इस्लाम : दीन ए फितरत की एक झलक

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इंसान का गिरोह जब भी एक साथ रहा चाहे प्राचीन समय के कबीलों के रूप में हो या आधुनिक युग के राष्ट्र- राज्य(nation-state) के रूप में, उन्हें मानव जीवन को स्थिर रखने एवं उसके विकास के लिए किसी न किसी कानून की आवश्यकता पड़ी. पुराने समय में नैतिक मूल्यों पे अधिक ज़ोर था और इसके स्तंभ धार्मिक एवं आध्यात्मिक आस्था के सहारे ज़मीन पे गहरी बुनियाद रखते थे परंतु आधुनिक युग में ये नैतिक मूल्य एवं कानून जो मानव को भीतर से किसी अपराध या गुनाह करने से रोकते थे, वो निरर्थक हो गए और कुछ नये मूल्यों का तो आविष्कार किया गया लेकिन वो भी इंसान को मात्र एक राज्य की सीमा के अंदर ही देखना चाहते थे. इस जीते जागते इंसान को विशिष्ट रूप से नहीं देखा गया और यही कारण है कि जहाँ तक आधुनिक युग में एक राज्य अपनी कानून व्यवस्था से इंसान को बेलगाम होने से रोक सकता था वो काफी सीमित था और बाह्य भी. भीतर से जो आवाज़ इंसान को रोकती थी वो तो आज भी रोकती है परंतु वो विश्वास एवं आस्था के दिये जलते थे उसका ईंधन और उसका रोगन आस्था एवं धार्मिक चेतना हुआ करती थी लेकिन आज वो दिये मात्र मंदिर- मस्जिद में या मानव जीवन के बहुत सीमित दायरे में रह गया है और भौतिकवादी जीवन की आँधियों से इसके दिये जो कभी धरती को प्रकाशमान करते थे अब बुझते दिख रहे हैं.धर्म क्यों अप्रचलित हो गए?विभिन्न धर्मों ने इंसान के मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग कुछ यूँ प्रस्तुत किया था जिससे सामाजिक व्यवस्था को बहुत नुकसान हुआ और वह मानव प्रकृति एवं स्वभाव के विपरीत था. उदाहरण के तौर पे सन्यास का प्रचलन, या ब्रह्मचर्य जीवन व्यतीत करने को भलाई के रूप में देखा गया और इसके आगे उसे ईशभय के गुणों में गिना जाने लगा परंतु इतिहास इसका साक्षी है चाहे वह ईसाई सन्यासियों का आपस में महिलाओं के साथ संबंध हो (या हिंदू मत में देवदासियों का शोषण करने वाले पुरोहित) . वह इंसान की मूल प्रवृत्ति के विरुद्ध थी और सामाजिक रूप से ऐसी शून्यता को जन्म दिया जिससे गुणहीन लोगों को सत्ता और ताकत हासिल जिससे वो असहाय व निचले तबके पे ज़ुल्म करते थे.यह समस्या क्यों आई? और इन समस्याओं का आज की आधुनिक समस्याओं से क्या सरोकार है? इस्लाम की भूमिका क्या हो सकती है?यह समस्या तब आई जब इंसान ने अपनी व्यक्तिगत सफ़लता और कामयाबी (मोक्ष) को इस विचार से जोड़ा कि वह आध्यात्मिक रूप से समूह से अलग हो कर या समाज से अलग हो कर ही सफल हो सकता है परंतु वह यह भूल गया कि वो स्वयं एक परिवार में जन्म लेता है और वह परिवार या खानदान भी एक समाज में रह कर ही अपने आपको सुरक्षित महसूस करता है. यदि परिवार या खानदान भी समाज से कट जाए तो वह भी विकसित न हो पायेगा. समाज को भी व्यक्ति विशेष की आवश्यकता है और व्यकितगत रूप से भी इंसान को एक समाज की आवश्यकता है और यही बात पुरुष और स्त्री जाति के लिए भी