लाल सिंह चढ्ढा

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फ़िल्म समीक्षाएं

लाल सिंह चड्ढा

1:-लाल सिंह चड्ढा एक उद्देश्य रहित फ़िल्म है। शायद यही इस फ़िल्म इसका सबसे बड़ा दोष है। मनोरंजन तो है ही नहीं लेकिन अगर फ़िल्म के द्वारा कुछ कहना चाहा गया है तो वह भी सिरे से ग़ायब है। इसकी एक वजह डर हो सकता है।

फ़िल्म में, इमरजेंसी, ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी हत्या कांड, दिल्ली की सिख विरोधी नस्ल कुशी, रथ यात्रा, बाबरी मस्जिद शहादत, बॉम्बे ब्लास्ट, करगिल जंग, अन्ना मूवमेंट सब कुछ दर्शाया गया है लेकिन ये सभी कुछ सेंस से ख़ाली है। क्यों? क्योंकि फिल्म किसी डर की वजह से पक्ष नहीं लेती। कोई बात नहीं कहती। अंततः यह केवल सामान्य ज्ञान बन कर रह जाता है।

हां, लेकिन एक विलेन है। वही बॉलीवुड का घिसा पिटा विलेन। पड़ोसी मुल्क, धर्म, ख़ास तौर पर इस्लाम धर्म। फ़िल्म में बड़ी चालाकी से पॉपुलर नैरेटिव में फ़िट होने वाला अंतर्राष्ट्रीय विलेन मुस्लिम आतंकवाद को बना दिया गया है। 72 हूरों के लिए बरगलाते हुए सफ़ेद दाढ़ी वाले मौलाना मौजूद हैं। और अंत में वही घिसा पिटा मानवतावादी हीरो भी है जो धर्म पे नहीं मानवता पे विश्वास करता है।

देखा जाए तो फ़िल्म कुछ चीज़ों को छोड़ती हुई भी चलती है या यूं कि टच नहीं करना चाहती। जैसे गुजरात दंगे। शायद इसलिए कि सत्ता में ‘वे’ हैं। इसी प्रकार एंटी–सिख जेनोसाइड में सिखों को पकड़-पकड़ कर मारने और जलाने वालों के कपड़े उस समुदाय विशेष को प्रदर्शित नहीं करते जिनके ये कारनामे थे। बल्कि उन्हें कुर्ता-पजामा पहनाया गया है। ताकि कपड़ों से दंगाइयों की पहचान करने वाले नैरेटिव में बाधा न पड़ जाए।

फ़िल्म की हिरोइन महोदया को भी घिसी-पिटी स्क्रिप्ट ही मिली। ग़रीब घर से हैं, तो बड़ी होकर पैसा कमाने के लिए जो कुछ करना पड़े करने के लिए तैयार हैं, और अंततः एक ‘मुसलमान’ डॉन से, जिसके कनेक्शन ‘दुबई’ तक हैं, अपना शारीरिक–मानसिक शोषण (बेटी बचाओ) करवा लेने के बाद वापस अपने गांव पलट आती हैं।

कुल मिलाकर हमें यह लगा कि यह एक कायरता से परिपूर्ण और उद्देश्य से ख़ाली फ़िल्म है।

  • उसामा हमीद

2:-फ़ॉरेस्ट गम्प की बॉलीवुड रीमेक ‘लाल सिंह चड्ढा’ के किरदार के द्वारा पूरी ‘भारतीय सभ्यता’ के निचोड़ को सामने रख दिया गया है। यहाँ ‘भारतीय सभ्यता’ को विशेष संदर्भ में समझने की ज़रूरत है जिसमें करुणा है, मासूमियत है, दया है, जीवन के प्रति अदम्य आस्था है, ग्रामीण संस्कृति का गुणगान है, और सत्य की असत्य पर जीत का उत्सव है। यहाँ कहना ज़रूरी है कि यह कथित सभ्यता किस वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है। यह कथित भारतीय सभ्यता एकआयामी दृष्टि का परिणाम है जहाँ कोई अंतर्विरोध और जटिलता नहीं है। सिर्फ़ शुभ की अदम्य आकांक्षा है और अपने वर्गीय-जातीय (सवर्ण) हितों की रक्षा का कुटिल अभियान मात्र है। जहाँ न जातिगत द्वेष है (और अगर है भी तो साथ ही साथ उसे बैलेंस करने के लिए ‘कड़ी निंदा’ जैसे ब्रह्मास्त्र और मानवीयता का सद्गुण भी है), न अल्पसंख्यकों को लगातार अन्य की तरह देखने की क़वायद का कोई भीषण प्रतिरोध। जहाँ विवाह और अपने वीर्य से उत्पन्न संतान की महिमा है, प्रेम के उच्च मानदण्ड और प्रतीक्षा के सुतून हैं, बिगड़ी हुई स्त्री की घर वापसी के प्रति अदम्य कारकर्दगी और आस्था है।

