आंदोलनों की क्रोनोलॉजी को समझिए!

दूसरी लड़ाई इसके समानांतर ही पूरे देश में संविधान बचाओ की लड़ाई चरम पर है। जो जेएनयू के फी हाईक के बाद खड़ा हुआ है। वैसे ये मुद्दा आसाम से जुड़ी हुई एक पुरानी समस्या थी। जो बंगलदेश से आये घुसपैठियों को बाहर करने को लेकर था। इस समस्या को हल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में NRC को लागू किया गया। इसके बाद पूरे असम में अपनी नागरिकता को प्रूफ करने के लिए लम्बी लाइन लगी। आम भारतीयों को लगा कि एक राज्य का मुद्दा है और वर्षों से लंबित है अच्छा है बीजेपी की आसाम सरकार हमेशा के लिए इस मुद्दे को अब दफन कर देगी...

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चार साल पुरानी बात है। HCU की वह कहानी जहां एक दलित छात्र को आत्महत्या पर मजबूर किया गया। जनवरी का ही महीना था रोहित वेमुला नाम का एक दलित छात्र जातिवादी प्रताड़ना की वजह से अपने ही हॉस्टल के रूम में आत्महत्या कर लेता है। देश भर में विरोध प्रदर्शन होने लगते है। रोहित PHD का छात्र था। दलित समाज से उच्च शिक्षा में ग्रहण करने में भारत में अपनी आबादी के लिहाज से सबसे कम है। जिसे बिल्कुल नगण्य भी माना जा सकता है। इसलिए संविधान ने भारत के पिछड़े इन समुदायों के लिए आरक्षण की विशेष व्यवस्था की है। ताकि सबको संविधान सम्मत बराबरी का दर्जा दिया जा सके। संविधान को लागू किये जाने के 7 दशक के बाद भी यह समुदाय वहीं पर खड़ा है। आज भी देश के अल्पसंख्यक दलित आदिवासी समुदाय रोटी कपड़ा और मकान जैसे मूलभूत आवश्यकताओं के त्रिकोण में उलझा हुआ है।
इस घटनाक्रम के बाद सरकार घिरने लगती है। दलित समाज से जुड़े संगठन पूरे देश में विरोध प्रदर्शन करने लगते हैं। एक तरह से उस वक्त दलित समाज क्रांति की मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। देश की सभी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में छात्रों की आवाजों में रोहित का नाम जुड़ जाता है। JNU में भी ABVP को छोड़कर तमाम दलित संगठन के साथ साथ सभी वाम और दूसरे सामाजिक परिवर्तन का सपना देखने वाले SIO एवं fraternity जैसे छात्र संगठन इस प्रतिरोध को एक आवाज देकर मजबूती प्रदान कर रहे थे। सभी राजनीतिक विपक्षी दलों ने भी इस घटना पर विरोध जताना शुरू किया। ऐसा लग रहा था कि देश मे हाशिये से धक्का देकर पीछे किये गए समुदायों के दिन उबरने वाले हैं। ये सदी पिछड़े समुदायों के लिए संजीवनी बूटी का कार्य करेगा। आदिवासियों को जल जंगल जमीन वापस मिलेगा। इस पर इन समुदायों का मालिकाना हक मिलने से कोई रोक नहीं सकता। दलितों से राजनीतिक छुआछूत का अब छूमंतर होना तय है। इसके साथ ही देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय से बहुसंख्यक आबादी में फैलाया डर भी अब रफ्फूचक्कर हो सकता है। इस्लामोफोबिया का देश में राजनीतिक भोग अब बन्द हो सकता है। क्योंकि इस आंदोलन से बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय का भी लगाव था। ऐसा भी कह सकते हैं कि कई मुस्लिम नामांकरण वाले छात्र एवं समाजी संगठन इस आंदोलन से लगातार जुड़ रहे थे। इसका अंदाजा जिग्नेश मेवानी के राजनीतिक उभार से लगा सकते हैं। दलित मुस्लिम गठजोड़ इस आंदोलन के बाद ज्यादा मजबूत हुआ है।
