दिल्ली में दंगा से ट्रम्प का स्वागत!

राष्ट्रपति ट्रम्प की वापसी का इंतिजार करना चाहता था लेकिन इस के समर्थकों ने उसी समय दंगा-फसाद शुरू कर दिया। इस संगीन सूरत-ए-हाल पर स्थानीय सांसद गौतम गंभीर ने अपनी ही पार्टी के कपिल मिश्रा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि ‘‘ये कोई मतलब नहीं रखता कि वो शख्स कौन है?, वो कपिल मिश्रा है या कोई और, या फिर वो किस पार्टी से संबंध रखता है?, अगर उसने भड़काऊ बयान दिया है तो उस के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।’’

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बीजेपी लीडर कपिल मिश्रा मौजपुर में CAA के समर्थकों के साथ

डाक्टर सलीम खान
आम आदमी चाहे झाड़ू वाला हो या कमल छाप, वो फसाद नहीं शांति चाहता है। अवाम के लिए फसाद का कोई समय नहीं होता लेकिन राजनीतिज्ञों के लिए होता है इसलिए कि उनकी तो चरी नोट से भरती है इस वोट की खेती को बेकसूर लोगों के खून से सींचा जाता है। बीजेपी के लोग दंगा तो कराते हैं लेकिन इस कदर सोच समझ कर कि सांप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे। कपिल मिश्रा को अभी इसकी परशिक्षन और अनुभव नहीं है इसलिए उसने बहुत गलत समय पर ये हिमाकत कर दी । उदाहरण मशहूर है कि नए फकीर को भीख की जल्दी होती है। कपिल ने सोचा होगा कि जब पुलिस फोर्स सदर ट्रम्प के बंदो-बस्त में व्यस्त हो तो दंगा भड़का दिया जाये। सभी के ध्यान का केंद्र भी अमरीकी राष्ट्रपति की जानिब रहेगी और इस का ये जुर्म दब जाएगा लेकिन हुआ ये कि दिल्ली के दंगा से राष्ट्रपति ट्रम्प के दौरे पर गहन लग गया और केंद्र सरकार के सारे किए कराए पर पानी फिर गया।

प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करते हुए राष्ट्रपति ट्रम्प ने अहमदाबाद में कहा कि ‘हर कोई उनसे मुहब्बत करता है लेकिन वो बहुत सख्त हैं’ कपिल मिश्रा ने इस बयान को झूठा साबित कर दिया इसलिए कि जो प्रधानमंत्री अपने नाम निहाद विशेष  अमित शाह की मदद से राजधानी में शांति स्थापित नहीं रख सकता वो भला सख्त कैसे हो सकता है और सब लोग इस से मुहब्बत कैसे कर सकते हैं? दिल्ली में आने के बाद सदर ट्रम्प ने अपना बयान दोहराया कि प्रधानमंत्री ने कई लोगों के सामने मुझसे कहा कि वो धार्मिक आजादी चाहते हैं और इस के लिए बहुत मेहनत की गई है। ये मेहनत अगर कारगर साबित हुई होती तो दिल्ली में कम्यूनल दंगा नहीं होता ? ट्रम्प ने ये भी कहा कि मोदी बहुत मजहबी, चुपचाप रहने वाला  लेकिन कठोर इन्सान हैं। दहश्तगर्दी के खिलाफ कार्यवाही करने में वो कठोर हैं । ये बात अगर सही होती तो दिल्ली में भगवा दहश्तगरदों को तीन दिन तक बिना रोक टोक हिंसा भड़काने की छूट नहीं मिलती।

