदलाव के साथ मोदी जी की भेंट करते-

मिस्ले-गुल जाओ, जिधर जाओ, महकते जाओ
इतने कम ज़र्फ़ हो क्यों तुम जो बहकते जाओ

लेख : डॉ. सलीम ख़ान

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