ख़ज़ाना

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खजाना

हॉल अतिथियों से खचाखच भर चुका था।
आज शाम एक बहुत ही महत्वपूर्ण पुस्तक का विमोचन होने वाला था।
दर्शक बड़ी बेचैनी से पुस्तक के विमोचन का इंतजार कर रहे थे।
माननीय अतिथि गण एक-एक करके पधार रहे थे. बड़ी सुसज्जित महफ़िल सजी हुई थी। ठीक उसी समय कार्यक्रम के संयोजक ने अध्यक्षता के लिए प्रोफेसर त्रिपाठी को अध्यक्ष की कुर्सी संभालने के लिए आग्रह किया।
सारा हॉल तालियों से गूँज उठा। फिर एक एक अतिथियों को दो शब्द रखने हेतु बुलाया गया। माननीय अतिथियों को उस पुस्तक की एक प्रति उपलब्ध करा दिया गया था कि उसके अध्ययन के बाद अपने विचार, टिका टिप्पणी एवं विश्लेषण प्रस्तुत कर सकें।
महफ़िल बड़ी ख़ामोश थी, विचारात्मक ख़ामोशी की किरण हर तरफ फैली हुई थी। उच्च शिक्षा की योग्यता रखने वाले प्रोफेसर, बुद्धिजीवी, व्यवसायी, छात्र/छात्राएं एवं हर उम्र के महिला व पुरूष बड़ी एकाग्रता से वक्ताओं का सम्बोधन सुन रहे थे।
विभिन्न स्कॉलर्स, बुद्धिजीवी उस पुस्तक पर विचारात्मक एवं अनुसंधनात्मक चर्चा कर रहे थे। जब सभी वक्ताओं ने अपनी बात पूरी कर ली तो संयोजक ने अध्यक्षीय भाषण के लिए प्रोफेसर त्रिपाठी को आमंत्रित किया। फिर सारा हॉल एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
डॉक्टर त्रिपाठी देश के बहुत बड़े बहुचर्चित रिसर्च स्कॉलर,लिंगविस्टिक, दर्शन एवं मनोविज्ञान के माहिर थे। चौड़े माथे की ललाट पर विचारात्मक लकीरें, खुला रंग, चेहरे पर हल्के फ्रेंच कट सफेद दाढ़ी, काले बाल, कंधे पर एक तरफ गेरुए रंग का शॉल ओढ़े हुए धीमी धीमीं चाल से पोडियम पर उपस्थित हुए। तालियां अभी तक गूंज रही थी। उन्होंने झुक कर सबको नमस्कार किया और कहने लगे मैंने इस पुस्तक को शुरू से आखिर तक पढ़ लिया है इसमें लिखी हुई बातें मेरे हृदय में उतर गई है एवं उसने एक छाप डाली है। मैं इस अंतराल में कई सवेरों से गुजरा हूं और कई अंधेरी अवस्थाओं को समझने की कोशिश की है लेकिन इस वक्त उन घटनाओं को नहीं सुनाऊंगा जिन का तजुर्बा मेरे दिलो-दिमाग और मेरे इन्द्रियों ने किया है।
एक ऊंचे स्थान पर एक फकीर रहता था जो लोगों से पैसे मांग कर अपने जीवन व्यतीत करता था गरीबी से ग्रस्त कपड़े, बिखरे उलझे दाढ़ी, बिखरे बिखरे से बाल सभी लोग जानते थे कि वह बहुत समय से इस बाजार में पैसे मांगते हुए अपना जीवन यापन करता है। एक दिन उसको मरना था तो वह मर गया। वह मर गया तो आस पास के रहने वालों के सलाह से यह फैसला हुआ कि उसे वही दफन कर दिया जाए जहां वह भीख मांगता था। तो क़ब्र के लिए जमीन खोदी गई जैसे जमीन खोदी जाती है उसमें से भारी मात्रा में रुपया पैसे निकलने लगे जैसे उस जगह पर कोई खजाना हो!!
प्रोफेसर साहब एक क्षण के लिए रुक गए और उधर लोगों के जहन में सवाल उठने लगे। इस कहानी में क्या खास बात है,यह कहानी सुनाने का कौन सा मौका था,कुछ लोग तो यहां तक कहने लगे कि यह प्रोफेसर लोग कभी-कभी ऐसे ही बे सर पैर की बातें कर देते हैं। प्रोफेसर साहब को इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में यह कहानी आज ना जाने क्यों याद आ गई।प्रोफेसर साहब ने कुछ क्षण के लिए इंतजार किया लोगों की तवज्जो हासिल करने का शायद यह मनोवैज्ञानिक तरीका हो!!
फिर उन्होंने सबके सामने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए और अपने चौड़े माथे को झुका कर बड़े दुःख भरे अंदाज़ से कहा…
भाइयों बुरा ना मानो आज आप का यही हाल है।
आपके पास खज़ाना है ना खुद फायदा उठाते हैं ना दूसरों को फायदा पहुंचाते हैं और लड़खड़ाते कदमों से अध्यक्षीय कुर्सी की तरफ बढ़ने लगे।

महफ़िल पर ख़ामोशी छा गई………… और कुछ नहीं था………..!!

सैय्यद अब्दुल बासित अनवर

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