जहाँ इमरजेंसी, चौरासी के सिख विरोधी दंगे, ऑपेरशन ब्लू स्टार, इंदिरा गाँधी की हत्या, राममंदिर आंदोलन, आडवाणी की रथ यात्रा, बाबरी विध्वंस, मण्डल कमीशन, उदारीकरण, सट्टा बाज़ार, हिंदी फ़िल्म उद्योग और माफ़िया अंडरवर्ल्ड के जटिल संबंध, कॉर्पोरेट पूंजीवादी मॉडल और संस्कृति उद्द्योग, साम्प्रदायिकता, कारगिल युद्ध, आतंकवाद, अन्ना हज़ारे इत्यादि ऐतिहासिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य केवल समय के बदलाव का सूचक भर हैं उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया-अन्तःक्रियाओं की जटिल दुनिया से पैदा हुई समस्याएँ केवल एक चश्म-ए-ज़दन का फ़ुसूँ भर है। जिसे एक आम और मासूम भारतीय अपनी सत्य-असत्य, नैतिक-अनैतिक, भला-बुरा जैसी सरलीकृत बाइनरी में रख कर आसानी से समझने का ढोंग कर आगे बढ़ सकता है।

जहाँ बम्बई सीरियल बम विस्फ़ोट और दाऊद की दुनिया तो है लेकिन गुजरात का 2002 नहीं हैं, ज़किया जाफ़री की भू-लुण्ठित आह नहीं है, बिलक़ीस बानो का कारुणिक विलाप और न्याय की लड़ाई का थकाऊ संघर्ष नहीं है। और अंततः हार कर हताशा में गिरने की कोई आवाज़ नहीं है।

क़ायदे से इस फ़िल्म का नायक एक दलित या मुसलमान को होना चाहिए था फिर इस दुनिया को देखने की मासूम और सुविधाजनक दृष्टि कैसे फट-फट कर ख़ून उगलती उसे देखना दिलचस्प होता। अगर सच में फ़ॉरेस्ट गम्प का रिमेक होना था इसे तो अमरीकी गोरे-काले के अमानवीय विभाजन को भारतीय परिप्रेक्ष्य इसी तरह दिया जा सकता था।

जैसा कि 15 मिनट के डिस्क्लेयमर में ये बार-बार कहा गया कि ये एक काल्पनिक फ़िल्म है जिसका सच्चाई से कोई वास्ता नहीं और इसके बनाने वालों का कोई राजनीतिक निहितार्थ नहीं है दरअसल ये अपने आप में एक स्पष्ट राजनीतिक निहितार्थ को दर्शाता है। वरना इन पांच दशकों की कथा को उसकी जटिलताओं को खोलने का कोई प्रयास हुआ होता तो ये सच में एक बड़ा काम होता जो याद रह जाता लेकिन जैसा कि ये समय है उसमें लाल सिंह चड्ढा बनकर अपने मासूम सपनों के पीछे भागना ही सबसे सुविधाजनक रास्ता बचा है। मैं सोच रहा था अगर एक मुसलमान ट्रेन में बैठकर अपने साथ हुए किसी दंगे का ज़िक्र कर रहा होता तो क्या तब भी उसके प्रति सहयात्रियों की वैसी ही प्रतिक्रिया हुई होती जैसी कि फ़िल्म हमें दिखाती है जब लाल सिंह चढ्ढा अपने 84 के दंगों की स्मृतियों को सबसे साझा करता है।

दोस्तो ! यहाँ सिर्फ़ जाति, वर्ग और धर्म बदलने से ही देखने की समूची दृष्टि बदल जाती है। इतनी आसान नहीं है ये दुनिया! बहरहाल, इस फ़िल्म की कामयाबी यही है कि बहुत से लोग इन पांच दशकों के इतिहास पर बात करने लगे हैं चाहे सतही रूप से ही सही। और आमिर ख़ान एक अल्पसंख्यक पहचान के साथ इस मुश्किल इलाक़े में इससे अधिक साहस भी क्या कर सकता था !

  • अदनान कफ़ील दरवेश

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