बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद फैसले पर रिव्यू पिटीशन दायर करना संवैधानिक अधिकार है, न्यायालय की अवमानना नहीं

मुस्लिम पक्ष अपने अधिकार और न्याय के लिए आख़री हद तक कानूनी लड़ाई लड़ रहा है तो इस में बुरा क्या है? अगर फैसला इसके विपरीत आता तब दूसरा पक्ष भी तो यही करता। मुस्लिम पक्षकारों द्वारा लिये गए पुनर्विचार याचिका दायर करने के फैसले पर न बुरा मानना चाहिए और न ही बवाल मचाना चाहिए।

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9 नवंबर का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐतिहासिक दिन था, इस दिन भारतीय न्यायपालिका ने बरबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद पर एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने से दुनिया भर के बहुत से लोगों को न सिर्फ चकित कर दिया बल्कि उनके मन में निराशा का भाव पैदा हो गया यहां तक कि ज़ोर शोर से ये सवाल भी उठने लगे कि ये फैसला कहीं भारतीय लोकतंत्र पर बहुसंख्यकवाद से ग्रस्त होने की मुहुर तो नहीं? हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के ख़िलाफ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनलॉ बोर्ड और जमीयत उलमा-ए-हिंद ने पुनर्विचार याचिका दाख़िल करने का ऐलान किया है जिस पर सवाल उठाए जा रहे हैं। पुनर्विचार याचिका सिर्फ न्याय प्रणाली का हिस्सा है बल्कि न्याय व्यवस्था की इस अवधारणा के बिल्कुल ऐन मुताबिक़ है कि “सौ गुनाहगार भले ही छूट जाएं लेकिन एक बेगुनाह को सज़ा नही होनी चाहिए”।
बाबरी मस्जिद राम जन्म भूमि विवाद कभी भी इतना मामूली मुकदमा नही रहा। अगर ऐसा होता तो इस विवाद पर हजारों लोगों की जानें न गयीं होतीं। भारत की गंगा जमुनी तहजीब और भाई चारा दांव पर न लगा होता। ये नहीं भूलना चाहिए कि भारत एक धार्मिक पृष्ठभूमि रही है। यहां के बसने वाले कभी भी अपने धर्म से समझौता नहीं कर सकते, चाहे वो किसी भी धर्म से हों। आप इस मुकदमे की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगा सकते हैं कि लोगों ने गोलियां तक खाई हैं और कई परिवार नफ़रत की भेंट चढ़ कर तबाह व बर्बाद हो गए। कई राजनीतिक दल इस मामले को भुनाकर सत्ता तक पहुंचकर ज़ीरो से हीरो बन गए। ये ही वजह है कि पूरी दुनिया की नजरें इस फैसले पर थीं।
इस लिए कोई भी पक्ष वही करता जो आज मुस्लिम पक्ष ने किया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीअत उलेमा ए हिन्द का ये क़दम सराहनीय है। आज़ादी की लड़ाई में महत्तवपूर्ण भूमिका निभाने वाली जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने पुनर्विचार का फैसला लेकर इंसाफ की लड़ाई में एक और मजबूत क़दम उठाया है भला वो इस मामले पर राजनीति क्यों करेंगे? जिन्होंने राजीव धवन जैसे क़ाबिल वकील को साथ लेकर न्याय की लड़ाई लड़ी है, अब उन्हीं लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दाख़िल करने का फैसला किया है तो इस पर हाय तौबा क्यों? मुस्लिम पक्ष अपने अधिकार और न्याय के लिए आख़री हद तक कानूनी लड़ाई लड़ रहा है तो इस में बुरा क्या है? अगर फैसला इसके विपरीत आता तब दूसरा पक्ष भी तो यही करता। मुस्लिम पक्षकारों द्वारा लिये गए पुनर्विचार याचिका दायर करने के फैसले पर न बुरा मानना चाहिए और न ही बवाल मचाना चाहिए। यदि किसी पक्ष को लगता है कि अदालत ने सिर्फ फैसला सुनाया है, न्याय होना अभी बाकी है तो भारतीय संविधान के अनुसार उसे इंसाफ के लिए आखरी हद तक लड़ाई लड़ने का पूरा अधिकार है। और यह अधिकार उसे संविधान ने दिया है। इसी लिए कहा जाता है कि सौ गुनाहगार भले छूट जाएं, एक बेगुनाह को सज़ा नहीं होनी चाहिए।