सरकार दवाब में आ गई थी। इस दवाब का अंदाजा तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की सदन में दिये गए भाषण से लगा सकते हैं। इन्होंने सास बहू वाली सीरियल की अदाकारा की भूमिका में रोधोकर पिछड़े वर्गों से सहानुभूति दिखाने की असफल कोशिश करती नजर आई। इसके बाद तो बीजेपी नेताओं प्रवक्ताओं में अचानक से दलित प्रेम का उभार हुआ। इस घटना की एक एक कड़ी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बजाय सोशल मीडिया के जरिये प्रसारित हो रहा था। आमलोगों तक इसके जरिये विभिन्न शहरों विश्विद्यालयों में हो रहे प्रदर्शन की खबरें एक दूसरे को मजबूती प्रदान कर रही थी।
अचानक से जेएनयू में एक महीने बाद 9 फरवरी में 2016 को एक बवाल खड़ा होता है इस बवाल की बड़ी वजह अफ़ज़ल गुरू की बरसी पर JNU कैंपस में कुछ संगठनों के द्वारा प्रोग्राम करने से था। इस प्रोग्राम में लेफ्ट से जुड़े छात्र संघ नेताओं ने हिस्सा लिया था। कन्हैया कुमार उस वक्त JNUSU के अध्यक्ष थे। अचानक से मेन स्ट्रीम मीडिया में इस प्रोग्राम से संबंधित एक विडियो का प्रसारण होने लगता है। जिसमें ये दिखाने की कोशिश की जाती है कि अफजल गुरू के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में देश विरोधी नारे लगाए गए हैं। इस नारे की अगुवाई लेफ्ट विंग से जुड़े छात्र संघ के नेताओं ने की। पूरा आरोप कन्हैया कुमार अनिर्बान भट्टाचार्य उमर खालिद और कुछ कश्मीरी छात्रों के अलावा 46 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। सबसे दिलचस्प बात यह है कि उस घटना के बाद से आजतक बीजेपी की सरकार होने के बावजूद भी तीन सालों में सरकार की मान्यताओं के मुताबिक आरोपित के खिलाफ कोई स्पष्ट कार्यवाही नहीं कर पायी। आज भी देश में उठने वाले तमाम आवाजों में JNU से उठने वाली आवाज सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इस घटना ने JNU को रोहित के बजाय अपने समर्थन में आवाज बुलंद करने पर मजबूर कर दिया। क्योंकि इनके सारे प्रोग्रेसिव लीडर्स जेल भेज दिए गए थे। देश के अमन पसंद लोगों के लिए JNU को बचाना पहली प्राथमिकता बन गई। मेन स्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया में एक तरफ save JNU और दूसरी तरफ Shutdown jnu पर आरोप प्रत्यारोप चलने लगा। इस धीरे धीरे रोहित की मजबूत आवाज को लोग भूलने लगे। सोशल मीडिया तक से सबका ध्यान रोहित वेमुला से हटने लगता है। लोग रोहित वेमुला को भूलने लगते है और लगभग भूल भी जाते हैं इस तरह एक बड़े समुदाय के हक़ हक़ूक़ की लड़ाई को सरकार समर्थित फेब्रिकेटेड लड़ाई में आजतक उलझा कर रखे हुए हैं। आज भी मेन स्ट्रीम मीडिया में जब भी जब भी JNU के किसी मुद्दे को लेकर बहस होती है तो चैनल के प्राइम टाइम पर कन्हैया कुमार के इस मुद्दे पर ही ज्यादा बहस होती है। बड़ी आसानी से कन्हैया कुमार भी उसी ट्रेप में फंसकर गैर जरूरी बहस को सरकार विरुद्ध मोड़ने में नाकाम साबित होते हैं।
इस बार फिर ऐसी ही दो लड़ाई आमने सामने है। जिसमें एक सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई संविधान के साथ साथ देश के हर नागरिक के सम्मान को बचाने को लेकर है और दूसरी लड़ाई जेएनयू के फी हाईक के मुद्दे को जिसपर अभी किसी की तवज्जो नहीं थी। ये पिछले कई दिनों से सरकार, जेएनयू प्रशासन और जेएनयू छात्रसंघ के बीच चल रहा एक मुद्दा था। इससे किसी को इंकार नहीं है कि ये मुद्दा मेन स्ट्रीम में नहीं आए। जेएनयू के छात्र नेताओं को इतनी चालाकी तो सीखनी होगी कि आप का आंदोलन सरकार समर्थित फेब्रिकेटेड आंदोलन में तब्दील ना हो जाय। वैसे ये तौल मोल का जमाना है हर कोई अपना नफा नुकसान देखता है। ये हमेशा कोशिश होती है कि हमको कम से कम नुकसान हो।