शाहीन बाग ने आजाद हिन्दुस्तान में विरोध की एक अलग इतिहास गढ़ा है। ढाई माह से जारी इस आंदोलन से सीख हासिल कर देशभर में हजारों शाहीन बाग अस्तित्व में आ चुके हैं । उनमें सबसे बड़ी तादाद बिहार में है लेकिन दूसरे नंबर पर दिल्ली है जहां कई स्थानों पर ये शांतिपूर्ण धरना चल रहा है। शाहीन बाग ने अपने सब्र से भड़काने की सारी कोशिशों को एक के बाद एक को नाकाम कर दिया है। यहां तक कि कपिल गुर्जर नाम का नौजवान वहां पिस्तौल लेकर पहुंच गया तो इस को भी बहुत ही इज्जत के साथ पुलिस के हवाले कर दिया गया ताकि अहिंसक आंदोलन पर कोई आंच ना आए। यही हाल देश भर के सभी शाहीन बागों का है। इस में एक तरफ हौसला है तो दूसरी जानिब सब्र है। इसी तरह का नागरिकता संशोधन कानून की विरोध करने वाले सैंकड़ों लोग जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के करीब नागरिकता संषिधन कानून की अहिंसक विरोध कर रहे थे कि अचानक करीब के इलाका चांद बाग में नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन करने वाले जमा हो कर “जय श्री राम” के नारे लगाने लगे । इस मौके पर अगर पुलिस अपनी जिम्मेदारी अदा करती तो उनमें टकराव नहीं होता लेकिन अगर सत्ता पक्ष से संबंध रखने वाला राजनीतिज्ञ बीच में कूद पड़े तो प्रबन्धक बेबस होजाता है और यही हुआ ।
ये बात अब तस्लीम की जा चुकी है कि वर्तमान दंगा के लिए दिल्ली बीजेपी का नाकाम रहनुमा कपिल मिश्रा जिम्मेदार है। उसके मार्गदर्शन में नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन में निकलने वाले जलूस के बाद ही मौजपूर और उत्तर-पूर्व दिल्ली के दीगर इलाकों में हिंसा फूट पड़ा। कपिल मिश्रा ने अपनी रैली में आंदोलनकारियों से सड़क और इलाके को खाली करने का अल्टीमेटम देते हुए कहा था कि तीन दिन बाद वो खुद खाली करा देंगे। कपिल शायद दो दिन बाद

राष्ट्रपति ट्रम्प की वापसी का इंतिजार करना चाहता था लेकिन इस के समर्थकों ने उसी समय दंगा-फसाद शुरू कर दिया। इस संगीन सूरत-ए-हाल पर स्थानीय सांसद गौतम गंभीर ने अपनी ही पार्टी के कपिल मिश्रा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि ‘‘ये कोई मतलब नहीं रखता कि वो शख्स कौन है?, वो कपिल मिश्रा है या कोई और, या फिर वो किस पार्टी से संबंध रखता है?, अगर उसने भड़काऊ बयान दिया है तो उस के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।’’

मुम्किन है कपिल मिश्रा पर भारतीय जनता पार्टी का दबाव आया हो या उसे अपनी गलती का एहसास हुआ हो क्योंकि उसने भी अपने पैगाम में नागरिकता संशोधन कानून के समर्थकों और विरोधियों से हिंसा और हंगामों से बचाव करते हुए शांति व अम्न को बरकरार रखने की अपील कर दी। वो अगर पहले आग ना भड़काता तो इस को बुझाने की जरूरत ही नहीं आती। इसकी इन हरकतों से 40 से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो चुकी हैं और लगभग 150 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं जिनमें से 70 लोगों को गोली लगी है। कपिल मिश्रा पर हिंसा भड़काने के दो मामले दर्ज किए जा चुके हैं। उनमें से एक शिकायत आम आदमी पार्टी की कारपोरेटर रेशमा नदीम की है और दूसरी हसीब उल-हसन नामी शख्स ने दर्ज कराई है। इन शिकायात में कपिल मिश्रा पर भड़काऊ बयान देकर इलाके में अनारकी फैलाने का इल्जाम लगाया गया है लेकिन अमित शाह की पुलिस ने उस के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है।
इन शिकायात के इलावा पूर्व चीफ इन्फार्मेशन कमिशनर वजाहत हबीबउल्लाह, भीम आर्मी के संस्थापक चन्द्रशेखर आजाद और शाहीन बाग के रहने वाले बहादुर अब्बास नकवी ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखलि करके कपिल मिश्रा पर दंगा करने का इल्जाम लगाया है। ऐसा लगता है कि मिश्रा के खिलाफ कानून का शिकंजा तंग हो चुका है। देश के अम्न पसंद लोग ये देखना चाहते हैं कि न्यायालय और इंतिजामिया के जरिया उस के साथ क्या सुलूक किया जाता है। दंगाग्रस्त  इलाकों का दौरा करने वालों के मुताबिक इस हिंसा में स्थानीय लोग शामिल नहीं हैं बल्कि योजनाबद्ध तरीके पर आस-पास के गांव से असमाजिक तत्वों को बसों और ट्रकों में ईंटों और पत्थरों के साथ वहां लाया गया। सुप्रीम कोर्ट में दाखलि अर्जी में ये इल्जाम भी लगाया गया है कि पुलिस हमले में जखमी होने वाले लोगों की शिकायतों पर कार्रवाई करने में नाकाम रही है। अदालत से दरखास्त की गई है कि वो पुलिस को एफ आई आर दर्ज करने की हिदायत दे। इस हस्तक्षेप की अपील में दिल्ली के शाहीन बाग और दूसरे स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा को यकीनी बनाने की खातिर गइडलाइन जारी करने का अपील भी किया गया है। वजाहत हबीबुल्लाह का मुतालिबा इसलिए भी अहम है कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें शाहीन बाग वालों से बात चीत के लिए मध्यस्थ बनाया था।

