पुस्तक समीक्षा : करकरे के हत्यारे कौन? भारत में आतंकवाद का असली चेहरा

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भारत में राजनीतिक लोगों द्वारा हिंसा और आतंकवाद फैलाने का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन इसके केंद्र में सिर्फ मुस्लिम आतंकवाद को देखा जाता था। वर्ष 1990 में हिंदुत्ववादी शक्तियों के उदय होने पर यह प्रकाश में आया कि हिंसा और आतंकवाद सिर्फ मुस्लिम संगठनों द्वारा नहीं फैलाया जाता। यह किताब ऐसे ही विषय पर आधारित है, इसमें 26 /11 आतंकवादी हमले का भी वर्णन किया गया है। 
368 पन्नो की यह किताब भारत में फर्जी ‘इस्लामिक आतंकवाद’ की धारणा को तोड़ती है। यह उन संगठनों के बारे में पता लगाती है, जिसकी जांच पड़ताल महाराष्ट्र ए.टी.एस के मुखिया आई.पी.एस हेमंत करकरें ने की थी,और इस हिम्मत का नतीजा उनको अपनी जान की आहुति देनी पड़ी।यह किताब जो साफ कहती है- यह ‘ब्राह्मणवादियों’ का ‘ब्राह्मणवादी आतंकवाद’ है ,ना कि ‘इस्लामीवादियों’ का ‘इस्लामिक आतंकवाद’। 
पूर्व वरिष्ठ आई.पी.एस अधिकारी एस.एम.मुशरिफ जिन्होंने तेलगी घोटाले का भंडाफोड़ किया था, जब उन्होंने मुस्लिम आतंकवाद के परदे के पीछे नजर डाली तो वह चौक गए। उन्होंने ऐसी शक्तियों को देखा जिन्होंने पर्दे के सामने अलग चेहरा रखा था और पर्दे के पीछे उनके चेहरे कुछ और थे। दरअसल ये इस्लामिक आतंकवाद नहीं बल्कि ब्राह्मण आतंकवाद था, जो इस्लामिक वेशभूषा धारण करके अपने काम को अंजाम देता था और इसका ठीकरा भारत के मुसलमानों पर फूटता था। मुस्लिम इलाकों से बहुत से नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया जाता था। यह कृत दशकों से चला आ रहा था। मगर जब हेमंत करकरे ने इन्हीं शक्तियों का भंडाफोड़ किया तो भारत में इस्लामिक आतंकवाद के अलावा भी आतंकवाद के चेहरे दिखे।किस तरह भारत में कई जगहों पर बम ब्लास्ट किए जाते थे और फिर उस में फर्जी तरीके से मुस्लिम समुदाय के लोगों का नाम जोड़ दिया जाता था। एक ऐसा माहौल बनाने की कोशिश थी और लगभग ऐसी शक्तियां सफल भी हो रही थी, जो आतंकवाद का सिर्फ और सिर्फ इस्लामिक चेहरा दिखाने की कोशिश में थी। किसी भी घटना को यदि उसमें बम गोले का इस्तेमाल हुआ है तो पूर्ण धारणा बना कर मीडिया भी कहने लगता था कि इसमें किसी मुस्लिम संगठन का हाथ है। और जांच से पहले ही फैसला आ जाता था। 
मगर जब मालेगांव बम ब्लास्ट हुआ और उसमें इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल वर्तमान भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की निकली ,तो फिर हेमंत करकरे की जांच पड़ताल उसी दिशा में चलती गई और फिर एक ऐसा मोड़ आया ,जब उन्होंने भारत के कई रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर व संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों को इस संगठन से जुड़ा हुआ पाया ,जो ऐसी आतंकवादी गतिविधियों में शामिल था ।कई लैपटॉप ,पेन ड्राइव और इलेक्ट्रॉनिक्स एविडेंस हाथ लगे जो इस तरफ इशारा करते थे यह शक्तियां भारत के लिए बहुत खतरनाक हैं। 
इस पुस्तक में भारत की गुप्तचर एजेंसी जैसे कि ” रा “और “आईबी “तथा “मीडिया “की भी मानसिकता को दर्शाया गया।किस तरह ब्राह्मणवादी शक्तियां आईबी तथा मीडिया पर कब्जा कर बैठी हुई हैं। इस पुस्तक में भारत की पुलिस व इंटेलिजेंस एजेंसी किस तरह कार्य करती है इसको भी दर्शाया गया है,और फाइलें किस स्तर से किस स्तर पर जाती हैं,इसको भी बखूबी समझाया गया है।इस पुस्तक में 26/11 के हमले का दोषी भारत की गुप्तचर एजेंसी आईबी को भी बताया गया है ,क्योंकि आइबी ने ही इंफॉर्मेशन राज्य पुलिस को नहीं दी जिसकी वजह से 26/11 जैसी घटना हो गई ।और इसका परिणाम यह हुआ कि भारत ने हेमंत करकरे जैसा अधिकारी वह उनकी टीम को खो दिया। इस घटना के पीछे भी इन्हीं ब्राह्मणवादी शक्तियों को बताया गया है।  ब्राह्मणवादी शक्तियां आईबी की मदद से कार्य करती हैं और इनके कारिंदे जो आईबी में मौजूद है भारत की गुप्तचर जानकारी देते रहते हैं।कई उदाहरण से भारत की आईबी को इस ब्राह्मण वादी संगठन से जुड़ा हुआ दर्शाया गया है, जैसे पूर्व आईबी के डायरेक्टर के भाई इस संगठन मे उच्च पद पर थे, और कई आई- बी के वरिष्ठ अधिकारी सेवानिवृत्त होने के बाद इस संगठन के सदस्य बने। यह संगठन भारत के संविधान पर भी विश्वास नहीं रखता। ऐसी ही कई बातें इस पुस्तक में बताई गई हैं। 368 पन्नों की इस किताब में कुल 11 चैप्टर है। यह किताब काफी आसान भाषा में लिखी गई है, ऑफलाइन और ऑनलाइन या किताब ली जा सकती है ,फ्लिपकार्ट अमेजॉन जैसे ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफार्म पर भी या किताब मिल रही है। ₹250 की इस किताब मे हमे बहुत सी जानकारियां मिलती हैं जो कि हमारे लिए लाभकारी हो सकती है। 
एस.एम.मुशरिफ महाराष्ट्र के पूर्व आई.जी पुलिस जिन्होंने अब्दुल करीम तेलगी फर्जी स्टांप पेपर को उजागर किया था।1975 में व महाराष्ट्र लोकसेवा आयोग माध्यम से पुलिस उपाधीक्षक बने और 1981 में आई.पी.एस प्रमोट हुए।एस.एम.मुशरिफ को 1994 में राष्ट्रपति पदक से नवाजा गया, शानदार सेवा के लिए उन्हें डीजीपी द्वारा प्रतीक चिन्ह भी दिया गया और उनके काम को वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा सराहा भी गया। 

समीक्षक : अबु सुफ़ियान
इलाहबाद विश्वविद्यालय

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