सही जान पड़ती है. जब ये दो जातियाँ एक दूसरे की शरीरिक आवश्यकता को पूर्ण करते हैं तभी वो समाज के एक नये सदस्य को जन्म दे पाते हैं. अंततः ये बात पूर्ण रूप से समझ आती है कि व्यक्ति विशेष से समाज और समाज से राष्ट्र का नाता बहुत गहरा है और यह एक दूसरे को तभी विकसित करते हैं जब इनमें संतुलन हो. इस्लाम ने इसी लिए व्यक्ति विशेष को एक समूह में रहने को प्रेरित किया है और इससे बढ़ कर सन्यास को नाम मात्र की भी जगह नहीं दी और न ही इसको धर्मपरायण से जोड़ा बल्कि विवाह संबंध को आधा दीन (धर्म) कहा. ये बात यदि दूसरे धर्मों की तुलना में इस्लाम को इंसान के स्वभाव से मेल खाती है और सामाजिक जीवन को व्यक्तिगत जीवन पर तरजीह दी है. सौदा बेचते समय उसकी कमी- खामी न बताने वाले को गुनाहगार कहा गया है. यहाँ तक कि एक मुसलमान व्यक्ति को एक जमात (समूह) के रूप में नमाज़ अदा करने की तालीम दी गयी है और ये बात कुरान और हदीस में बहुत स्पष्ट रूप में व्यक्त कर दी गयी है. कुरान में जगह जगह पे “नमाज़ क़ायम करो” कहा गया है (न कि “नमाज़ अदा करो”) अथवा हदीस शरीफ में साफ तौर से मुहम्मद (सल्ल०) ने कहा कि जमात (सामूहिक रूप) से नमाज़ अदा करने में 27 गुना ज़्यादा सवाब है.इसके अलावा नमाज़ में मस्तिष्क एवं ह्रदय के साथ हमारा शरीर भी हरकत में होता है जो साफ तौर पे जीवन की इस वास्तविकता को दर्शा रहा होता कि मनुष्य आत्मा और उसके भौतिक शरीर का योग है. अतः मुसलमान ईश्वर के सामने अपने पूरे अस्तित्व के साथ नमस्तक (सजदा रेज़) होते हैं.मध्यकालीन युग की तरह एक बार फिर वही समस्या आधुनिक युग में भी आन पड़ी है. अब मनुष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिए जीवन व्यतीत करने जंगलों में तो नहीं जा बसते परंतु वो सामाजिक रूप से कट कर व्यक्तिवादी जीवन गुज़ारना चाहते हैं. वह प्रभाव जो कभी धर्मपरायणता की भावना के साथ इंसानों के बीच देखने को मिला था एक बार फिर वह उदारवादी जीवन गुज़ारने वालों में भी दिखने लगा है जिससे सामाजिक स्तर पे बहुत सी समस्याओं को जन्म दिया. इस युग में संसार के किसी भी कोने में ये प्रभाव स्पष्ट रूप से देखने को मिल जायेगा. इस बिंदु से उदारवाद एवं सेकुलरिज्म का जन्म हुआ था.यही कारण था कि जब पश्चिम में मानव जीवन में बसुकूनी थी और वो त्राहि त्राहि कर रहे थे तब पश्चिमी विचारकों ने साफ तौर पे धर्म को गिरजाघरों तक सीमित रखने या नास्तिकता को अपनाने का फैसला किया और इन विचारों को सेकुलरिज्म और लिबरलिज्म का नाम दिया जो सदा ही प्रगतिशील माना जाता रहा. और आज इन विचारों को सशक्त रूप से पूरे जगत में न सिर्फ प्रचार- प्रसार के द्वारा बल्कि तोप के गोलों और मिसाइल से उन देशों में स्थापित किया जहाँ लोग उसको अपनाना नहीं चाहते थे. इसके अतिरिक्त इन विचारों को इंसानों के हड्डी- गोश्त तक में उतारने की कोशिश की, उसमें मीडिया एवं एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के योगदान को नकारा नहीं जा सकता