दिल्ली की संगीन सूरते हाल पर केंद्रीय गृहमंत्री की अध्यक्षता में सभी राजनीतिक पार्टियों की मीटिंग बुलाई गई। इस मीटिंग में दिल्ली के लैफ्टीनैंट गवर्नर अनिल बैजल, मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस पार्टी के लीडर सुभाष चोपड़ा, बीजेपी लीडर मनोज तिवारी समेत कई राजनीतिक रहनुमा और पुलिस कमिशनर अमूल्य पटनायक भी मौजूद थे। मीटिंग  के बाद मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल ने राजघाट पर प्रेस कान्फ्रेंस में कहा कि ‘‘पिछले दो दिनों में दिल्ली में हुई हिंसा से पूरा देश फिक्रमंद है। जान-माल का भारी नुक्सान हुआ है। अगर हिंसा बढ़ता है तो इस से सभी प्रभावित होंगे। हर कोई चाहता है कि हिंसा रुके। मुख्य मंत्री की मीटिंग सकारात्मक थी। मीटिंग में फैसला लिया गया कि सभी सियासी पार्टीयां शहर में शांति की स्थापना को यकीनी बनाएं।’’ काश कि ये कोशिश बार-बार हो।


इस अफसोसनाक सूरते हाल का खुशनुमा पहलू ये है कि इन सारे कारनामों के बावजूद जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे महिलाओं का विरोध प्रदर्शन जारी रहा। पुरुष उन्हें सुरक्षित घेरे में लिये रहे। पुलिस अहलकार प्रदर्शनकारियों से जाने के लिए कह रहे थे। लेकिन प्रदर्शन करनेवालों ने उठने से इनकार कर दिया था। उनका मुतालिबा है कि हम यहां से चले  जाऐंगे लेकिन पहले तशद्दुद को भड़काने वाले कपिल मिश्रा को गिरफ्तार किया जाये । एक तरफ जय श्री राम का नारा लगा कर संपत्ति को फूका और अवाम को मारा जा रहा है दूसरी जानिब मुजाहिरे में शामिल एक शख्स ने बी-बी सी के नुमाइंदे को कहा कि ‘हम शांतिपूर्ण विरोध कर रहे हैं। हम अम्न चाहते हैं। कोई भी हिंसा नहीं चाहता है।

हिंसात्म्क कार्यवाही के बाद हमारे जेहन पर डर-खौफ पैदा हो गया है लेकिन अब हम पीछे नहीं हटेंगे। हिन्दुस्तान हमारा देश है और हम हिन्दुस्तानी हैं हम सिर्फ इन्साफ चाहते हैं। हम चाहते हैं कि सरकार हमारी बात सुने। हफ्तों और महीनों तक सड़कों पर कौन बैठना चाहता है? यही वो गैरमामूली अज्म व हौसला है जिसके सबब सारी दुनिया ने शाहीन बाग के तर्ज पर चलने वाली इस आंदोलन को आजादी के बाद देश का सबसे अजीम एहतिजाज कहने पर मजबूर कर दिया है।

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