जो लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनिर्विचार याचिका दायर करने के आलोचक हैं, शायद वे दुनिया भर की अदालतों से वाक़िफ नहीं हैं। यहां पर अमेरिका के काले समुदाय के 14 वर्षीय बच्चे जॉर्ज स्टिनी का जिक्र करना जरूरी है। इस बच्चे पर अमेरिका के गोरा समाज की दो बच्चियों की हत्या का आरोप था, इस पर मुकदमा चला एक बार फैसला सिर्फ दस मिनट में हो गया और दूसरी बार इस मुकदमे के फैसले में साठ साल लग गए। पहले मुकदमे में जार्ज स्टिनी को दोषी करार देते हुए सज़ा-ए-मौत दे दी गई, लेकिन दूसरी बार चले मुकदमे में जॉर्ज स्टिनी को दो बच्चियों के कत्ल के आरोप से बरी कर दिया गया। जब पहली बार जॉर्ज का फैसला सुनाया जा रहा था तब अमेरिका में भारी तनाव था, इस सांप्रदायिक तनाव का प्रभाव अमेरिका की अदालत के फैसले में भी साफ नज़र आया। निर्दोष होते हुए भी, बिना किसी सबूत के जॉर्ज स्टिनी को इलैक्ट्रिक चेयर पर बैठाकर सजा ए मौत दे दी गई। लेकिन इसके साठ साल बाद जॉर्ज की फाईल फिर से खोली गई। 2004 में Northeastern University School of Law ने इस केस को दोबारा जांच करने की मांग की, अदालत ने इस मांग को मान लिया, दोबारा जांच हुई और इस जांच में पाया गया कि दो श्वेत बच्चियों की हत्या के जुर्म में सजा-ए-मौत पाने वाला जार्ज निर्दोष था, अमेरिका की एक अदालत ने 2014 में जार्ज स्टिनी को क़त्ल के आरोप से बरी कर दिया, मगर अफसोस अदालत सांप्रदायिकता के कोढ़ से ग्रस्त अमेरिका की अदालत के श्वेत न्यायधीश, वकील, राजनेता और जल्लाद 16 जून 1944 को ही जॉर्ज स्टिनी को मौत की सजा दे चुके थे।
फ्रांस के राजा लुई सोलहवें और उनकी पत्नि के मामलों से लेकर सद्दान हुसैन और शहीद ए आज़म भगत सिंह के मामले में अदालतों ने सजाऐं जरूर दीं हैं। लेकिन न्यायप्रिय लोगों का साफ मानना है कि इन लोगों के साथ इंसाफ नहीं हुआ। तथ्यों की अनदेखी की गई, या फिर अदालत ने भेदभावपूर्व अथवा बहुसंख्यकवाद से प्रभावित होकर फैसला सुनाया है।हालांकि इसमें सिर्फ जॉर्ज स्टिनी को मरणोपरांत न्याय मिल पाया है लेकिन अधिकतर लोगों के मामले आज भी ज्यों के त्यों हैं। सवाल यह है कि जब संविधान में यह अधिकार दिया हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर की जा सकती है तब इस अधिकार का इस्तेमाल करने वालों की आलोचना क्यों की जा रही है? अदालत के फैसले को स्वीकार न करके उसपर पुनिर्विचार याचिका दाखिल करना नागरिकों का अधिकार है यह न्यायलय की अवमानना नहीं बल्कि अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल है। लेकिन इसकी गारंटी नहीं है कि न्याय मिल ही जाएगा, लेकिन न्याय के लिये संघर्ष करना जिंदा समाज एंव न्याय प्रिय होने का सबूत है।

-अब्दुल माजिद निज़ामी
(लेखक हिंद न्यूज़ ग्रुप के मुख्य संपादक हैं)

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