दूसरी लड़ाई इसके समानांतर ही पूरे देश में संविधान बचाओ की लड़ाई चरम पर है। जो जेएनयू के फी हाईक के बाद खड़ा हुआ है। वैसे ये मुद्दा आसाम से जुड़ी हुई एक पुरानी समस्या थी। जो बंगलदेश से आये घुसपैठियों को बाहर करने को लेकर था। इस समस्या को हल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में NRC को लागू किया गया। इसके बाद पूरे असम में अपनी नागरिकता को प्रूफ करने के लिए लम्बी लाइन लगी। आम भारतीयों को लगा कि एक राज्य का मुद्दा है और वर्षों से लंबित है अच्छा है बीजेपी की आसाम सरकार हमेशा के लिए इस मुद्दे को अब दफन कर देगी। इसलिए असामी हिन्दू मुस्लिम सभी ने NRC का स्वागत किया। लेकिन जब NRC की पहली लिस्ट जारी हुई तो लगभग 40 लाख लोगों को नागरिकता से बाहर निकाल दिया। इस लिस्ट में भी बड़े पैमाने पर असामी और बंगाली हिंदू मुस्लिम सभी के नाम थे। यहाँ तक कि 80 प्रतिशत नाम हिंदू समुदाय से थे। इसके बाद फिर सुप्रीम कोर्ट ने गाइडलाइन जारी कर फॉरेन ट्रिब्यूनल की स्थापना की गई। नागरिकता खो चुके लोगों के लिए फिर से नागरिकता पाने के लिए FT का विकल्प दिया गया। इसके बाद भी जो फाइनल लिस्ट जारी किया गया उसमें भी 60 प्रतिशत से ज्यादा लोग हिंदू समुदाय से ही हैं। आसाम में बीजेपी की सरकार चारों तरफ से घिर गई। असामीज ने सरकार पर फर्जी तरीके से लोगों को नागरिकता देने का इल्जाम लगाया है। वहां के लोगों का कहना है कि NRC के द्वारा बड़े पैमाने पर असामी लोगों ने भी अपनी नागरिकता खो दी है। वो ये भी कह रहे हैं कि हम किसी भी घुसपैठियों को चाहे वे हिन्दू हों या मुस्लिम हों उसे आसाम में नहीं रहने दिया जाय। आज भी वहां इस मुद्दे को लेकर हिंसक प्रदर्शन जारी है। भाजपानीत सरकार आसाम और नॉर्थईस्ट के राज्यों में बैकफुट पर आ चुकी है।
इस प्रकार राजनीतिक उठापटक के बीच 2019 के आम चुनाव में फिर से बीजेपी की सरकार बन गई। चुनाव पूर्व घोषणा पत्र में बीजेपी ने नागरिकता संसोधन कानून का जिक्र भी अपनी चुनावी सभाओं में खुलकर कर रहे थे। अमित शाह कई बार बंगाल की सभा में कह चुके हैं कि पूरे देश में NRC लागू किया जाएगा। देश के राष्ट्रपति ने संयुक्त सदन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हमारी सरकार की प्रथमिकता में NRC को लागू करना है। बहरहाल सरकार बनते ही कई ऐसे कानून पास किये जिसका जबरदस्त विरोध आम जनता ने किया। लेकिन विरोध का हर एक स्वर सरकारी साम दंड भेद के आग या तोे नतमस्तक हो गया या बहुत कमजोर है।
नागरिकता कानून को लेकर आसाम अभी शांत भी नहीं हुआ है और पूरे देश में सरकार हठधर्मिता के साथ अपने ही नागरिकों की नागरिकता पर सवाल खड़े कर रही है। बिना किसी परिपक्व बहस के संसद के शीतकालीन सत्र में दोनों सदनों से नागरिकता कानून संसोधन बिल पास करवाया उसके बाद राष्ट्रपति से मुहर लगने के बाद इसे कानून का रूप दे दिया है। जिस दिन लोकसभा में यह बिल पास होता है उसी दिन से इसके खिलाफ दिल्ली में प्रदर्शन शुरू हो गए। राज्यसभा से बिल पास होते ही इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन देश के कई हिस्से में छिटपुट होने लगे। इन छिटपुट विरोध प्रदर्शन के बीच देश की प्रतिष्ठित विश्वद्यालय में से एक जामिया मिल्लिया इस्लामिया ने अपने कैम्पस में CAA के खिलाफ़ विरोध करना शुरू किया इसी दौरान यहाँ विरोध कर रहे छात्रों ने संसद भवन मार्च का एक कॉल जारी किया। 