जिसने आज खुद सेकुलर-लिबरल एवं संपूर्ण जगत की सुपरपॉवर अमेरिका तक अपने नागरिकों की बसुकूनी दूर नहीं कर पा रहा है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है 1940-50 के दशक में जन्मी 60% महिलाएं 20 साल की उम्र में विवाहित हो गयीं परंतु 1990 के बाद में जन्मी महिलाओं में मात्र 10% महिलाएं थी जो 20 साल की उम्र में शादी कर सकीं और 50% जीवनपर्यंत अविवाहित रहना चाहती हैं. (डाटा: नेशनल सर्वे ऑफ फैमिली ग्रोथ). यह था वह डाटा जो साफ़ रूप से यह दर्शाता है कि आधुनिक युग में भी मनुष्य को उन ही समस्याओं का सामना है जिससे पहले उसका पाला पड़ चुका है परंतु पश्चिमी विचारकों के मस्तिष्क से निकले विचार इन समस्याओं का समाधान न कर सके बल्कि अब हमारे सामने हमारे आस पास भारतीय उपमहाद्वीप में भी युवा पीढी़ विवाहित जीवन को बोझल महसूस करते हैं और ज़िम्मेदारियों से भागते दिखते हैं और यह स्थिति मुसलमान युवाओं में भी बहुत तेजी से बढ़ी है जिसके कई कारण हैं जो यहाँ पे प्रस्तुत करना संभव नहीं परंतु वह सभी कारण कहीं न कहीं व्यक्तिवादी जीवन गुज़ारने और उदारवाद के विचारों जुड़े हैं. ऐतिहासिक रूप से लगभग सभी समाजों में, अधिकांश महिलाओं की शादी 25 वर्ष की आयु में हुई. समाज की ऐसी संस्था , जैसे विवाह, पितृत्व, जैसे कि एक विस्तृत परिवार को बनाए रखना, लोगों पर कर्तव्य रखते हैं। कर्तव्यों के लिए बलिदान की आवश्यकता होती है, वे मज़ेदार नहीं हैं, वे आपकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कम करते हैं। उदारवाद इस बात को पसंद नहीं करता.इस्लाम पुरुष और स्त्री दोनों को समान रूप से ज़िम्मेदार बनाता है. और जल्द से जल्द समाज का एक्टिव मेंबर बनने को प्रेरित करता है और बालिग होने पे उसके सारे कर्मों के लिए उत्तरदायी होने की तालीम देता है. बालिग होते ही जल्द से जल्द वैवाहिक जीवन शुरू करके समाज की इकाई के रूप में समाज का अहम अंग बन जाने को कहता है और अपना आधा धर्म पूर्ण करके पाकीज़ा जिंदगी गुज़ारने को मोटिवेट करता है. वर्तमान समय में बहुत बड़ी दिक्कत ये भी है कि मनुष्य की यौन प्रवृत्ति जिसने ईसाई सन्यासियों की धर्मपरायणता को नहीं छोड़ा वो आज के गैर ज़िम्मेदार युवाओं को क्या छोड़ता. यही कारण है आज के समाज में पुरुष और स्त्री 30-30 साल की उम्र तक विवाह तो नहीं कर सकते परंतु वह 15-15 साल की उम्र में गिर्ल्फ्रेंड-बॉयफ्रेंड बना के अपनी इच्छा की पूर्ति कर सकते हैं.इसका एक मात्र हल इस्लाम हो सकता है जो कि दीन ए फितरत है, जो मानव प्रवृत्ति के अनुरूप है, जो व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से भी भली भाँति जानता है और उनको एक समाज और एक राज्य के रूप में भी वह दिशानिर्देश देता है और इसीलिए तो यह है दीन ए फितरत जो हमारे कृपालू ईश्वर की ओर से है. जिसने हमे बनाया और “जिसने बनाया क्या वह ही न जानेगा! “

शफीक़ुर रहमान (उत्तर प्रदेश)

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