13 दिसंबर शुक्रवार का दिन था हजारों की संख्या में जामिया छात्रों ने दिन के तीन बजे मार्च को लेकर संसद भवन की ओर बढ़ना शुरू किया। लेकिन जामिया से थोड़ी ही दूर पर होली फेमिली के पुलिस ने मार्च को रोकने के लिए बेरिकेट कर रखा था लेकिन छात्रों ने उस बेरिकेट को तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश करने लगे इतने में ही पुलिस ने छात्रों पर लाठीचार्ज कर दिया आंसू गैस के गोले छोड़ना शुरू कर दिये। कई छात्र इस दिन घायल हुए। लाठीचार्ज चार्ज के बाद जामिया के छात्र ने अपने कैंपस में विरोध करना जारी रखा। फिर 15 दिसम्बर को जामिया के आस पास के आम लोग भी प्रदर्शन करना शुरू कर दिये। इस दौरान भी पुलिस ने प्रदर्शन कारियों पर आंसूगैस के गोले छोड़े। चूंकि जामिया से बाहर हो रहे प्रदर्शन में जामिया के छात्र नहीं थे यूनिवर्सिटी के बाहर हो रहे प्रदर्शन में ज्यादातर लोग ओखला क्षेत्र के आम आदमी थे। इस दिन भी प्रदर्शन हिंसक हो गया और पब्लिक और पुलिस दोनों तरफ से ईंट पत्थर चलने लगे। इसी दौरान पुलिस की तरफ से खड़ी एक DTC बस में आग लगाई गई। वीडियो में साफ दिख रहा है कि ये आग पुलिस ने खुद से लगाई है। यहीं से पुलिस ने 15 दिसम्बर के शाम को जामिया के छात्रों को सबक सिखाने का मन बना लिया। क्योंकि सरकारी तंत्र को इस बात का आभास हो गया था कि जामिया के छात्रों को अगर यहीं पर नहीं रोका गया तो सरकार के खिलाफ विरोध पूरे देश में फैल जाएगा। पुलिस की कार्यवाही से ऐसा लग रहा था कि ये आदेश ऊपर से है। शाम को अंधेरा छाते ही पुलिस ने यूनिवर्सिटी एरिया में क्रेक डाउन शुरू कर दिया। इसके बाद क्या हुआ सबको मालूम है यहीं से CAA के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन ने जोर पकड़ लिया। देखते ही देखते हर शहर गली मोहल्लों में आज़ादी के नारे लगाने शुरू हो गए। जो आज भी बदस्तूर जारी है। आम खास सबने मिलकर इस कानून का विरोध करना शुरु कर दिया। इस आंदोलन की सबसे खास बात यह रही कि इस बार हिज़ाब पसंद मुस्लिम महिलाओं ने इस आंदोलन को देश के कई हिस्से में लीड करना शुरू किया। शाहीन बाग और जामिया में शुरू हुआ आंदोलन इसका नायाब उदाहरण है। उसके अलावा दूसरे अन्य शहरों में भी आम मुस्लिम समुदाय के लोग सबसे आगे बढ़कर संविधान बचाओ का नारा बुलंद कर रहे हैं। AMU में इस कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होने लगा और ठीक 15 दिसम्बर को यहां भी पुलिस ने क्रेक डाउन किया सैकड़ों छात्र घायल हो गए। इसके बाद देश की सभी बड़ी और प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटियों में आंदोलन आग की तरह फैल गई। BHU के छात्रों ने दीक्षांत समारोह में डिग्री लेने से मना कर दिया। यहां के लगभग 50 छात्रों पर गंभीर धाराओं के तहत पुलिस ने FIR कर दिया।
विपक्ष के राजनीतिक दलों को इतने बड़े आंदोलन की भनक तक नहीं लगी थी। इन्हें आभास नहीं था कि ये आंदोलन इतना बड़ा और विकराल रूप धारण कर सकता है। लेकिन विपक्ष की क्षेत्रीय पार्टियों ने भी धीरे धीरे इस आंदोलन को समर्थन देना शुरु कर दिया। फिर कई दलित आदिवासी और पिछड़े समुदाय के संगठनों ने इस आंदोलन को समर्थन देना शुरू किया।
सरकार पर दवाब बढ़ने लगा। दिल्ली चुनाव की पहली बीजेपी की चुनावी सभा में मोदी ने अपने मंच से रैली को सम्बोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां अल्पसंख्यक समुदाय के धोखा दे रही है। NRC की कहीं कोई बात सरकार की तरफ से की गई है। देश में कहीं भी डिटेंशन कैम्प नहीं है। CAA का NRC से कोई सम्बंध नहीं है। प्रधानमंत्री का भाषण खत्म होते होते अमित शाह का संसद में दिया गया वक्तव्य सोशल मीडिया पर आने लगा। इसके अलावा राष्ट्रपति का अभिभाषण मीडिया को दिये गए इंटरव्यू। असम के डिटेंशन कैम्प के तस्वीरों के साथ साथ वीडियो भी तैरने लगे। बीजेपी जैसी सत्तासीन राष्ट्रीय पार्टी की बात चंद घंटों में ही झूठी साबित होने लगी।
CAA बिल की एक्ट की भूमिका में आने के बाद भी झारखण्ड में चुनाव चुनाव जारी था अमित शाह झारखंड के चुनावी सभा में हर जगह NRC को पूरे देश में लागू करने की बात कह रहे थे। बीजेपी झारखण्ड चुनाव में हताश होकर बैकफुट पर शुरू से ही थी। बीजेपी नेताओं को यह एहसास था कि NRC और राम मंदिर के हल हुए मुद्दे से हम फिर से वापसी करेंगे। लेकिन यहाँ भी राम मंदिर और NRC ने बीजेपी का साथ छोड़ दिया और बीजेपी की मजबूत जनाधार वाला राज्य हाथ से आसानी से निकल गया। यहाँ के लोगों ने बीजेपी की लोकलुभावन राष्ट्रीय मुद्दों से ज्यादा क्षेत्रीय दलों की स्थानीय मुद्दों पर ध्यान दिया। जिसका नतीजा हेमंत सोरेन के मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी से समझ में आता है।
फिलवक्त CAA पर सरकार की बदहवास होती बयानबाजी से बनते दवाब का अंदाजा लगा सकते हैं कि सरकार को इस एक्ट के समर्थन में मिसकॉल के लिए नम्बर जारी करना पड़ा। ऐसा पहली बार भारतीय राजनीति में देखा गया है कि पूर्ण बहुमत की सरकार अपने बल पर कानून बनाने के बाद भी लोगों से समर्थन की सरकारी अपील जारी कर रही है। साथ ही बार बार प्रधानमंत्री खुद कह रहे हैं कि किसी भी भारतीय को डरने की जरूरत नहीं है। यह एक्ट नागरिकता छिनने के लिए नहीं है बल्कि नागरिकता देने के लिए है।
जेएनयू छात्रसंघ और लेफ्ट यूनिटी की तरफ से फी हाईक के मुद्दे पर पिछले महीने से ही प्रदर्शन हो रहा है। छात्रों ने क्लास बायकॉट किया हुआ है। इसलिए सरकार को लगा कि CAA और NRC के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन पर अब क्रेक डाउन करना अब आसान नहीं था। इसलिए JNU पूर्वनियोजित हमला करवाया गया ठीक रोहित वेमुला के केस की तरह JNU अचानक सुर्खियों में आता है और सभी का ध्यान पिछड़े समुदायों से हट जाता है इस तरह एक जिंदा आंदोलन जिंदगी की अंतिम भेंट चढ़ जाता है। इसमें साजिश किसने रची कौन कौन लोग इसमें शामिल रहे। इसके दूरगामी परिणाम क्या हुए ये सब विश्लेषण का विषय है। आजतक इस पुराने मुद्दे को हल क्यों नहीं किया गया? जबकी लगातार तबसे सरकार JNU के आज़ादी समर्थकों के खिलाफ रही है।
वक्त निकाल कर ऐसे घटनाक्रम का भी विश्लेषण करें लेकिन CAA NRC और NPA के खिलाफ हो रही लड़ाई को मद्धिम नहीं होने दें। क्योंकि विपक्ष बहुत शातिर है, हो सकता है सरकार के समर्थन में वो लोग भी हों जो आपके साथ भी खड़ा हो, लेकिन मजबूरी में हिंदू राष्ट्र की भी वकालत करता हो। बार बार ये बहुसंख्यक आबादी को ये भी बताया जा रहा है या वे ये समझ रहे हैं कि CAA मुसलमानों को सबक सिखाने के लिए बहुत जरुरी है।
जेएनयू की लड़ाई और उसका समर्थन भी ज़रूरी है इसलिए CAA NRC NPR की लड़ाई ज़्यादा ज़रूरी है बल्कि यही असल मुददा है असल मुददे से नज़र हटनी नहीं चाहिए…

शाहिद सुमन

उप संपादक, छात्र विमर्श

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